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सुप्रीम कोर्ट: बच्ची की यौन उत्पीड़न शिकायत पर चुप रहना अपराध

सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला आया है। जो खासकर मासूम बच्चों के हितों की रक्षा के लिए अभूतपूर्व कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने उन बच्चों के हितों की रक्षा के लिए यह उल्लेखनीय फैसला सुनाया है जिसमें अदालत ने साफ कह दिया है कि अगर किसी बच्ची ने अपने साथ हुई यौन उत्पीड़न की बात को किसी को बताया है तो बच्ची की बात को अनसुना करना अपराध होगा। उसे पूरी तरह विश्वसनीय माना जाएगा। खास बात यह है कि ऐसी स्थिति में सूचना पाने वाले की यह जिम्मेदारी होगी कि वह इसकी सूचना पाक्सो एक्ट के तहत तुरंत पुलिस व सम्बंधित अधिकारियों को दे। बच्चों के दर्द को अनदेखा करना अब अपराध होगा।

अपराध की जानकारी पर चुप्पी, अपराध में शामिल

पहली बार अपराध की जानकारी के दायरे को व्यापक बनाया गया है। सुप्रीम अदालत ने उसे परिभाषित किया है। अदालत ने यह साफ कहा है कि जानकारी होना केवल प्रत्यक्ष रूपससे घटना को देखने तक सीमित नहीं है। बल्कि शिकार हुई बच्ची की से सीधी मिली जानकारी इसी दायरे में आती है। अगर बच्ची किसी से बताती है कि उसके गलत हुआ है या उसे गलत होने का संदेह है तो अब यह मान लिया जाएगा कि सुनने वाले को अपराध की जानकारी थी।

जस्टिस मनोज मिश्र व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह व्यवस्था दी, इस मामले में एक आठ साल की बच्ची ने अपने साथ सीनियर छात्र द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न की शिकायत शिक्षिका, बड़ी बहन व सहपाठियों से की थी। लेकिन स्कूल प्रशासन ने इस पर पर्दा डालने की कोशिश की।

गुवाहाटी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपित शिक्षिका व प्रधानाध्यापिका को बरी कर दिया था कि बच्ची के शरीर पर चोट के कोई बाहरी निशान नहीं थे, इसलिए उन्हें अपराध का यकीन नहीं हुआ।

शिक्षिका पर लिया एक्शन

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में हमेशा शारीरिक चोट के निशान हों, यह जरूरी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि उस शिक्षिका के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 21 और आइपीसी की धारा 176 के तहत आरोप तय करने के पर्याप्त सबूत हैं, जिसने बच्ची से सीधे शिकायत मिलने के बावजूद अधिकारियों को सूचित नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार बच्चे अपनी उम्र के कारण घटना की गंभीरता को ठीक से समझा नहीं पाते। ऐसे में धुंधली तस्वीर साफ करने के लिए उनसे पूछताछ की जा सकती है, इसका उद्देश्य उनकी शिकायत को दबाना या खारिज करना नहीं, बल्कि सच्चाई को समझना होना चाहिए। कोर्ट ने इस मामले में पीड़ित की बड़ी बहन, सहेली और स्कूल की हेड गर्ल भी शामिल थीं, लेकिन चूंकि वे नाबालिग हैं, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।

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Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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