Unemployment: जब भी देश में रोजगार और बेरोजगारी की बात आती है, तो हुक्मरानों और सरकारी महकमों की तरफ से एक आंकड़ा उछाल दिया जाता है—”देश में बेरोजगारी दर महज 4 से 5 फीसदी है।” इस आंकड़े को ग्राफ की चमकीली लकीरों में सजाकर, मुनादी पीटकर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि देश का युवा आत्मनिर्भर और खुशहाल है। लेकिन क्या यह सच है? या फिर इस सांख्यिकीय मायाजाल (Statistical Illusion) के पीछे एक ऐसा खौफनाक सच छिपा है, जिसे समझने में अगर थोड़ी भी देर हुई तो देश का सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा।
आइए बिना किसी पूर्वाग्रह के, आंकड़ों की इस बाजीगरी और जमीन पर सुलगती हकीकत का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं।
1. सांख्यिकीय मायाजाल बनाम योग्यता का कत्ल
एक अनपढ़ या बिना पढ़ा-लिखा व्यक्ति यदि अपनी क्षमता के अनुसार पंचर बना रहा है, ठेला लगा रहा है या ऑटो चला रहा है, तो वह ठीक है। वहां उसकी कोई बड़ी वित्तीय पूंजी या वर्षों की मानसिक तपस्या दांव पर नहीं लगी थी। उसे डेटा में ‘रोजगार’ मानना समझ आता है।
लेकिन संकट तब शुरू होता है जब एक मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी (15 से 20 लाख रुपये) कर्ज लेकर या पेट काटकर अपने बच्चे की पढ़ाई पर लगा देता है। जब वह युवा बीटेक, एमटेक, पीएचडी, बीकॉम, एमकॉम या फिर बीयूएमएस, बीएएमएस और एमबीबीएस जैसी भारी-भरकम मेडिकल डिग्रियां लेकर निकलता है, तो वह सिर्फ पेट पालने के लिए ‘काम’ नहीं ढूंढ रहा होता। वह अपनी योग्यता के अनुकूल सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और निवेश पर रिटर्न ढूंढ रहा होता है।
https://x.com/INCKarnataka/status/2054118410242650177?s=20
आज हालात यह हैं कि 20 लाख की डिग्री हाथ में लेकर देश का सबसे क्रीम वर्कफोर्स (इंजीनियर्स, डॉक्टर्स, ग्रेजुएट्स) फैक्ट्रियों में लेबर का काम करने, संविदा पर क्लर्क बनने या डिलीवरी बॉय की नौकरी करने पर मजबूर है। सरकारी आंकड़े अपनी चालाकी से इन्हें ‘एम्प्लॉयड’ (रोजगारशुदा) की श्रेणी में गिन लेते हैं और 2014 के पहले के आंकड़ों के बराबर लाकर अपनी सफलता का ढोल पीटते हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप से, यह रोजगार नहीं, बल्कि प्रतिभा की खुली हत्या (Brain Waste) है। अगर इस नजरिए से देखें, तो देश में वास्तविक और गरिमापूर्ण रोजगार के अभाव में बेरोजगारी का स्तर 90 फीसदी तक पहुंच चुका है।
2. मुफ्त की दाल-रोटी की घूस और आहत स्वाभिमान
सत्ताओं का यह पुराना ढर्रा रहा है कि वे जनता को मुफ्त की दाल-रोटी या राशन की ‘घूस’ (रेवड़ियां) देकर उनका मुंह बंद रखने की कोशिश करती हैं। हुक्मरान सोचते हैं कि मुफ्त के चंद टुकड़ों से युवा शांत रहेगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि “जनता का भी एक ‘मैं’ (स्वाभिमान) होता है।” जब उस नागरिक गरिमा और आत्मसम्मान पर बार-बार चोट होती है, तो आदमी इस मुफ्त की घूस से ऊब जाता है। आज जब एक मां-बाप अपने 35 से 40 बरस के हो रहे युवाओं को अच्छी नौकरी की आस में दर-दर भटकते देखते हैं, तो उनका कलेजा नुचता है। अपनी आंखों के सामने संतान का भविष्य अंधकार में जाते देख जो आक्रोश पनपता है, उस पर सत्ताओं के ‘ढपोरशंखी बयान’ (जैसे “पकौड़ा तलना भी रोजगार है”) मरहम नहीं बनते, बल्कि उस नाराजगी की आग में घी का काम करते हैं।
3. अवसाद का सुलगता ज्वालामुखी: सिगरेट का धुआं और बीयर की बोतलें
पानी अब सिर के ऊपर जा चुका है। लड़के-लड़कियां, जो देश का भविष्य हैं, इस अनिश्चितता के दौर में अपने जीवन के सबसे खूबसूरत सपने, उमंग और प्यार-मोहब्बत तक भूल चुके हैं। सबके अंदर एक भयानक, मूक आक्रोश है। अपनी नाकामी—जो कि असल में इस सिस्टम की नाकामी है—के इस असहनीय दर्द को युवा आज अस्थाई रूप से सिगरेट के धुएं और बीयर की बोतलों में दफन करके अंदर ही अंदर सुलगते जा रहे हैं।
हुक्मरान इस खामोशी को अपनी शांति या सहमति समझने की भूल कतई न करें। यह शांति नहीं, बल्कि एक ज्वालामुखी है जो फटने का इंतजार कर रहा है। दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ आज के युवाओं पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं:
“कौन कहता है आसमान में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…”
जब युवाओं का यह सब्र टूटेगा और वे एक कंकड़ तबीयत से उछालेंगे, तब इन हुक्मरानों को भागने के लिए जगह नहीं मिलेगी। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) जैसे डिजिटल आंदोलनों का अचानक वायरल होना और सत्ता के होश उड़ाना, इसी सुलगते हुए ज्वालामुखी की पहली गूंज है।
4. सामाजिक ‘ग्लोबल वार्मिंग’: जब समाज खुद को रीसेट करता है
आज सत्ता की ताकत, आईटी सेल और कानूनी बंदिशों के दम पर चाहे इस आवाज को “पाकिस्तानी साजिश” या “विदेशी टूलकिट” कहकर दबा दिया जाए, लेकिन सुलगते युवाओं के इस आक्रोश को शांत कर पाना अब उस खतरनाक स्टेज पर जा चुका है जिसे हम पर्यावरण विज्ञान में ‘टिपिंग पॉइंट’ (Tipping Point) या ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।
https://tesariaankh.com/cockroach-janta-party-youth-protest-analysis/
जब धरती का दोहन और प्रदूषण अपनी आखिरी सीमा पार कर जाता है, तो प्रकृति इंसानों के नियंत्रण से बाहर होकर खुद को बचाने के लिए तबाही या ‘रीसेट’ की आत्मघाती प्रक्रिया शुरू कर देती है। ठीक वैसे ही, भारत का युवा और सामाजिक ताना-बाना आज उस टिपिंग पॉइंट पर खड़ा है, जहां व्यवस्था के दमन के खिलाफ समाज ने अंदरूनी तौर पर खुद को रीसेट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जब तक सत्ता के ठेकेदार आंकड़ों के ग्राफ से बाहर निकलकर इस आक्रोश की गहराई को समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
सच्चाई छिप नहीं सकती
मशहूर शायर नवाज़ देवबंदी का यह शेर आज की पूरी व्यवस्था के खोखलेपन को आईना दिखाता है:
“सच्चाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से।”
सत्ताओं का जनहित और विकास का यह आवरण पूरी तरह कागजी है। विज्ञापनों, चमकीले होर्डिंग्स और पीआर (PR) के जरिए विकास के चाहे कितने भी कागजी फूल सजा लिए जाएं, लेकिन उसमें से आम नागरिक के कल्याण की वास्तविक खुशबू कभी नहीं आ सकती। आंकड़ों के ग्राफ में छिपा यह खौफनाक सच अब देश का युवा जान चुका है, और कागजी फूलों की यह सल्तनत अब ज्यादा दिनों तक इस सुलगते आक्रोश को दबा नहीं पाएगी।








