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Lucknow Water Crisis: कंक्रीट में दफन नदियाँ और गहराता जल संकट

Lucknow Water Crisis: कभी नदियों, तालाबों और कुओं की गोद में बसा लखनऊ आज अपने ही जल-स्रोतों के विनाश का गवाह बन रहा है। जिस शहर को हम आज ‘स्मार्ट सिटी’ और कंक्रीट के जंगल के रूप में देखते हैं, वह कभी पानी, हरियाली और उपजाऊ मिट्टी से भरपूर एक जीवंत सभ्यता था। आज स्थिति यह है कि यहां के साहित्य और संस्कृति से जुड़ी सई और गोमती जैसी जीवनदायिनी नदियाँ भी अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, जबकि छोटी-बड़ी अनेक नदियाँ इतिहास और राजस्व अभिलेखों तक सिमट चुकी हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही हाल रहा, तो आने वाले एक-दो दशकों में लखनऊ गंभीर भूजल संकट का सामना करेगा। पानी आयात करना पड़ेगा, हरियाली सिमट जाएगी और लगभग एक हजार वर्षों से बसता आया यह शहर जल-विहीन भविष्य की ओर बढ़ सकता है।

आदि गंगा गोमती और पापनाशिनी सई

लखनऊ का विकास दो प्रमुख नदियों—गोमती और सई—के किनारों पर हुआ। गोमती नदी को पौराणिक ग्रंथों में “आदि गंगा” कहा गया है। मान्यता है कि यह गंगा से भी प्राचीन नदी है। इसे “कुँआरी नदी” भी कहा जाता है। लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि भगवान हनुमान ने गोमती को लांघने से इनकार कर उसके दूसरे तट पर ही विश्राम किया था।

इसी प्रकार सई नदी को “ब्रह्महत्या पापनाशिनी” कहा गया है। मान्यता है कि महाराज दशरथ ने श्रवण कुमार वध के पश्चात और भगवान राम ने रावण वध के बाद इसी नदी में स्नान कर प्रायश्चित किया था। सई नदी के तट पर स्थित प्राचीन मंदिर आज भी त्रेता युग की स्मृतियाँ संजोए हुए हैं।

लेकिन विडंबना यह है कि जिन नदियों को कभी जीवन, आस्था और सभ्यता का आधार माना जाता था, आज वही नदियाँ प्रदूषण, अतिक्रमण और कंक्रीट के बीच दम तोड़ रही हैं।

जब सात समंदर पार तक बहती थी अवध की उदारता

इतिहास गवाह है कि अवध के नवाबों के लिए पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि एक रूहानी जिम्मेदारी था।

साल 1780 में इराक का नजफ शहर भीषण सूखे से जूझ रहा था। तब अवध के नवाब ने फरात नदी से नजफ तक “हिंडिया नहर” निर्माण के लिए 5 लाख रुपये दान किए। 1793 में पूरी हुई यह नहर आज भी वहाँ के लोगों की प्यास बुझा रही है।

विडंबना देखिए—जिस शहर के पूर्वजों ने रेगिस्तान में नहरें पहुँचा दीं, उसी शहर के वारिस अपनी “आदि गंगा” गोमती और उसके जल-तंत्र को कंक्रीट के नीचे दफन होते देख रहे हैं।

गोमती: नदी से नहर बनने तक की कहानी

नदी और नहर का फर्क

नदी केवल बहता पानी नहीं होती, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र होती है। वह अपने किनारों, बाढ़ क्षेत्र (Floodplain), भूजल स्रोतों (Aquifers) और सहायक धाराओं से मिलकर जीवित रहती है।

लेकिन लखनऊ में “रिवरफ्रंट विकास” के नाम पर गोमती के दोनों किनारों पर विशाल कंक्रीट की दीवारें (Diaphragm Walls) खड़ी कर दी गईं। इन दीवारों ने उन प्राकृतिक स्रोतों और सोतों को बंद कर दिया जो सदियों से गोमती को रिचार्ज करते थे।

परिणामस्वरूप, गोमती एक जीवित नदी की बजाय कंक्रीट के बीच बहती नियंत्रित जलधारा बनकर रह गई है।

अतिक्रमण और सिकुड़ता फ्लडप्लेन

कभी गोमती का विस्तार आज के फैजाबाद रोड तक माना जाता था। मानसून में नदी अपने पूरे पाट में फैलती थी। लेकिन समय के साथ बाढ़ क्षेत्र पर कॉलोनियाँ, सड़कें और व्यावसायिक निर्माण खड़े कर दिए गए।

जहाँ कभी नदी की साँसें थीं, वहाँ आज कंक्रीट है।

जल-विज्ञानी चेतावनी देते हैं कि नदी अपना रास्ता कभी नहीं भूलती। 1960 और 1970 के दशक की बाढ़ें आज भी पुराने लखनऊ की स्मृतियों में दर्ज हैं। यदि प्रकृति ने अपना संतुलन वापस माँगा, तो यह विनाशकारी हो सकता है।

गोमती की घटती साँसें

नदी का स्वास्थ्य उसमें घुली ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) से मापा जाता है।

रिपोर्टों के अनुसार:

  • गऊ घाट: लगभग 6.5 mg/L
  • कुड़ियाघाट: लगभग 4.5 mg/L
  • गोमती बैराज: लगभग 1.8 mg/L
  • पिपराघाट: लगभग 1.5 mg/L

यह स्तर जलीय जीवन के लिए गंभीर संकट का संकेत है।

2013-14 तक गोमती में जहाँ मछलियों की कई प्रजातियाँ पाई जाती थीं, वहीं रिवरफ्रंट निर्माण के बाद जैव-विविधता में तेज गिरावट दर्ज की गई है।

Lucknow Water Crisis: खो चुकी नदियाँ

प्रो. वेंकटेश दत्ता और अन्य पर्यावरणीय अध्ययनों के अनुसार, 1970 के दशक की उपग्रह तस्वीरों में लखनऊ के भीतर नदियों और जलधाराओं का विशाल नेटवर्क दिखाई देता था।

इनमें प्रमुख थीं:

  • रायथ (रेठ)
  • बेहटा
  • बख
  • नागवा
  • अकरद्दी
  • काड़ू
  • कुकरैल
  • सई

आज इनमें से कई नदियाँ या तो पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं या “नालों” में बदल दी गई हैं।

बख नदी: एक नदी का “ड्रेन” में बदल जाना

लखनऊ-रायबरेली सीमा पर बहने वाली लगभग 56 किलोमीटर लंबी बख नदी कभी खेतों और भूजल की जीवनरेखा थी।

यह भवरेश्वर मंदिर के पास सई नदी में मिलती थी। लेकिन आज यह “किला मोहम्मदी ड्रेन” के नाम से जानी जाती है।

एक नदी का नाम बदलकर “ड्रेन” कर देना ही उसके विनाश की शुरुआत थी।

रेठ (रायथ) नदी: कंक्रीट में दफन धारा

बीकेटी क्षेत्र से निकलने वाली रेठ नदी आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

कुर्सी इलाके में इसके एक हिस्से को पक्के नाले में बदलकर ऊपर से ढक दिया गया है। कई जगह नदी की तलहटी पर अवैध प्लॉटिंग हो चुकी है।

जो नदी कभी गोमती को स्वच्छ पानी देती थी, आज वही प्रदूषण लेकर उसमें गिर रही है।

अकरद्दी और काड़ू: राजस्व रिकॉर्ड तक सिमटी नदियाँ

सरोजनी नगर क्षेत्र की अकरद्दी और काकोरी-मलिहाबाद क्षेत्र की काड़ू नदी कभी बागों और खेतों को नमी देती थीं।

आज शहरीकरण, प्लॉटिंग और सड़क विस्तार ने इनके प्राकृतिक बहाव को तोड़ दिया है। सरकारी रिकॉर्ड में इनके नाम “ड्रेन” या “नाला” के रूप में दर्ज हैं।

50 वर्षों में 70% तालाब खत्म

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले चार दशकों में लखनऊ के लगभग 70 प्रतिशत तालाब समाप्त हो गए।

गोमती नगर विस्तार जैसे इलाकों में कई तालाबों की जमीन पर निर्माण हो चुका है। इन जल निकायों के नष्ट होने से भूजल रिचार्ज की प्राकृतिक प्रक्रिया टूट गई।

नतीजा यह है कि लखनऊ का भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

108 नालों और 1370 वेटलैंड्स का शहर

लोककथाओं में कहा जाता था कि लखनऊ में कभी 108 नाले थे। आधुनिक रिमोट सेंसिंग अध्ययनों ने इस अवधारणा को काफी हद तक सही साबित किया है।

विशेषज्ञों ने लखनऊ में 1370 से अधिक वेटलैंड्स और जल निकायों की पहचान की है। इनमें से 108 बड़े जल निकायों को पुनर्जीवित करने की योजना पर चर्चा हुई है।

ये जल निकाय शहर के “प्राकृतिक स्पंज” थे—बारिश का पानी सोखते थे, भूजल रिचार्ज करते थे और बाढ़ रोकते थे।

आज वही नाले सीवेज लाइन में बदल चुके हैं।

इकाना वेटलैंड: उम्मीद की एक किरण

इकाना वेटलैंड को राजस्व रिकॉर्ड में “वन क्षेत्र” घोषित किया गया है ताकि उस पर अतिक्रमण न हो सके।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वेटलैंड्स और प्राकृतिक जल निकायों को बचा लिया जाए, तो पक्षियों और जैव-विविधता की वापसी संभव है।

मोती झील: शहर के ‘फेफड़ों’ का दम घुटना

ऐशबाग और मालवीय नगर के बीच स्थित मोती झील और जमना झील कभी लखनऊ के सबसे बड़े जल निकायों में थीं।

करीब 10.3 एकड़ में फैली मोती झील आज लगभग समाप्त हो चुकी है। अतिक्रमण, कूड़ा और निर्माण ने इसे छोटे गंदे गड्ढों में बदल दिया है।

इसके साथ ही उस पूरे इलाके का भूजल संतुलन भी प्रभावित हुआ।

हैदर कैनाल: अधूरा सपना, बदबूदार नाला

नवाब गाजी-उद-दीन हैदर ने गंगा और गोमती को जोड़ने का सपना देखा था। “हैदर कैनाल” उसी दूरदर्शी योजना का हिस्सा थी।

कभी इस नहर के किनारे खुशबूदार बाग और हरियाली थी। चारबाग और आलमबाग के बागानों को इसी से पानी मिलता था।

आज वही नहर गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है।

कुएँ, चरनी और इंसानियत का जल-संस्कार

पुराने लखनऊ में कुएँ केवल पानी के स्रोत नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन का हिस्सा थे।

हर कुएँ के पास “चरनी” बनी होती थी, जिसमें पशु-पक्षियों के लिए पानी भरा जाता था। यह साझा संस्कृति और संवेदनशीलता का प्रतीक था।

कहा जाता है कि अकेले हजरतगंज क्षेत्र में कभी लगभग 700 कुएँ थे।

आज वे कुएँ पाट दिए गए हैं और उनके साथ वह सामूहिक भावना भी सूख गई है।

Lucknow Water Crisis

तांगे, बग्घियाँ और पर्यावरण अनुकूल शहर

एक समय लखनऊ की सड़कों पर इक्का, तांगा और बग्घियाँ चला करती थीं। न धुआँ था, न शोर।

नदी, कुएँ, चरनी और सड़क—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

आज आधुनिकता ने न केवल उन साधनों को बदला है, बल्कि शहर की जीवन-शैली और पर्यावरणीय संतुलन भी छीन लिया है।

क्या लखनऊ आने वाले संकट को पहचान पाएगा?

आज का लखनऊ केवल जल संकट नहीं झेल रहा, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति और प्राकृतिक पहचान खो रहा है।

गोमती, सई, रेठ, बख, काड़ू और अकरद्दी जैसी नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं थीं—वे इस शहर की आत्मा थीं।

1370 जल निकायों से सिमटकर नालों में बदलता यह शहर एक चेतावनी है कि विकास और विनाश के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।

यदि समय रहते जल निकायों का पुनर्जीवन, अतिक्रमण हटाना, वेटलैंड संरक्षण और प्राकृतिक नदी तंत्र की बहाली नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद उस लखनऊ को केवल किताबों में पढ़ेंगी जिसे कभी “नदियों का शहर” कहा जाता था।


साभार एवं संदर्भ

  • प्रो. वेंकटेश दत्ता, स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज, BBAU लखनऊ
  • Hindustan Times एवं Times of India की रिपोर्ट्स
  • LUCKNOWLEDGE (Tornos) एवं Prarang के ऐतिहासिक वृत्तांत
  • संपादकीय सहयोग: Tesari Aankh संपादकीय टीम एवं AI आधारित शोध सहयोग (Gemini)
Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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