Special Political Analysis: सिंहासन, वासना और पतन का शाश्वत चक्र लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावों का आना-जाना और सत्ताओं का बदलना एक निरंतर प्रक्रिया है। देश और राज्यों में सरकारें बनती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन एक चीज जो कभी नहीं बदलती—वह है सत्ता के शीर्ष पर बैठे नायकों का अहंकार। हिंदू पौराणिक कथाओं में राजा नहुष और उनके इंद्र पद के पतन की कहानी महज एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीति के क्षेत्रीय क्षत्रपों (Chhatraps) की अंतिम नियति का एक जीवंत राजनीतिक दस्तावेज है। पश्चिम बंगाल की राजनीति इसका सबसे सटीक और क्रूर उदाहरण पेश करती है।
1. ‘जनादेश’ का नहुष योग: संचित पुण्यों से सिंहासन तक
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा नहुष को इंद्र का पद किसी शॉर्टकट या लॉटरी से नहीं, बल्कि उनके संचित पुण्यों, तपस्या और योग्यता के बल पर मिला था। जब पुराने इंद्र को हटना पड़ा, तो नहुष को स्वर्ग का अधिपति बनाया गया।
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राजनीतिक नैरेटिव: भारतीय राजनीति, विशेषकर पश्चिम बंगाल के संदर्भ में देखें तो डॉ. बी.सी. रॉय (1948), ज्योति बसु (1977) या ममता बनर्जी (2011) का सत्ता में आना जनता के भारी असंतोष और एक लंबे संघर्ष की तपस्या का फल था। जनता ने उन्हें अपने ‘संचित पुण्यों’ (प्रचंड जनादेश) के बल पर लोकतंत्र के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठाया। शुरुआत में ये नेता जनता के लिए एक ‘रक्षक’ और नायक बनकर उभरते हैं।
2. ‘अखंड सत्ता की हवस’: जब व्यवस्था पर कब्जे की जिद जागी
इंद्र का पद पाते ही नहुष के मन में वासना और अहंकार का उदय हुआ। उन्हें लगा कि यदि स्वर्ग पर उनका राज है, तो अद्वितीय सुंदरी और इंद्र की पत्नी इंद्राणी (शची) पर भी उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे भूल गए कि यह पद अस्थायी है।
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राजनीतिक नैरेटिव: ठीक इसी तरह, जब कोई क्षत्रप लंबे समय तक सत्ता में रहता है, तो उस पर “अखंड सत्तावाद” का भूत सवार हो जाता है। बंगाल का कम्युनिस्ट ‘कैडर राज’ हो या किसी भी क्षेत्रीय दल का अति-केंद्रीकरण—नेता को लगने लगता है कि राज्य की हर संस्था, पुलिस, प्रशासन, मीडिया और यहाँ तक कि जनता की स्वतंत्रता (इंद्राणी) पर भी उसका पूर्ण और परमानेंट स्वामित्व है। सत्ता की यह हवस लोकतांत्रिक मर्यादाओं को निगलने लगती है।
3. ‘सप्तऋषियों की पालकी’: पालकी ढोने वालों पर ही पैर मारना
इंद्राणी को पाने की जल्दी और वासना के नशे में अंधे नहुष ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। उन्होंने पूजनीय सप्तऋषियों को अपनी पालकी उठाने पर मजबूर किया। पालकी धीमी चलने पर नहुष ने उन बूढ़े ऋषियों पर चिल्लाना शुरू किया और उन्हें पैर मारकर “सर्प-सर्प” (जल्दी चलो) कहा।
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राजनीतिक नैरेटिव: राजनीति में ये ‘सप्तऋषि’ कोई और नहीं, बल्कि आम जनता, बुद्धिजीवी, और वे जमीनी कार्यकर्ता हैं जो इन नेताओं को अपने कंधों पर उठाकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाते हैं।
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जब हुक्मरान सत्ता के नशे में अंधे होकर इन्हीं पालकी उठाने वालों (आम नागरिकों) का शोषण करने लगते हैं, सिंगूर-नंदीग्राम जैसी घटनाओं या चुनावी हिंसा और प्रशासनिक दमन के जरिए उन पर ‘पैर मारते’ हैं, तो वे अनजाने में उसी ‘सप्तऋषि’ के सब्र का इम्तिहान ले रहे होते हैं।
4. ‘सांप बनने का श्राप’: राजनीतिक पाताल का शाश्वत सत्य
अपमानित और क्रोधित सप्तऋषियों ने नहुष को तुरंत स्वर्ग से गिरकर पृथ्वी पर रेंगने वाला ‘सांप’ बन जाने का श्राप दे दिया। एक पल में उनका पूरा वैभव, पूरी बादशाहत मिट्टी में मिल गई और वे विस्मृति के अंधेरे में चले गए।
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राजनीतिक नैरेटिव: जनता (ऋषियों) का श्राप ऐसा ही अपरिवर्तनीय होता है। बंगाल की राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहाँ बदलाव धीरे-धीरे नहीं होता, बल्कि जब होता है तो पुरानी व्यवस्था का नामोनिशान मिटा देता है:
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कांग्रेस का पतन: डॉ. बी.सी. रॉय के बाद कांग्रेस ऐसी सिमटी कि आधी सदी बाद भी मुख्यधारा में वापस नहीं आ सकी।
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वामपंथ का अंत: ज्योति बसु के समय जो वैचारिक पतन और कैडर राज शुरू हुआ, उसने अंततः कम्युनिज्म को अप्रासंगिक बना दिया। साल 2011 में जब 34 साल का वामपंथी किला ढहा, तो बुद्धदेव भट्टाचार्य और उनकी पार्टी सिर्फ चुनाव नहीं हारी, बल्कि राजनीतिक रूप से इस कदर ‘सांप’ बनकर रेंगने को मजबूर हुई कि आज उनका वजूद शून्य हो चुका है।
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अंतिम गति जानते हुए भी ‘सांप’ बनने का मोह
पश्चिम बंगाल तो महज एक खिड़की है, जिससे पूरी भारतीय राजनीति का यह क्रूर सच दिखाई देता है। देश के इतिहास में कई ऐसे कद्दावर क्षत्रप हुए जिन्होंने दशकों तक हुकूमत चलाई, लेकिन उनके अंतिम दिन गुमनामी, मुकदमों या राजनीतिक अलगाव में बीते। बंगाल का इतिहास साफ कहता है कि यहाँ की जनता जब तक वफादार है, आंख मूंदकर मौका देती है, लेकिन जिस दिन उसका मोहभंग होता है, वह सुधार का मौका नहीं देती, सीधे राजनीतिक वजूद ही समाप्त कर देती है।
विडंबना यही है कि इतिहास के इस सबक को हर नया शासक जानता है। वे जानते हैं कि अहंकार की परिणति ‘सांप’ बनकर रेंगने में ही होगी, फिर भी सत्ता की वासना का यह भूत उनसे उनका विवेक छीन लेता है। चुनाव आते-जाते रहेंगे, राजमुकुट बदलते रहेंगे, लेकिन ‘नहुष का यह शाप’ हर उस छत्रप का पीछा करता रहेगा जो अपनी पालकी उठाने वाली जनता को पैर मारने की जुर्रत करेगा।








