“जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्।
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती ॥”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर वेदों के इस पावन और अत्यंत भावुक कर देने वाले संस्कृत सुभाषितम् (मंत्र) को साझा किया। यह महज कुछ पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि यह हमारी उस महान सनातन संस्कृति का निचोड़ है जो पूरी दुनिया को एक धागे में पिरोती है। इस मंत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री ने देश और दुनिया को याद दिलाया कि यह धरती सिर्फ मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक चेतना की ‘मां’ है।
एक मां, अनेक संतानें: विविधता का उत्सव
प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि धरती माता पूरी मानवता को किसी सरहद या दीवारों में बांटकर नहीं देखतीं, बल्कि वह हम सबको एक ही परिवार का हिस्सा मानती हैं।
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भाषा और धर्म का भेद नहीं: इस धरा पर न जाने कितनी भाषाएं (विवाचसं) बोली जाती हैं, और न जाने कितने धर्मों व परंपराओं (नानाधर्माणं) को मानने वाले लोग रहते हैं।
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एक ही घर की छत: ठीक वैसे ही जैसे एक मां अपने बच्चों में कभी फर्क नहीं करती, वैसे ही यह धरती मां अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों को एक ही घर (यथौकसम्) के सदस्यों की तरह अपने आंचल में समेटे हुए है।
श्री मोदी ने भावुक शब्दों में कहा कि इस वैश्विक घर में हर एक संस्कृति का अपना अनूठा महत्व है और हर परंपरा उतनी ही सम्मान की हकदार है।
स्नेहमयी गौ माता सा निश्छल प्रेम और समृद्धि की कामना
इस रिपोर्ट का सबसे मर्मस्पर्शी पहलू वह प्रार्थना है जो इस मंत्र के जरिए की गई है। प्रधानमंत्री ने धरती मां से संपूर्ण मानवता के लिए समृद्धि और कल्याण की कामना की है।
इसकी तुलना एक ऐसी शांत, स्थिर और स्नेहमयी गौ माता (ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती) से की गई है, जो बिना किसी स्वार्थ के, बिना विचलित हुए अपने बच्चों को दूध प्रदान करती है। ठीक उसी तरह, यह प्रार्थना की गई है कि हमारी धरती मां भी हम सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की हजारों धाराएं (सहस्रं धारा द्रविणस्य) निरंतर प्रवाहित करती रहें।
आज के दौर में इस संदेश की अहमियत
यह संदेश केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं है, बल्कि आज की अशांत और बंटी हुई दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा मरहम है। जब दुनिया वैचारिक मतभेदों और संघर्षों से जूझ रही है, तब भारत का यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (विश्व ही मेरा परिवार है) का संदेश मानवता को एक नई राह दिखाता है।
यह इनपुट हमें याद दिलाता है कि प्रगति की अंधी दौड़ में हमें अपनी ‘धरती मां’ के प्रति कृतज्ञ होना कभी नहीं भूलना चाहिए। सहअस्तित्व, सम्मान और आपसी प्रेम ही वह अंतिम सत्य है जो इस सृष्टि को जीवंत बनाए रख सकता है।








