आज भारत के नीतिगत गलियारों में एक नया और विवादास्पद विमर्श गढ़ा जा रहा है— “डिग्री की अब वह कीमत नहीं रही, जो पहले थी।” केंद्रीय शिक्षा मंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक, सत्ता के हर शिखर से अब ‘कौशल’ (Skill) की वकालत की जा रही है। लेकिन क्या यह बदलाव वाकई युवाओं की तरक्की के लिए है, या यह सार्वजनिक शिक्षा के प्रति सरकार की बढ़ती विमुखता को छिपाने का एक चमकदार पर्दा है?
जब देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के विभाग एक-एक कर बंद हो रहे हों और प्रोफेसरों की कुर्सियां धूल फांक रही हों, तब ‘कौशल विकास’ एक नई उम्मीद नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत विफलता को छिपाने वाला ‘झुनझुना’ प्रतीत होता है। जयपुर के बिरला ऑडिटोरियम में हाल ही में आयोजित ‘फॉरेन लैंग्वेज कम्युनिकेशन स्किल्स प्रोग्राम’ इस नई दिशा का सटीक उदाहरण है।
1. जयपुर का ‘जश्न’ और हकीकत का डरावना चेहरा
जयपुर में राजस्थान सरकार ने विदेशी भाषाओं के लिए बड़े संस्थानों और नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NSDC) के साथ एमओयू (MOU) पर हस्ताक्षर किए। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस अवसर पर कहा— “प्रधानमंत्री मोदी से प्रेरित होकर आज का युवा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि कौशल विकास पर ध्यान दे रहा है।” दिखने में यह बयान आधुनिक और प्रगतिशील लग सकता है, लेकिन इसे यदि जमीनी हकीकत के साथ जोड़कर देखें, तो यह एक खतरनाक संकेत है। क्या सरकार अब उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर देश की मेधा को केवल ‘हाथ का कारीगर’ बनाने तक सीमित करना चाहती है?
आंकड़ों की गवाही: इंजीनियरिंग का ढहता साम्राज्य भारत में कभी ‘इंजीनियर’ बनना मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा सपना था, लेकिन अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के हालिया आंकड़े भयावह हैं:
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कोर इंजीनियरिंग पर ताला: 2012-13 से 2024-25 के बीच देश भर में 454 से अधिक मैकेनिकल और 409 से अधिक सिविल इंजीनियरिंग कोर्सेज बंद कर दिए गए हैं।
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नर्सरी ही बंद: ये वे ‘कोर’ विषय हैं जो किसी भी राष्ट्र के बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास की रीढ़ होते हैं। जब इंजीनियरों की नर्सरी ही बंद हो रही हो, तो ‘विकसित भारत’ की इमारत कौन खड़ा करेगा?
2. जयपुर से दिल्ली तक: ढहता सरकारी ढांचा और ‘शून्य नामांकन’ का मिथक
जयपुर में जहां स्किलिंग का उत्सव मनाया जा रहा था, वहीं पड़ोस में दिल्ली कौशल और उद्यमिता विश्वविद्यालय (DSEU) जैसे संस्थान अपने प्रमुख परिसरों (अशोक विहार, पूसा-I, ओखला) में बी.टेक की 5 मुख्य शाखाएं—सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, नेटवर्क और मेकाट्रोनिक्स—बंद कर चुके हैं।
संकट का अखिल भारतीय विस्तार:
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अन्ना विश्वविद्यालय (तमिलनाडु): फरवरी 2024 में कम नामांकन का हवाला देकर 12 इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने का निर्णय लिया गया।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज): आगामी सत्र से 33 स्व-वित्तपोषित (Self-financed) कॉलेजों की संबद्धता समाप्त कर दी गई है।
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निजी कॉलेजों का विलय: 2020 के बाद से कम से कम 40 निजी गैर-लाभकारी कॉलेज अस्तित्व खो चुके हैं या बड़े समूहों में विलीन हो चुके हैं।
तर्क बनाम हकीकत: सरकार कहती है कि “दाखिले नहीं हो रहे, इसलिए विभाग बंद कर रहे हैं।” लेकिन सवाल यह है कि दाखिले क्यों नहीं हो रहे? क्या इसलिए नहीं कि इन विभागों में न तो पर्याप्त प्रोफेसर हैं और न ही आधुनिक लैब? क्या बिना खाद-पानी के बगीचे के सूखने पर माली यह कह सकता है कि “बगीचा अब अनुपयोगी है”?
3. काउंसलिंग का ‘मायाजाल’ और प्रोफेसरों का अकाल
यूनिवर्सिटी के गलियारों से आने वाली खबरें परेशान करने वाली हैं। काउंसलिंग के दौरान युवाओं को मनोवैज्ञानिक रूप से ‘डिमोटिवेट’ किया जा रहा है। छात्रों को खुलेआम कहा जाता है— “यह विभाग तो वैसे भी बंद होने वाला है, आप इसमें दाखिला लेकर क्या करेंगे? इससे बेहतर है कि आप किसी निजी कॉलेज में चले जाएं या कोई शॉर्ट-टर्म विदेशी भाषा का कोर्स कर लें।” खोखली होती यूनिवर्सिटीज: देश की नामचीन यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसरों के हजारों पद खाली पड़े हैं। कई विभाग ‘एक प्रोफेसर’ के सहारे चल रहे हैं। जब पढ़ाने वाला ही नहीं होगा, तो छात्र वहां क्यों जाएंगे? यह सार्वजनिक संस्थानों को धीरे-धीरे खत्म करने की एक ‘सुनियोजित रणनीति’ प्रतीत होती है। इसे सरकार “संसाधनों का सुव्यवस्थितीकरण” (Rationalisation) कहती है, लेकिन वास्तव में यह शिक्षा के लोकतंत्रीकरण का गला घोंटना है।

4. सरकारी खर्चे की कटौती और निजी क्षेत्र को ‘रेड कार्पेट’
सरकार धीरे-धीरे शिक्षा के क्षेत्र से अपने हाथ खींच रही है। पेंशन, वेतन और इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्चों को बचाने के लिए निजी क्षेत्र (Private Sector) की ओर झुकाव अब पूरी तरह स्पष्ट है।
https://x.com/PIB_India/status/2049425160143581570?s=20
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रोजगार से किनारा: चाहे बी.टेक हो, एम.टेक हो या साधारण स्नातक—सरकारी भर्तियां या तो फ्रीज हैं या उन्हें ‘आउटसोर्सिंग’ और ‘संविदा’ (Contract) के हवाले कर दिया गया है।
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पूंजीपतियों का कब्जा: जब सरकारी विश्वविद्यालय बंद हो जाएंगे, तो शिक्षा केवल एक ‘विशेषाधिकार’ (Privilege) बनकर रह जाएगी। इससे समाज में दो श्रेणियां बनेंगी:
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अभिजात वर्ग: जो विदेशों से महंगी डिग्रियां लेकर आएंगे और देश की नीति-निर्धारण करेंगे।
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आम युवा: जो सरकारी ‘स्किल सेंटर’ से 3-6 महीने की ट्रेनिंग लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ‘सस्ता और ट्रेन्ड लेबर’ बनेगा।
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5. ‘स्किलिंग’ बनाम ‘डिग्री’: विदेशी भाषाएं और रोजगार की अनिश्चितता
जयपुर में फ्रेंच, जर्मन, जापानी और स्पेनिश सीखने पर बहुत जोर दिया गया। निस्संदेह, विदेशी भाषा जानना एक योग्यता है, लेकिन क्या यह एक ‘इंजीनियरिंग’ या ‘मेडिकल’ डिग्री का स्थान ले सकती है?
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बौद्धिक गुलामी का खतरा: विदेशी भाषाओं में निपुणता युवाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ‘सपोर्ट स्टाफ’, ‘कॉल सेंटर एजेंट’ या ‘टूरिस्ट गाइड’ की नौकरी तो दिला सकती है, लेकिन यह उन्हें ‘वैज्ञानिक’, ‘नवाचारी’ या ‘चिंतक’ नहीं बना सकती।
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बिना ज्ञान के कौशल कैसा? बिना मजबूत शैक्षणिक आधार के केवल कौशल एक व्यक्ति को ‘हाथ का कारीगर’ तो बना सकता है, लेकिन उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नेतृत्व करने की शक्ति नहीं दे सकता।
6. मेधा का पलायन और भविष्य की चुनौतियां
यदि देश की मेधा (Intellect) को उचित शैक्षणिक ढांचा नहीं मिला, तो भारत एक गंभीर संकट की ओर बढ़ेगा:
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ब्रेन ड्रेन: प्रतिभावान छात्र कर्ज लेकर विदेशों की ओर पलायन करेंगे और कभी वापस नहीं आएंगे।
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डिजिटल लेबर: जो यहाँ रह जाएंगे, वे केवल उन कौशलों में प्रशिक्षित होंगे जो विदेशी कंपनियों को चाहिए, न कि उस ज्ञान में जो भारत की अपनी स्थानीय समस्याओं को हल करने के लिए आवश्यक है।
शिक्षा बचाओ, भविष्य बचाओ
जयपुर की इस भव्यता और एमओयू के शोर ने सरकार के उस एजेंडे को बेनकाब कर दिया है जिसमें ‘डिग्री’ की कोई कीमत नहीं बची है। शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं, बल्कि समाज की चेतना जगाने का माध्यम है। यदि ‘कम नामांकन’ के बहाने विभाग बंद होते रहे, तो आने वाले दशक में भारत में ऐसा एक भी सार्वजनिक संस्थान नहीं बचेगा जो एक गरीब मेधावी बच्चे को शोधकर्ता बना सके।
तीसरी आंख के तीखे सवाल:
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यदि डिग्री की कीमत नहीं है, तो क्या सरकार सभी सरकारी कॉलेज बंद करने की तैयारी में है?
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क्या ‘कौशल विकास’ असल में बेरोजगारी के डरावने आंकड़ों को ‘निपुणता’ के नाम पर छिपाने की एक ‘मेकअप’ तकनीक है?
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सरकारी खर्चे घटाने की इस होड़ में, गाँव और गरीब के प्रतिभावान बच्चे का स्थान कहाँ है?
समय आ गया है कि समाज और युवा इस ‘स्किलिंग’ के भ्रम को तोड़कर अपनी ‘शिक्षा के अधिकार’ के लिए खड़े हों। शिक्षा को ‘बाजार की वस्तु’ बनने से रोकना ही वर्तमान समय की सबसे बड़ी देशभक्ति होगी।
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संपादकीय नोट: यह रिपोर्ट उन हजारों युवाओं की आवाज़ है जो डिग्री हाथ में लेकर स्किलिंग के विज्ञापनों और बंद होते यूनिवर्सिटी विभागों के बीच खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।








