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क्या ‘सार्थक-पीडीएस’ योजना देश को मुफ्तखोरी की लत लगा रही है?

नई दिल्ली: आजादी के बाद से लेकर साल 2014 तक, भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का एक तय नियम था—गरीबों को बेहद रियायती (कम) दरों पर अनाज दिया जाता था। इस व्यवस्था के पीछे एक गहरा नीतिगत तर्क था कि संकट के समय नागरिकों को भुखमरी से बचाया जाए, लेकिन साथ ही उनके भीतर आत्मनिर्भरता और श्रम की भावना भी बची रहे।

परंतु, वर्तमान दौर में ‘मुफ्त राशन’ और विभिन्न ‘चुनावी गारंटियों’ के तहत सीधे पैसे बांटने का जो पैटर्न सेट हुआ है, उसने देश के सामने एक नया आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा कर दिया है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने “सार्थक-पीडीएस” (Sarthak-PDS) योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत सरकार अगले 5 सालों में ₹25,530 करोड़ फूंकने जा रही है। ऐसे में आज देश में एक बड़ा सवाल पूछा जाना जरूरी हो गया है: क्या सामाजिक सुरक्षा के नाम पर बांटी जा रही ये मुफ्त सुविधाएं देश की जड़ों को खोखला करने वाला ‘स्लो पॉयजन’ (धीमा जहर) तो नहीं बन रही हैं? क्या यह युवाओं को रोजगार न दे पाने की विफलता को छिपाने का एक शॉर्टकट है?

तकनीक पर करोड़ों का खर्च, लेकिन नीयत पर सवाल?

सरकारी दावों के मुताबिक, इस योजना के जरिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग (ML), और ब्लॉकचेन जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करके राशन वितरण को पारदर्शी बनाया जाएगा। देश के 81.35 करोड़ नागरिकों को मुफ्त अनाज पहुंचाने के लिए डीलर का कमीशन भी बढ़ाया जा रहा है। सरकार इसे ‘नागरिक-केंद्रित’ और ‘अंतिम दूरी तक वितरण’ का नाम दे रही है, लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि अरबों रुपये की तकनीक और अनाज के इस अंतहीन सिलसिले के बाद आपने कितने लोगों को आत्मनिर्भर बनाया? इस योजना से कितने लोग गरीबी रेखा से बाहर निकलकर इस लिस्ट से मुक्त हुए?

जमीनी हकीकत: खेतों और शहरों में मजदूर संकट

इस नीति का सबसे बड़ा और आत्मघाती असर देश के लेबर मार्केट पर दिख रहा है। आज ग्रामीण इलाकों में किसानों को खेती के सीजन में मजदूर नहीं मिल रहे हैं। शहरों में छोटे व्यापारियों और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम करने वालों का अकाल पड़ा है। जब किसी परिवार को खाने के लिए मुफ्त अनाज और बिना कड़े श्रम के मनरेगा जैसी योजनाओं से सीधे पैसे मिल रहे हैं, तो देश की युवा शक्ति कड़ी मेहनत करने और नए कौशल (Skills) सीखने के बजाय इस खैरात पर निर्भर हो रही है। इस शॉर्टकट ने श्रम की गरिमा को ठेस पहुंचाई है। आज स्थिति यह है कि लोग बिना मेहनत किए सिर्फ हक जताना चाहते हैं, जिससे देश की कुल उत्पादकता (Productivity) गिर रही है।

क्या कहते हैं अर्थशास्त्री

  • रघुराम राजन (पूर्व गवर्नर, आरबीआई): रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कई बार इस बात पर जोर दिया है कि सरकार को सीधे मुफ्त चीजें या अनाज बांटने के बजाय ‘मानव पूंजी’ (Human Capital) पर खर्च करना चाहिए। उनका तर्क है कि जब आप लोगों को मुफ्त की लत लगाते हैं, तो आप उन्हें बैसाखी दे रहे होते हैं। इसके विपरीत सरकार को बेहतर स्कूल, स्किल डेवलपमेंट और अस्पताल देने चाहिए ताकि युवा खुद कमाकर खाने के योग्य बन सकें, न कि राशन की लाइनों में खड़े रहें।

  • अमर्त्य सेन का ‘क्षमता दृष्टिकोण’ (Capability Approach): नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का सिद्धांत कहता है कि विकास का मतलब लोगों को सिर्फ ‘अनाज देना’ नहीं है, बल्कि उन्हें ‘काम करने के काबिल बनाना’ है। जब सरकारें युवाओं को रोजगार देने में विफल रहती हैं, तो वे मुफ्त राशन जैसी योजनाओं को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करती हैं। यह नीति युवाओं की क्षमता को विकसित होने से पहले ही मार देती है।

  • ‘फ्रीबीज’ पर सुप्रीम कोर्ट और अर्थशास्त्रियों की चिंता: देश के कई शीर्ष नीतिगत अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि मुफ्त की योजनाएं श्रम बाजार में ‘डिसइन्सेंटिव टू वर्क’ (काम न करने की प्रवृत्ति) पैदा करती हैं। जब किसी नागरिक की बुनियादी जरूरतें बिना हाथ-पैर हिलाए पूरी होने लगेंगी, तो वह देश की जीडीपी (GDP) और उत्पादकता में योगदान देना बंद कर देगा। यही कारण है कि आज खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक लेबर का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

वोटर का मनोविज्ञान और भय की राजनीति

इस पूरी व्यवस्था के पीछे एक राजनीतिक मंशा भी साफ दिखाई देती है। बिना किसी रोक-टोक के लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए जनता को इन मुफ्त योजनाओं की ‘लत’ लगा दी गई है। आज आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग के मन में यह भय बैठ गया है कि यदि उन्होंने सरकार बदली, तो अगली सरकार उनकी ये मुफ्त योजनाएं बंद कर देगी। नए उद्योग लगाने, स्थायी नौकरियां पैदा करने, और शिक्षा-स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को सुधारने जैसे अहम मुद्दों को पीछे धकेलकर चुनाव अब ‘मुफ्त सुविधाओं’ की अंतहीन रेस बन चुके हैं।

विकल्प क्या है?

बेशक, समाज के सबसे पिछड़े और अक्षम तबके को सुरक्षा देना सरकार का कर्तव्य है, लेकिन इसका तरीका ‘मुफ्तखोरी’ नहीं होना चाहिए। सरकार को ‘मुफ्त राशन’ की जगह ‘आंशिक भुगतान’ (Subsidized Model) का ढांचा दोबारा लागू करना चाहिए, जहाँ अनाज के बदले एक न्यूनतम राशि ली जाए। जनता को मुफ्त अनाज देने के बजाय काम के बदले अनाज या कौशल विकास के जरिए स्थायी रोजगार देना ही देश के वास्तविक विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। समय आ गया है कि देश इस पैटर्न पर खुलकर विचार करे, वरना देश की युवा शक्ति सिर्फ ‘मुफ्त राशन की कतार’ में खड़ी होकर अपनी ऊर्जा बर्बाद करती रहेगी।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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