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आसीर करो या जुबां काटो: जाग उठा है युवाओं का आक्रोश

इतिहास गवाह है कि किसी भी जन-आंदोलन का बीज हमेशा एक ‘प्रतिक्रिया’ (Reaction) से ही पड़ता है। जब तक व्यवस्था का दबाव आम आदमी की बर्दाश्त की सीमा को पार नहीं करता, तब तक कोई बड़ा प्रतिरोध जन्म नहीं लेता। चाहे वह क्रूर मुगलिया सल्तनत का दौर रहा हो, दमनकारी ब्रिटिश हुकूमत का काल हो या फिर देश को आजादी मिलने के बाद आई लोकतांत्रिक सरकारें—समय के साथ सत्ताओं के चेहरे बदले हैं, लेकिन उनका चरित्र आज भी वही नजर आता है।

हाल ही में सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच तेजी से उभरा ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का डिजिटल आंदोलन इसी शाश्वत सत्य की एक नई और आधुनिक बानगी है। इस पूरे घटनाक्रम और सत्ताओं के बदलते चरित्र को समझने के लिए हमें जन-चेतना के इन महत्वपूर्ण पड़ावों को देखना होगा:

गौरतलब है अभिजित दीपके का ये एक्स पोस्ट https://x.com/abhijeet_dipke/status/2058240354290192425?s=20

1. लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना: ‘अपनों’ के हाथों शोषण

आजादी के आंदोलन के समय देशवासियों को यह उम्मीद थी कि जब विदेशी हुकूमत जाएगी, तो जनता का शासन आएगा और उनके दुखों का अंत होगा। लेकिन आज की विडंबना देखिए—अलबत्ता अब आपका शोषण करने वाला कोई गैर नहीं, आपके अपने ही लोग हैं। इस बात से भले ही मन को संतोष दिया जा सकता है कि शासक हमारे अपने देश के हैं, लेकिन यह कड़वी हकीकत अपनों के दिए जख्मों को कम नहीं, बल्कि और ज्यादा गहरा कर देती है।

किरन रिजीजू का खोखला बयान https://x.com/KirenRijiju/status/2058186840738500819?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E2058186840738500819%7Ctwgr%5E3e59b4dd7328af886882cad1e761a6fb0c506271%7Ctwcon%5Es1_c10&ref_url=https%3A%2F%2Ftimesofindia.indiatimes.com%2Findia%2F94-audience-from-india-cockroach-janta-party-founder-rejects-bjps-pakistani-followers-charge%2Farticleshow%2F131287939.cms

2. ‘जनता का भी मैं होता है’: मुफ्त की घूस बनाम संतान का भविष्य

सत्ताएं अक्सर इस मुगालते में रहती हैं कि वे मुफ्त की दाल-रोटी की ‘घूस’ (रेवड़ियों) से जनता का मुंह बंद कर देंगी और वे कभी सवाल नहीं पूछेंगे। लेकिन सत्ताधीश यह भूल जाते हैं कि “जनता का भी एक ‘मैं’ (स्वाभिमान) होता है।” जब उस नागरिक गरिमा पर चोट होती है, तो आदमी मुफ्त के टुकड़ों से ऊब जाता है।

पियूष राठौर का किरन रिजीजू को जवाब-https://x.com/piusxfr/status/2058256144515424335?s=20

आज जब एक लाचार मां-बाप अपने 35 से 40 बरस के हो रहे युवाओं को अच्छी नौकरी की आस में, लाखों रुपये शिक्षा में लगाकर दर-दर भटकते देखते हैं, तो उनका कलेजा नुचता है। अपनी आंखों के सामने संतान का भविष्य अंधकार में जाते देख जो आक्रोश पनपता है, उस पर सत्ताओं के ‘ढपोरशंखी बयान’ और खोखले दावे मरहम नहीं बनते, बल्कि उस नाराजगी की आग में घी का काम करते हैं।

3. सोशल मीडिया: आधुनिक युग का हथियारविहीन ‘सत्याग्रह’

जिस तरह महात्मा गांधी ने बिना कोई शस्त्र उठाए उस दौर में जनता को ‘सत्याग्रह’ का महामंत्र दिया था—कि सत्ता चाहे जितना भी मजबूर करे, शस्त्र नहीं उठाना है—ठीक उसी तरह आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया आम जनता के लिए एक ‘हथियारविहीन प्रतिरोध’ का नया स्पेस बन गया है।

चाटुकारिता का एक और चेहरा-https://x.com/PTI_News/status/2058105473455526211?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E2058105473455526211%7Ctwgr%5E3e59b4dd7328af886882cad1e761a6fb0c506271%7Ctwcon%5Es1_c10&ref_url=https%3A%2F%2Ftimesofindia.indiatimes.com%2Findia%2F94-audience-from-india-cockroach-janta-party-founder-rejects-bjps-pakistani-followers-charge%2Farticleshow%2F131287939.cms

जब अपनी ही चुनी हुई सरकारें ब्रिटिश हुकूमत की तर्ज पर जमीनी आंदोलनों को लाठियों, पानी की बौछारों और कानूनी बंदिशों से कुचलने पर आमादा हो जाती हैं, तो लोगों को सोशल मीडिया पर अपने विरोध को स्वर देने का एक मंच मिलता है। युवा अब मीम्स, ट्रेन्ड्स और तीखी डिजिटल टिप्पणियों के जरिए सत्ता के अहंकार पर प्रहार कर रहे हैं।

4. जब युवा शक्ति थामती है पताका, तो ढह जाते हैं साम्राज्य

किसी भी आंदोलन की शुरुआत और उसकी सफलता हमेशा युवा शक्ति के हाथों में होती है। अगर देश का युवा सत्ता के नशे में चूर है, सतही विज्ञापनों और झूठे नैरेटिव में मदहोश है, तो कोई आंदोलन खड़ा नहीं हो सकता। लेकिन जब यही युवा शक्ति जाग उठती है और अपने हक के लिए प्रतिरोध की पताका थाम लेती है, तो एक ऐसा बवंडर बनता है जिसे दुनिया की कोई भी साम्राज्यवादी या दमनकारी ताकत रोक नहीं सकती।

राजीव चंद्र शेखर का पोस्ट- https://x.com/RajeevRC_X/status/2058026399139778877?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E2058026399139778877%7Ctwgr%5E3e59b4dd7328af886882cad1e761a6fb0c506271%7Ctwcon%5Es1_c10&ref_url=https%3A%2F%2Ftimesofindia.indiatimes.com%2Findia%2F94-audience-from-india-cockroach-janta-party-founder-rejects-bjps-pakistani-followers-charge%2Farticleshow%2F131287939.cms

चाहे वह अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम हो या सत्तर के दशक का ऐतिहासिक जेपी आंदोलन—जीत हमेशा युवाओं के इसी आक्रोश की हुई है।

5. दमन से कभी नहीं मरती विद्रोह की आवाज: “ख्यालों को बेड़ी नहीं पिन्हा सकते”

जब भाजपा नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने कॉकरोच जनता पार्टी के इस स्वतःस्फूर्त आंदोलन को “पाकिस्तानी साजिश” या “विदेशी ताकतों का हाथ” बताकर खारिज करने की कोशिश की, और इसके बाद अकाउंट्स को ब्लॉक या हैक करने की खबरें आईं, तो यह साफ हो गया कि सत्ता इस वैचारिक नैरेटिव से बुरी तरह डर गई है।

गौरतलब है ये स्टोरी- https://tesariaankh.com/rahul-gandhi-political-journey-and-future-hope/

लेकिन सत्ता के ठेकेदार यह भूल जाते हैं कि आप किसी के शरीर को बंधक बना सकते हैं, इंटरनेट को सेंसर कर सकते हैं, या डरा-धमकाकर जुबान काट सकते हैं, लेकिन विचारों को कभी बेड़ियां नहीं पहना सकते। आज की सत्ता भी ठीक उसी राह पर चलती दिख रही है जिस पर कभी आपातकाल के दौरान कांग्रेस चली थी, और बाद में उसे अपनी इस ऐतिहासिक गलती का दंश दशकों तक भुगतना पड़ा। लोकतांत्रिक बदलाव का चक्र अनिवार्य है; जो आज सत्ता के मद में चूर हैं, कल जब वे सत्ता से बाहर होंगे, तो उन्हें भी जनता के इस आक्रोश का दंश वैसे ही भोगना पड़ेगा।

सच्चाई छिप नहीं सकती

मशहूर शायर नवाज़ देवबंदी का एक कालजयी शेर आज की व्यवस्था पर बिल्कुल सटीक बैठता है:

“सच्चाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से,

कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से।”

क्या तुष्टिकरण की राजनीति का अंत निकट है-https://tesariaankh.com/2026-election-analysis-bengal-tamil-nadu-kerala/

सत्ताओं का जनहित का यह आवरण पूरी तरह कागजी है। सरकारें विज्ञापनों और दावों के चाहे कितने भी कागजी फूल सजा लें, लेकिन उसमें से जनता के कल्याण की वास्तविक खुशबू नहीं आ सकती। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे अभियान कोई बनावटी नैरेटिव नहीं, बल्कि व्यवस्था से त्रस्त देश के युवा और नागरिकों के आत्मसम्मान की वह गूंज है, जिसे दबाना अब किसी भी सत्ता के बस में नहीं है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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