तीसरी आँख की साप्ताहिकी: बीता सप्ताह न केवल ‘तीसरी आँख’ के लिए, बल्कि देश की जनता और लोकतंत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। जहाँ एक ओर राजनीति में बड़े उलटफेर हुए, वहीं दूसरी ओर हमने छात्रों के भविष्य और पर्यावरण जैसे गंभीर जीवन-मरण के मुद्दों को अपनी ‘पैनी नज़र’ से टटोला।
1. चुनाव विश्लेषण: जब ‘तीसरी आँख’ की भविष्यवाणी बनी हकीकत
सप्ताह की शुरुआत 4 मई को पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के साथ हुई। इन नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि चुनाव विश्लेषण के मामले में ‘तीसरी आँख’ देश का नंबर वन पोर्टल है।
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बंगाल और दक्षिण का हाल: मतगणना से ठीक पहले हमने एलान किया था कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का दुर्ग ढहने वाला है और भाजपा प्रचंड बहुमत से आ रही है। तमिलनाडु में हमने ‘विजय’ की पार्टी के उदय और स्टालिन की विदाई की जो इबारत लिखी थी, वह सच साबित हुई।
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केरल और असम: केरल में यूडीएफ की जीत ने राहुल गांधी के नेतृत्व को मजबूती दी, तो वहीं असम में हिमंता विस्वा शरमा पर जनता का भरोसा हमारी रिपोर्ट के अनुरूप रहा।
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निरंतरता: इससे पहले बिहार एग्जिट पोल 2025 में भी हमारी गणना सटीक रही थी, जो हमारी टीम के गहरे जमीनी शोध का प्रमाण है।
2. यूपीएससी प्रिलिम्स 2026: अभ्यर्थियों के लिए ‘सटीक गाइड’
24 मई को होने वाली यूपीएससी प्रिलिम्स परीक्षा के लिए अब मात्र 15 दिन शेष हैं। छात्रों के इसी तनाव को कम करने के लिए हमने आखिरी 20 दिनों का ‘डू और डाई’ प्लान साझा किया, जिसकी चर्चा पूरे सप्ताह शिक्षा जगत में रही। हमारा उद्देश्य खबरों से आगे बढ़कर देश के भविष्य को सही दिशा देना है।
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3. शिक्षा और स्किल: बंद होते दरवाजों की चेतावनी
‘तीसरी आँख’ ने इस सप्ताह उच्च शिक्षा के गिरते स्तर पर तीखा प्रहार किया। हमने डिग्री का ‘डेथ वारंट’ और स्किलिंग का सफेद झूठ के माध्यम से शिक्षा नियामकों को चेताया कि स्किल के नाम पर बुनियादी शिक्षा और डिग्री की बलि नहीं दी जा सकती। विश्वविद्यालयों में विभागों का बंद होना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।
इसी कड़ी में, 1 मई (मजदूर दिवस) पर हमारी रिपोर्ट बेटा डिग्री जला और अब फावड़ा-तसला उठा! ने उन लाखों युवाओं की आँखें खोलने का काम किया जो डिग्रियाँ लेकर भी आज ‘शिक्षित मजदूर’ बनने की कगार पर हैं।
4. जल संकट: कंक्रीट में दफन होता लखनऊ का भविष्य
सभ्यताएं नदियों के किनारे बसीं, लेकिन लखनऊ में पानी अब जीवन से दूर भाग रहा है। हमारी विशेष रिपोर्ट Lucknow Water Crisis: कंक्रीट में दफन नदियाँ कोई गप्प नहीं, बल्कि वह कड़वी हकीकत है जिसमें शहर की 8 नदियाँ और सैकड़ों तालाब कंक्रीट के नीचे दफन कर दिए गए हैं। यह आने वाले भयानक कल का स्पष्ट संकेत है।
संपादकीय टिप्पणी: हमारी मिशनरी पत्रकारिता
‘तीसरी आँख’ का प्रयास उन संवेदनशील मुद्दों को उठाना है जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है। कितना दर्दनाक है कि जहाँ मंत्रियों के बंगलों में पानी बर्बाद हो रहा है और लोग पीने के पानी से सड़कें धो रहे हैं, वहीं एक गरीब आदमी ऐशबाग जलकल से मिलने वाले प्रदूषित और मटमैले पानी को पीने को मजबूर है।
क्या 10-15 हज़ार कमाने वाला आम आदमी ₹30 की बोतल खरीद सकता है? शायद नहीं। अगर हमारी इस पत्रकारिता से व्यवस्था की ‘बंद आँखें’ ज़रा भी खुलती हैं, तो हम इसे अपनी सबसे बड़ी कामयाबी मानेंगे।
— सम्पादक, तीसरी आँख








