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May Day Massage: बेटा डिग्री जला और अब फावड़ा-तसला उठा!

May Day Massage: आज 1 मई है। कैलेंडर हमें याद दिलाता है कि यह ‘मजदूर दिवस’ है। 1886 में शिकागो की सड़कों पर जो खून बहा था, वह इस उम्मीद में था कि आने वाली सदियों में इंसान को मशीन नहीं समझा जाएगा। लेकिन 2026 की दहलीज पर खड़ा भारत एक अलग ही मंजर पेश कर रहा है। आज मजदूर दिवस अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। किसी फैक्ट्री में ढोल-नगाड़े नहीं बजते, न ही मजदूरों के अधिकारों की गर्जना सुनाई देती है। इसके उलट, आज का मजदूर दिवस ‘उत्सव’ के बजाय ‘डर’ का प्रतीक बन गया है। शासन तंत्र की चालाकी देखिए कि नोएडा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में 1 मई के दिन ही धारा 163 लागू कर दी जाती है, ड्रोन से निगरानी होती है, जैसे कामगारों का अपने हक के लिए एकजुट होना कोई अपराध हो।

भाग 1: ठेका प्रणाली और यूनियनों का पतन

इतिहास गवाह है कि मजदूरों की ताकत उनकी एकजुटता में थी। एक दौर था जब जॉर्ज फर्नांडीस या दत्ता सामंत जैसे नेताओं की एक हुंकार पर रेल के पहिये थम जाते थे और सचिवालयों में सन्नाटा पसर जाता था। लेकिन आज ट्रेड यूनियनों का पतन हो चुका है।

नौकरियों पर सरकारी नियंत्रण खत्म होने और ‘ठेका प्रणाली’ (Contract System) के हावी होने ने मजदूरों की रीढ़ तोड़ दी है। आज रेलवे हो, बैंक हो या सचिवालय—भर्ती एजेंसियों के माध्यम से होती है। जब नौकरी ही 11 महीने के अनुबंध पर टिकी हो, तो किसी मजदूर में यह हिम्मत नहीं बचती कि वह अपने हक की आवाज उठाए। उसे पता है कि अगर उसने जुबान खोली, तो उसे बाहर कर दिया जाएगा और कतार में खड़े सैकड़ों भूखे लोग उसकी जगह लेने को आतुर हैं। यह ‘हायर एंड फायर’ की संस्कृति 1886 की उसी अमानवीय स्थिति की वापसी है, जिससे लड़ने के लिए मजदूर दिवस शुरू हुआ था।

भाग 2: शिक्षित मध्यम वर्ग और ‘सफेदपोश’ मजदूरी

आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी शिक्षित मध्यम वर्ग है। वर्षों तक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करने, लाखों रुपये खर्च करने और डिग्रियां बटोरने के बाद जब युवा बाजार में निकलता है, तो उसे अहसास होता है कि ‘मेधा’ का यहाँ कोई सम्मान नहीं है।

एक विडंबना देखिए—एक कुशल मिस्त्री आज 700 रुपये दिहाड़ी लेता है, जो महीने का लगभग 21,000 रुपये कमाता है। वहीं, एक पत्रकार या क्लर्क जो सालों पढ़कर आया है, उसे निजी संस्थानों में 10 से 15 हजार रुपये की नौकरी थमा दी जाती है। यह ‘ग्लैमराइज्ड लेबर’ (चमकदार मजदूरी) का युग है। यहाँ कलम चलाने वाले की कीमत कन्नी चलाने वाले से कम हो गई है। यह शिक्षित युवाओं के विवेक पर एक करारी चोट है, जो उन्हें कुंठा और हताशा के अंतहीन कुएं में धकेल रही है।

भाग 3: जब डिग्री बन गई अभिशाप

आज के दौर में पढ़ा-लिखा होना किसी वरदान के बजाय ‘अभिशाप’ जैसा लगने लगा है। विश्वविद्यालयों में विभाग बंद हो रहे हैं, शोध के लिए बजट नहीं है, और मेधावी छात्रों को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें ‘टूलकिट’ थमाकर आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

हकीकत यह है कि व्यवस्था को अब तार्किक और सोचने वाली जमात नहीं चाहिए। उसे तो ‘मजदूर लेबर’ चाहिए। बीटेक, एमटेक और पीएचडी धारक युवा आज चपरासी या सफाईकर्मी (झाड़ू लगाने और कूड़ा उठाने) की नौकरियों के लिए कतार में खड़े हैं। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और शासन तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है। हमने एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है जिसे आधुनिक कॉर्पोरेट दुनिया अपनाती नहीं और जिन्हें अपनी पुश्तैनी खेती आती नहीं। ‘दलाली’ की पढ़ाई उन्होंने पढ़ी नहीं, तो फिर इनका भला कौन करेगा?

भाग 4: सरकारी रहनुमाई का ‘गजब तमाशा’

शासन तंत्र खुद को ‘रहनुमा’ बताकर शोषण के नए कारखाने खोल रहा है। इसे ‘कल्याणकारी राज्य’ का मुखौटा पहनाया गया है। उदाहरण के तौर पर, गरीबों के लिए ‘सस्ते घर’ की योजनाएं लाई जाती हैं। जो ईडब्ल्यूएस (EWS) मकान पहले ढाई लाख में मिलते थे, सरकारी योजनाओं के ब्रांडिंग के बाद उनकी कीमत 5 लाख हो गई, और निजी क्षेत्र के सहयोग के नाम पर वही मकान अब 12 से 15 लाख में बेचे जा रहे हैं।

यह एक “गजब तमाशा” है जहाँ मध्यम वर्ग और गरीबों को यह अहसास कराया जाता है कि उनका भला हो रहा है, जबकि असल में उनकी मेहनत की कमाई को कॉर्पोरेट की जेब में डालने का रास्ता साफ किया जा रहा है। जब रक्षक ही शोषण का नया हथियार बन जाए, तो जनता किसके पास जाए?

भाग 5: क्रांति का अभाव और विवेक का बंधन

अक्सर सवाल उठता है कि इतनी विसंगतियों के बाद भी कोई बड़ा आंदोलन या क्रांति क्यों नहीं होती? इसका उत्तर ‘शिक्षित वर्ग’ के स्वभाव में छिपा है। क्रांति कभी शिक्षित वर्ग नहीं करता, क्योंकि उसका ‘विवेक’ जाग चुका होता है। वह नफा-नुकसान सोचता है, वह ईएमआई (EMI) और बच्चों के भविष्य के डर में बंधा होता है।

क्रांति हमेशा उस वर्ग से आती है जिसे इतना दबाया-कुचला जा चुका हो कि उसके पास खोने को कुछ न बचे। लेकिन आज की व्यवस्था ने निचले वर्ग को ‘मुफ्त राशन’ और ‘लोक-लुभावन योजनाओं’ के अफीम में उलझा दिया है, ताकि वह कभी उस ‘अंतिम सीमा’ तक न पहुँच पाए जहाँ से विद्रोह शुरू होता है।

निष्कर्ष: मेधा का सम्मान ही एकमात्र विकल्प

जब तक शासन तंत्र मेधा का सम्मान करने वाला विकसित नहीं होगा, हालात बद से बदतर होना हमारी नियति है। हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ बौद्धिक संपदा का अवमूल्यन हो रहा है और केवल ‘सस्ता श्रम’ ही एकमात्र मुद्रा बची है। शिक्षित युवा कुंठा में दम तोड़ रहे हैं क्योंकि वे न तो शारीरिक मजदूरी कर पा रहे हैं और न ही उन्हें मानसिक श्रम का उचित मूल्य मिल रहा है।

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आज मजदूर दिवस के मौके पर यह अनिवार्य है कि हम ‘मजदूर’ की परिभाषा को विस्तार दें। आज हर वह व्यक्ति मजदूर है जिसका शोषण हो रहा है—चाहे वह खेत में पसीना बहा रहा हो या एयर-कंडीशंड ऑफिस में 15 घंटे लैपटॉप पर काम कर रहा हो। जब तक ‘बिल्ली के गले में घंटी’ बांधने वाला नेतृत्व पैदा नहीं होगा, यह “तमाशा” ऐसे ही चलता रहेगा और मेधा का अवसान होता रहेगा।

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1886 से 2026 तक का सफर हमें वापस वहीं ले आया है जहाँ से हमने शुरू किया था—असुरक्षा, शोषण और बेबसी। बस फर्क इतना है कि तब मजदूर अनपढ़ था और आज वह हाथ में डिग्री लेकर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है।

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Author: Tesari Aankh

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