लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पानी का संकट अब केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी भयानक त्रासदी का रूप ले रहा है जो सूबे को ‘जल-रेगिस्तान’ बनाने की ओर अग्रसर है। पश्चिम में बुंदेलखंड की तपती धरती से लेकर पूरब के आर्सेनिक प्रभावित मैदानों तक, और खुद राजधानी लखनऊ के पॉश इलाकों तक—हर तरफ पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है। लेकिन सबसे कड़वा सच यह है कि सरकार के स्तर पर अभी तक केवल कागजी कार्रवाई और फाइलों के अंबार के अलावा जमीन पर कोई ठोस प्रयास होते नजर नहीं आ रहे हैं।
नदियों का अस्तित्व खत्म: कब होगा कायाकल्प?
उत्तर प्रदेश की जीवनदायिनी नदियां आज नालों में तब्दील हो चुकी हैं। सरकार हर मंच से दावा करती है कि नदियों का कायाकल्प कराया जाएगा, नए प्रोजेक्ट्स लाए जाएंगे, लेकिन सवाल यह उठता है कि यह कायाकल्प कब होगा? जब तक सरकारी फाइलों से मंजूरी निकलेगी और बजट पास होगा, तब तक शहरों में प्यास बुझाने के लिए कौन बचेगा? जल संकट की यह तेज होती तपिश चेतावनी दे रही है कि हालात बेकाबू होने की कगार पर हैं।
क्या रेगिस्तानी देशों की तरह जीना होगा?
जिस रफ्तार से जलस्तर पाताल में जा रहा है, उसे देखकर वह दिन दूर नहीं लगता जब हमें भी खाड़ी या रेगिस्तानी देशों की तरह पानी की सख्त राशनिंग के बीच जीना होगा।
एक डरावनी लेकिन सच्ची कल्पान: आने वाले दिनों में आम आदमी को सप्ताह में केवल एक दिन स्नान करने से संतोष करना पड़ सकता है। आज की महंगाई के हिसाब से देखें तो ₹20 में एक लीटर पीने का पानी और ₹200 में सिर्फ एक बाल्टी (20 लीटर) पानी खरीदकर गुजारा करने को मजबूर होना पड़ेगा।
यह कोई काल्पनिक डर नहीं, बल्कि कड़वी हकीकत बनने जा रहा है। इस खौफनाक स्थिति में सबसे ज्यादा मार गरीब जनता पर पड़ेगी। शहरों की इस बेरुखी और महंगाई से तंग आकर गरीब और दिहाड़ी मजदूर जान बचाने के लिए गांवों की तरफ भागेंगे। लेकिन त्रासदी देखिए… गांव खुद पानी के भीषण संकट से जूझ रहे हैं। वहां के सार्वजनिक हैंडपंप महीनों से खराब पड़े हैं और कुएं सूख चुके हैं। ऐसे में गरीब जनता जाएगी तो जाएगी कहाँ?
लखनऊ से बुंदेलखंड तक पाताल में जाता पानी
राजधानी लखनऊ का आलम यह है कि शहर का डेवलपमेंट ब्लॉक ‘अति-शोषित’ (Over-exploited) श्रेणी में आ चुका है, जहां भूगर्भ जल का दोहन $107\%$ के पार है। गोमती नगर, इंदिरा नगर, अलीगंज और पुराने शहर (अंबरगंज, वजीरबाग) में पानी का स्तर 180 से 200 फीट नीचे गिर चुका है।
वहीं दूसरी तरफ, प्रयागराज के शंकरगढ़ ब्लॉक, चंदौली और संभल जैसे ग्रामीण-कस्बाई इलाकों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं। ग्रेटर नोएडा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में तो कमर्शियल यूज की वजह से बोरवेल 600 फीट तक सूख चुके हैं। पूरब में बलिया, गोरखपुर और बाराबंकी जैसे 40 से ज्यादा जिले ऐसे हैं, जहां जो पानी मिल भी रहा है, वह आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे धीमे जहर से पूरी तरह दूषित हो चुका है।
जागने का आखिरी वक्त
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से पानी बचाने की भावनात्मक अपील जरूर की है, रिमोट वर्किंग और जल संरक्षण की बात कही जा रही है। लेकिन जब तक धरातल पर अवैध वाटर कमर्शियल माइनिंग पर रोक नहीं लगेगी, जल निगम और जलकल विभाग कागजों से बाहर निकलकर खराब हैंडपंपों और बंद पड़े ट्यूबवेलों को ठीक नहीं करेंगे, तब तक कोई भी अपील बेअसर रहेगी।
हालात पूरी तरह भयानक और बेकाबू हो जाएं, इससे पहले शासन, प्रशासन और खुद समाज को नींद से जागना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियां पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेंगी और इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।
जरूरी लिंक्स और शिकायत पोर्टल:
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स्थानीय जिला या वाटर टैंकर की शिकायत के लिए: UP Jal Nigam पोर्टल पर जाएं।
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लखनऊ में खराब ट्यूबवेल या दूषित सप्लाई के लिए: लखनऊ जल संस्थान या UP Jansunwai (जनसुनवाई पोर्टल) पर शिकायत दर्ज कराएं।








