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8th Pay Commission: जानें क्या है 400% सैलरी ग्रोथ का फैक्ट और 5 फिटमेंट फैक्टर का फॉर्मूला

8th Pay Commission:आठवें वेतन आयोग (8th Pay Commission) का मुद्दा अब एक गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। महंगाई की बढ़ती मार को देखते हुए सरकारी कर्मचारी आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर गहरी नजर गड़ाए हुए हैं। सरकारी दफ्तरों और कैंटीनों में अब इस पर चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि अब यह सिर्फ एक रूटीन सैलरी हाइक नहीं रह गई है, बल्कि सरकारी कर्मचारियों के लिए बढ़ती महंगाई के बीच अपनी जरूरतों को पूरा करने की एक बड़ी उम्मीद बन चुकी है।

इस पूरी बहस के बीच, इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने सभी कर्मचारियों के लिए एक समान नीति से हटकर अलग-अलग पे-लेवल के लिए जो नया सुझाव दिया है, उसने कर्मचारियों की उम्मीदों को और बढ़ा दिया है। आइए जानते हैं कि आखिर क्या है यह नया फॉर्मूला।

क्या है ‘5 फिटमेंट फैक्टर’ का नया फॉर्मूला?

IRTSA ने पहली बार एक समान फिटमेंट फैक्टर (सैलरी बढ़ाने वाला गुणांक) की जगह अलग-अलग पे-लेवल के लिए 5 अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर की मांग की है, जो कि कर्मचारियों के बीच एक नई बहस लेकर आया है।

लेकिन आगे बढ़ने से पहले आठवें वेतन आयोग के गठन पर एक नजर डालते हैं। केंद्र सरकार द्वारा आठवें वेतन आयोग के गठन की मंजूरी दिए जाने के बाद कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। इस आयोग की अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को नियुक्त किया गया है। करीब 50 लाख कर्मचारियों और लाखों पेंशनभोगियों को आयोग से नए फिटमेंट फैक्टर पर विचार करने और बढ़ती महँगाई की भरपाई के लिए पर्याप्त वेतन वृद्धि की सिफारिश किए जाने की उम्मीद है। ऐसे में स्वचालित वेतन संशोधन प्रणाली और पुरानी पेंशन योजना (OPS) से संबंधित मुद्दों पर आयोग के दृष्टिकोण का सबको इंतजार था।

जानें IRTSA का फिटमेंट फैक्टर फॉर्मूला:

एसोसिएशन ने अलग-अलग पे-मैट्रिक्स लेवल्स के लिए निम्नलिखित फिटमेंट फैक्टर का प्रस्ताव रखा है:

  • लेवल 1 से 5 के लिए: फिटमेंट फैक्टर 2.92

  • लेवल 6 से 8 (मिड-लेवल) के लिए: फिटमेंट फैक्टर 3.50 (यानी ₹45,000 की बेसिक सैलरी सीधे ₹1.57 लाख हो जाएगी)

  • लेवल 17 से 18 (सीनियर लेवल) के लिए: फिटमेंट फैक्टर 4.38 (यानी ₹2.5 लाख की बेसिक सैलरी बढ़कर सीधे ₹10.95 लाख हो जाएगी – 400% से ज्यादा की बढ़ोतरी)

‘फैमिली यूनिट’ और ‘ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS)’ का पेच

1. फैमिली यूनिट 3 से बढ़कर हो 5

कर्मचारियों का तर्क है कि आज के दौर में महंगाई, बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्ग माता-पिता के इलाज के भारी-भरकम खर्च के कारण परिवार की इकाई (Family Unit) को 3 से बढ़ाकर 5 माना जाए और उसी हिसाब से न्यूनतम सैलरी तय हो। कर्मचारियों के नजरिए से देखें तो यह मांग बेहद व्यावहारिक दिखती है, क्योंकि बढ़ती महंगाई ने मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा लोगों के घरेलू बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

2. OPS जैसी गारंटी की मांग

पुरानी पेंशन की जिद से थोड़ा व्यावहारिक होते हुए अब कर्मचारी संगठन ‘OPS जैसी सुरक्षा’ (मार्केट रिस्क से अलग गारंटेड मिनिमम पेंशन और DA लिंक्ड प्रोटेक्शन) की मांग कर रहे हैं। नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में मार्केट रिस्क के खतरे को झेलने के बाद, कर्मचारी अब पिछले अनुभवों से सबक लेकर गारंटेड मिनिमम पेंशन चाहते हैं। इसे डीए (Dearness Allowance) से लिंक करने की मांग की जा रही है ताकि रिटायरमेंट के बाद भी महंगाई से सुरक्षा मिलती रहे।

वेतन आयोग की शुरुआत कब हुईः पहले से सातवें का ऐतिहासिक सफर

आठवें वेतन आयोग की इन मांगों को गहराई से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आजादी से लेकर अब तक सरकारी कर्मचारियों के वेतन ढांचे में किस तरह के बदलाव आए हैं:

  • पहला वेतन आयोग (1946-47): यह “जीवन निर्वाह वेतन” के सिद्धांत पर आधारित था। इसके तहत चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मूल वेतन ₹10 से बढ़ाकर ₹30 प्रति माह और तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के लिए ₹35 से बढ़ाकर ₹60 प्रति माह किया गया। इसमें अधिकतम वेतन ₹2,000 निर्धारित था।

  • दूसरा वेतन आयोग (1957-59): जस्टिस जगन्नाथ दास की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने वेतन को महंगाई के साथ जोड़ने पर जोर दिया। इसने महंगाई भत्ते (डीए) के 50% हिस्से को मूल वेतन में मिलाने की सिफारिश की। इस दौर में न्यूनतम वेतन ₹80 और अधिकतम वेतन ₹3,000 तय हुआ।

  • तीसरा वेतन आयोग (1970-73): जस्टिस रघुबीर दयाल की अध्यक्षता में इस आयोग का ध्यान इस बात पर था कि सरकार प्रतिस्पर्धी वेतन के माध्यम से सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण बनाए रखे। इसके तहत न्यूनतम वेतन ₹185 प्रति माह तय हुआ (जिसे बाद में सरकार ने ₹196 किया)।

  • चौथा वेतन आयोग (1983-86): जस्टिस पी.एन. सिंघल की अध्यक्षता वाले इस आयोग को वैज्ञानिक और सांख्यिकीय आधार पर वेतन तय करने के लिए जाना जाता है। इसने सशस्त्र बलों के लिए न्यूनतम वेतन ₹750 प्रति माह तय किया और “रैंक पे” की शुरुआत की।

  • पांचवां वेतन आयोग (1994-96): न्यायमूर्ति एस. रत्नावेल पांडियन की अध्यक्षता में वेतनमानों की संख्या 51 से घटाकर 34 की गई। न्यूनतम प्रारंभिक वेतन को ₹750 से बढ़ाकर ₹2,550 किया गया और ग्रेच्युटी की सीमा बढ़ाई गई। साथ ही, पदोन्नति में ठहराव दूर करने के लिए ACP योजना शुरू हुई।

  • छठा वेतन आयोग (2006-08): जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने पुराने वेतनमानों की जगह ‘पे बैंड’ और ‘ग्रेड पे’ प्रणाली लागू की। न्यूनतम वेतन ₹7,000 और अधिकतम ₹80,000 किया गया। इसी आयोग ने मातृत्व अवकाश बढ़ाकर 180 दिन करने की सिफारिश की थी।

  • सातवां वेतन आयोग (2014-15): जस्टिस अशोक कुमार माथुर की अध्यक्षता में पिछले ग्रेड पे सिस्टम को बदलकर नया ‘पे मैट्रिक्स’ लाया गया। न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर ₹18,000 किया गया और 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया।

सरकार के सामने क्या है चुनौती?

जस्टिस (रिटायर्ड) रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला आठवां वेतन आयोग इस समय देश के कई शहरों (भुवनेश्वर, लखनऊ, हैदराबाद आदि) के दौरे और संघों के साथ परामर्श के चरण में है।

आयोग के फैसले से देशभर के करीब 1.1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की उम्मीदें जुड़ी हैं। हालांकि, सरकार के लिए इन उम्मीदों को पूरा करना और देश की अर्थव्यवस्था व राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को संभालना एक दोधारी तलवार जैसा है।

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इतिहास गवाह है कि केंद्र के बाद राज्य सरकारें भी इसी तर्ज पर वेतन बढ़ाती हैं, जिससे वित्तीय बोझ कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि आयोग डिजिटल युग और बदलती अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कोई व्यावहारिक और बीच का रास्ता (मिडल पाथ) तलाश सकता है।

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Author: Tesari Aankh

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