
प्रतुल जोशी
Yatra Sansmaran: मैं एक भूत हूं। यह बात वर्ष 2005 की फरवरी की है। मैं आकाशवाणी ईटानगर में कार्यक्रम अधिशासी के तौर पर पोस्टेड था। मैं आकाशवाणी के लिए एक वृत्त रूपक “अरुणाचल में पर्यटन की संभावनाएं” हेतु तवांग गया था।
अरुणाचल का पश्चिमी हिस्सा बहुत खूबसूरत है। असम से निकल कर जैसे ही आप अरुणाचल में भालुकपोंग से आगे बढ़ते हैं तो पहले 8000 फीट की ऊँचाई पर बोमडिला, फिर बोमडिला से 42 किलोमीटर 5000 फीट पर घाटी में दिरांग और फिर दिरांग से तवांग के लिए जो रास्ता शुरु होता है, वह देश के सबसे खूबसूरत रास्तों में एक है। दिरांग से 63 किलोमीटर, 13700 फीट पर पहले आपको सेला पास पर पहुंचना पड़ता है। फिर लगभग 75 किलोमीटर की दूरी तै कर 10000 फीट पर स्थित तवांग पहुंचा जाता है।
बुद्ध फेस्टिवल का आयोजन
मैं दो दिन तवांग में बिताने के बाद बोमडिला लौट आया। बोमडिला के inspection bunglow में मेरे रहने की व्यवस्था थी। बोमडिला में अरुणाचल के एक बड़े टूर ऑपरेटर Tsering Wange रहते हैं। उन्हीं से मुझे ज्ञात हुआ था कि दिरांग में “बुद्ध फेस्टिवल ” का आयोजन किया जा रहा है। अगले दिन “बुद्ध फेस्टिवल ” का आयोजन दिरांग के एक मैदान में होना था। Tsering मुझे सुबह सुबह अपने साथ दिरांग ले गए और उन्होंने वहां एक लॉज के मालिक से मेरी मुलाक़ात करवायी। उस रात दिरांग में मुझे उसी लॉज में रुकना था। रात में रुकने की व्यवस्था से आश्वस्त होने के पश्चात मैं दिरांग के उस लंबे चौड़े मैदान में पहुंच गया, जहां शाम को चार बजे अरुणाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री गेगांग अपांग को “बुद्ध फेस्टिवल” का औपचारिक उद्घाटन करना था।
वर्ष 2005 एवं 2007 में अरुणाचल में “बुद्ध फेस्टिवल ” और “सियांग फेस्टिवल” जैसे महत्वपूर्ण आयोजन हुए थे, जिस में अरुणाचल की विभिन्न जनजातियों के सांस्कृतिक वैभव, हस्तशिल्प और खान-पान का भरपूर लुत्फ़ मैंने उठाया। दिरांग के लंबे चौड़े गोल मैदान में, दर्जनों दुकानों के बीच मैं इस कदर खो गया कि मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि कब साढ़े तीन बज गए।
पहले उद्घाटन
मैंने दोपहर का लंच स्थगित कर दिया, यह सोच कर कि उद्घाटन समारोह के पश्चात आराम से खाया जाएगा (हां, याक वाले मोमो ज़रूर खाये थे)। मैं उद्घाटन से पहले, उस स्थान पर पहुंच गया था जहां उद्घाटन समारोह की कमेंटरी करने के लिए कुछ लोग बैठे थे। अँग्रेज़ी कमेंटरी, बोमडिला के कॉलेज की कोई अध्यापिका कर रही थीं (जो संभवतः असमिया थीं)।
हिंदी कमेंटरी, दिरांग के एक स्थानीय युवक कर रहे थे। यह दोनों लोग, NE टेलीविजन के लिए live कमेंटरी कर रहे थे। उन दिनों उत्तर पूर्व भारत में NE Television चैनल बहुत लोकप्रिय था। NE TV की मालकिन मनोरंजना सिंह भी “बुद्ध फेस्टिवल ” में मौजूद थीं। मैंने हिंदी कमेंटेटर से दोस्ती गाँठने के उद्देश्य से पूछा “कोई दिक़्क़त तो नहीं?”।
अनुवाद की गति का कमाल
कमेंटेटर महोदय ने कहा, “हां, थोड़ी दिक़्क़त है।” मैंने एक पहुंचे हुए ज्ञानी के लहजे में कहा “चिंता, मत करिये। अब मैं यहां हूं। अब कोई दिक़्क़त नहीं होगी।” दरअसल, हिंदी कमेंटेटर महोदय की दिक़्क़त थी कि Organisers द्वारा फेस्टिवल के संबंध में जो भी सूचनाएं दी जा रही थीं, वह सब अंग्रेज़ी में थीं और उन्हें हिंदी में बोलना था। मैं अनुवाद में अपनी गति से अच्छी तरह परिचित था, इस लिए पूरे आत्म विश्वास के साथ मैं उस स्थानीय युवक के बगल में बैठ गया और जो भी सूचना अंग्रेज़ी में प्राप्त होती, उसका हिंदी तर्जुमा मिनटों में उपलब्ध करवा देता।
एक चमत्कार
हिंदी कमेंटेटर महोदय के लिए यह सब एक चमत्कार से कम न था। दिरांग में अचानक एक ऐसा व्यक्ति नमूदार हो जाए, जिस से कोई पूर्व परिचय नहीं हो, और वह फटाफट अनुवाद मुहैया करवा दे, यह सब हिंदी कमेंटेटर महोदय के लिए आश्चर्य से कम नहीं था। मुझे मंच के क़रीब जगह चाहिए थी और अनुवाद के अपने शौक के चलते आसानी से हासिल हो रही थी, यह मेरे लिए भी रोचक अनुभव था। अनुवाद, live commentary और अपनी रिकॉर्डिंग के त्रिकोण में मैं ऐसा व्यस्त हो गया कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि रात्रि का 09 बज गया। मैं लगभग चार घंटे चले उद्घाटन समारोह से जब फ़ारिग हुआ, उस समय रात्रि के 09 बज रहे थे।
गहरी घाटियां और तेज हवा
अरुणाचल के West Kameng ज़िले का हिस्सा “दिरांग” एक घाटी है जो 5000 फीट पर स्थित है। यहां पिछले दो दशकों से बड़े पैमाने पर कीवी की खेती हो रही है।जो कीवी लखनऊ, दिल्ली में 25 रुपये की एक मिलती है, दिरांग में वर्ष 2005 में मैंने 50 रुपए किलो खरीदी।साथ ही एक याक रिसर्च सेंटर भी सन् 2005 में वहां था। दिरांग घाटी में बहती नदी के तट पर गर्म पानी का एक सोता भी है। घाटी चारों तरफ छोटी छोटी पहाड़ियों से घिरी है और वहां चलती तेज़ हवाएं, हर चीज़ को उड़ा देने पर आमादा दिखती हैं। बोमडिला से दिरांग का 42 किलोमीटर का रास्ता, गहरी घाटियों से पटा है।
फरवरी 2005 की उस शाम, जब मैं दिरांग के “बुद्ध फेस्टिवल” के उद्घाटन समारोह के पश्चात, लॉज की तरफ़ बढ़ रहा था तो मेरे पास एक छोटा सा बैग था जिसमें कुछ कपड़े थे और एक Meltron recorder था जो 12 बड़ी बैट्रियों से चलता था जिसके चलते उस का वज़न कम अज़ कम 06 किलो था।
वहां कोई नहीं था
दिरांग के फेस्टिवल ग्राउंड से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित लॉज तक एक खड़ी चढ़ाई पार कर ही पहुंचा जा सकता था। मैंने दिन भर कुछ नहीं खाया था, इस लिए थकान और ज़्यादा लग रही थी। मैंने तै किया था कि लॉज पहुंच कर कमरे में रिकॉर्डर रख कर, दुबारा ग्राउंड में आ कर स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ़ उठाऊंगा। लेकिन जब मैं लॉज में पहुंचा तो यह देख कर सन्नाटे में आ गया कि वहां कोई नहीं था। लॉज के मालिक ने सुबह मुझे जो कमरा दिखाया था, वह भी अंदर से बंद।
झल्लाते हुए चीख
फरवरी की एक बेहद ठंडी रात में,एक नितांत अनजान प्रदेश में, अपने घर से हज़ारों किलोमीटर दूर, मैं ख़ुद को अत्यंत असुरक्षित महसूस करने लगा। अंततः मैंने सोचा कि उसी कमरे का दरवाज़ा खटखटाया जाए जो कमरा लॉज मालिक ने मुझे दिखाया था। एक मात्र वही कमरा था जिस पर ताला नहीं लगा था। मैंने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया, पर अंदर से कोई हरक़त नहीं हुई। दूसरी बार मैंने थोड़ा तेज़ खटखटाया। इस बार दरवाज़ा भड़ाक से खुला और एक लहीम शहीम शख्स ने लगभग आँख मलते हुए दरवाज़ा खोला। “क्या है?” उस ने झल्लाते हुए चीख़ कर पूछा। मेरे गले में स्वर जैसे फंस गए थे। फिर भी मैंने पूरी कोशिश कर मंद सप्तक में कहा। “यह कमरा तो लॉज वाले ने मुझे दिया था, आप यहां कैसे?” उस भले मानुस को यह समझ नहीं आ रहा था कि मैं आख़िर कहना क्या चाह रहा था? उस ने सिर्फ इतना कहा “ए ई परेशान मत करो।” और फिर धड़ाक से दरवाज़ा बंद कर दिया। उस वक़्त मुझे अपनी मूर्खताओं का काफ़ी कायदे से अहसास होने लगा।
अजीब संकट और आश्चर्य
दर असल सुबह जब मैं लॉज मालिक से मिला था तो न तो मैंने कमरे में ताला लगाकर चाभी ली थी, न लॉज मालिक का फोन नंबर लिया था। मैं तो बुद्ध फेस्टिवल के नाम से इतना उत्साहित था कि मैंने सोचा था कि थोड़ी देर में आ कर यह सब कार्य कर लूंगा। अब रात दस बजे मेरे लिए एक अजीब संकट था। इसी उहा पोह में, मैं लॉज से बाहर आया तो एक आश्चर्य मेरे सामने उपस्थित था। बाहर एक टाटा सूमो का ड्राइवर “बोमडिला”,”बोमडिला” की आवाज़ लगा कर सवारियां ढूंढ़ रहा था। मुझे लगा कि वह टाटा सूमो का ड्राइवर न हो कर कोई देव दूत था। मैं तुरत टाटा सूमो में जा बैठा। थोड़ी देर में टाटा सूमो चल दी।
थकान भूख और भूत विमर्श
बोमडिला में मेरा कमरा बुक था। टाटा सूमो में ड्राइवर की बगल की सीट पर एक दुबला पतला नेपाली भाषी बैठा था। गाड़ी चलने के थोड़ी देर बाद ही वह नेपाली भाषी, ड्राइवर से कहने लगा “ड्राइवर, तुमने कभी भूत देखा है?” ड्राइवर ने नकारात्मक स्वर में सिर हिला कर कहा “नहीं”। उस नेपाली भाषी ने बताया कि उसने देखा है। फिर वह सड़क के नीचे की घाटियों की तरफ़ इशारा कर बताने लगा कि कैसे घाटियों में भूत रहते हैं। लगातार एक घंटे तक ड्राइवर और उस नेपाली भाषी के बीच ” भूत विमर्श” चलता रहा। मैं पीछे की सीट पर थकान और भूख से परेशान हाल था। थकान और भूख के बीच वह भूत विमर्श मुझे भयंकर तरीक़े से चिड़चिड़ा रहा था। मेरा मन हुआ कि मैं चिल्लाकर बोलूं “देखो, तुम्हारे पीछे एक भूत बैठा है। मैं एक भूत हूं।”








