दुनिया के किसी दार्शनिक ने बड़े कमाल के 12 बिंदु लिखे हैं, जो बताते हैं कि हम जिसके साथ 10 मिनट बैठते हैं, जीवन वैसा ही लगने लगता है। शराबी के साथ जिंदगी आसान लगती है, तो साधु के साथ वैराग्य वाली। लेकिन इस सूची का सबसे कड़वा और दिलचस्प हिस्सा वह है जो कहता है कि “पत्नी के साथ बैठो तो जिंदगी मुश्किल लगेगी और पड़ोसी की पत्नी के साथ बैठो तो लगेगा जिंदगी और लंबी होनी चाहिए थी।”
परसेप्शन का खेल: ट्रेलर बनाम पूरी फिल्म अक्सर हमें सड़क पर चलती हर दूसरी महिला या पड़ोसी की बीवी बहुत अच्छी लगती है। लोग उनके अच्छे पहलुओं पर गौर करते हैं, उनकी मुस्कुराहट की तारीफ करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि यह सिर्फ एक ‘ट्रेलर’ है। हम दूसरों का केवल वही हिस्सा देखते हैं जो वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं। इसके उलट, अपनी पत्नी के साथ हम चौबीस घंटे ‘पूरी फिल्म’ देखते हैं—जिसमें थकान, चिड़चिड़ापन, घर की जिम्मेदारियां और अनगिनत समझौते शामिल हैं।
जब साथ बैठते ही फटने लगता है ‘शिकायतों का ज्वालामुखी’ मेरे अपने घर का हाल भी अलग नहीं है। जब भी बच्चे प्यार से कहते हैं कि “मम्मी-पापा, आज आप दोनों साथ बैठिए और बातें कीजिए,” तो पांच मिनट के भीतर ही शांति भंग हो जाती है। वजह? हम दोनों एक-दूसरे के साथ नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमियों के उस ‘परसेप्शन’ (नजरिए) को लेकर बैठते हैं जो हमने सालों से पाल रखा है। शुरुआत कोई भी करे, दूसरा पक्ष उस पर दुगने वेग से जवाबी हमला करता है। हम एक-दूसरे के ‘इंसान’ होने को भूल जाते हैं और सिर्फ ‘शिकायतों की फाइल’ बनकर रह जाते हैं।
तुलना की अंतहीन बीमारी यही फितरत बच्चों के मामले में भी दिखती है। यह जानते हुए भी कि हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, हम अपने बच्चों की तुलना दूसरों से करते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हर बच्चा अपनी गति से बढ़ता है। दूसरों के बच्चों की सिर्फ उपलब्धियां दिखती हैं, उनके नखरे और कमियां तो सिर्फ उनके मां-बाप जानते हैं।
दोस्ती का ‘स्वर्ग’ और घर का ‘नर्क’ दोस्ती इतनी खूबसूरत इसलिए लगती है क्योंकि उसमें ‘साथ रहने’ की मजबूरी नहीं है। दो दोस्त एक-दूसरे की अच्छाई की कद्र करते हैं और बुराई को नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि 10 मिनट बाद अपने-अपने घर जाना है। घर में हम ‘नजरअंदाज’ करना भूल जाते हैं और ‘सुधारना’ शुरू कर देते हैं, और यही सुधारने की जिद युद्ध का आधार बनती है।
मेहनत और त्याग का पैमाना: किसान और सैनिक अक्सर हम अपनी डेस्क वाली नौकरी या छोटी-मोटी भागदौड़ को बहुत बड़ा संघर्ष मान लेते हैं। लेकिन जब हम 10 मिनट किसी किसान या मजदूर के पास बैठते हैं, तो समझ आता है कि ‘असली मेहनत’ क्या होती है। हम एयर कंडीशनर की सर्विसिंग न होने पर परेशान होते हैं, जबकि वे चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ होकर हमारे लिए अन्न उगाते हैं। इसी तरह, एक सैनिक के साथ बिताए 10 मिनट हमें अहसास कराते हैं कि हमारी छोटी-मोटी परेशानियां और ऑफिस की राजनीति कितनी तुच्छ है। उनके लिए घर से दूर रहना और देश के लिए प्राणों की बाजी लगाना रोज का काम है। यह तुलना हमें विनम्र (Humble) बनाती है।
जीवन का परम सत्य: श्मशान का वैराग्य लेख में जिक्र किए गए 12 बिंदुओं में सबसे गहरा ‘श्मशान’ का अनुभव है। वहाँ बिताए 10 मिनट हमें यह सिखाते हैं कि अंत में सब कुछ यहीं छूट जाना है। वह वैराग्य जो वहां पैदा होता है, अगर हम उसका एक अंश भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ले आएं, तो शायद हम अपनों से लड़ना बंद कर दें। हम माया और मोह में पड़कर जिन चीजों के लिए अपनों का दिल दुखाते हैं, वे अंततः राख ही होने वाली हैं।
समाधान: परसेप्शन से प्रेम की ओर सच आखिर क्या है? सच किसी एक बिंदु में नहीं, बल्कि इन सभी अनुभवों के मेल में है। अगर हम दोस्त की तरह अपनी पत्नी की कमियों को नजरअंदाज करना सीख लें, या किसान की तरह मेहनत में आनंद ढूंढें, तो जीवन का नजरिया बदल सकता है। ‘दूसरे’ हमेशा अच्छे लगेंगे क्योंकि उनके साथ हमारा कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन ‘अपने’ वही हैं जो हमारी किच-किच सहते हुए भी हमारे साथ खड़े हैं।
निष्कर्ष: जिंदगी की असली ‘कशिश’ बाहरी दुनिया के आकर्षण में नहीं, बल्कि घर की उस ‘किच-किच’ को समझने में है। दूसरे का काम और दूसरे का जीवन हमेशा बेहतर ही दिखेगा क्योंकि हमें उसके दर्द का अहसास नहीं है। जिस दिन हम अपनी ‘फाइलें’ बंद करके एक-दूसरे को वैसे ही स्वीकार करना शुरू कर देंगे जैसे हम अपने दोस्तों को करते हैं, उसी दिन घर का आंगन भी स्वर्ग जैसा लगने लगेगा।








