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Agriculture Crisis 2026: नहरों की कब्र पर खड़ा शहर क्या खाकर जीवित रहेगा? आंकड़ों के जाल में दफन सिंचाई, जाने सच

Agriculture Crisis 2026: आवासीकरण और शहरीकरण की भूख इसी तरह उपजाऊ ज़मीन और नहरों को निगलती रही, तो वे आलीशान नर्सिंग होम और चमकते मॉल अन्न नहीं उगा पाएंगे। पीआईबी की ताजा रिपोर्ट केवल आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि उस ‘उखड़ती सांस’ की पुकार है जो मेड़ पर बैठा किसान हर रोज़ महसूस कर रहा है। क्या हम वाकई उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब हमारे पास रहने को कंक्रीट के महल तो होंगे, पर थाली में अन्न का दाना नहीं? इतना ही नहीं यह चार्ट, ये आंकड़े और ये रिपोर्ट उस ‘मुफ़लिसी’ की चीख है जिसे सत्ता के गलियारों में अनसुना कर दिया जाता है। हमें समझना होगा कि शहर तब तक जीवित है जब तक गाँव में हल चल रहा है। जिस दिन नहरों की आखिरी बूंद कंक्रीट के नीचे दब जाएगी, उस दिन विकास की ये इमारतें सिर्फ ‘कब्र के पत्थर’ साबित होंगी।

1. विकास का कंक्रीट और ‘क़ब्र’ में सोती सिंचाई

जब हम लखनऊ और कानपुर जैसे उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्रों की ओर देखते हैं, तो हमें चमकती सड़कें और नर्सिंग होम दिखाई देते हैं। लेकिन इस चमक के नीचे दबी है एक ज़मीनी हकीकत—उन नहरों की कब्रें जो कभी लाखों किसानों की उम्मीदों को पानी देती थीं। कानपुर में हैलट अस्पताल के पास जीटी रोड को पार करने वाली नहर का उदाहरण हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है। जिसे शहर वालों ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए ‘रोड़ा’ समझकर पाट दिया, वह दरअसल धरती की कोख भरने वाली जीवनरेखा थी। आज जब हम लखनऊ और कानपुर जैसे महानगरों की ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों को देखते हैं, तो गर्व महसूस करते हैं। लेकिन इसी चमक के नीचे वह ‘सफेद झूठ’ दबा है जिसे हम विकास कहते हैं। कभी उत्तर प्रदेश के इन मैदानों को जीवन देने वाली छोटी नदियां और नहरें आज नक्शे से गायब हैं। जहाँ कभी पानी की कल-कल होती थी, वहाँ आज ‘नर्सिंग होम’, ‘कार्पोरेट ऑफिस’ और ‘मॉल’ सीना ताने खड़े हैं। यह विकास नहीं, बल्कि उस जीवनदायिनी व्यवस्था की ‘हत्या’ है जो पीढ़ियों से अन्नदाता का संबल थी।

2. आंकड़ों का मायाजाल: क्या यह वाकई प्रगति है?

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी ग्रीष्मकालीन फसलों के आंकड़े (12 मई 2026) एक अजीब विरोधाभास पेश करते हैं।

फसल श्रेणी चालू वर्ष (2026) पिछले वर्ष (2025) अंतर (लाख हेक्टेयर)
चावल 31.05 32.42 -1.36 (गिरावट)
कुल रकबा 83.08 80.01 +3.07

आंकड़ों के पीछे का सच:

  • नगण्य वृद्धि: 3.07 लाख हेक्टेयर की कुल वृद्धि देश की बढ़ती आबादी के मुकाबले ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ है।

  • चावल का घटता रकबा: मुख्य खाद्यान्न चावल के रकबे में गिरावट भविष्य के बड़े खाद्य संकट की ओर इशारा कर रही है।

  • महीन बाजरा: 0.03 लाख हेक्टेयर पर स्थिर खड़ा यह आंकड़ा बताता है कि मोटे अनाज के प्रचार के बावजूद ज़मीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी मई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, ग्रीष्मकालीन फसलों के कुल रकबे में 3.07 लाख हेक्टेयर की मामूली वृद्धि दर्ज की गई है। लेकिन जब हम इसकी गहराई में जाते हैं, तो डरावनी तस्वीर सामने आती है:

  • चावल का संकट: सबसे प्रमुख फसल चावल के रकबे में 1.36 लाख हेक्टेयर की गिरावट आई है (32.42 लाख से घटकर 31.05 लाख हेक्टेयर)।

  • महीन बाजरा: इसका रकबा 0.03 लाख हेक्टेयर पर स्थिर है।

  • दिखावटी बढ़त: दलहन और तिलहन में जो मामूली बढ़त दिखी है, वह बढ़ती जनसंख्या और सिमटती उपजाऊ भूमि के अनुपात में नगण्य है।

ये आंकड़े किसान की ‘उखड़ती सांसों’ का आईना हैं। कागजों पर रकबा बढ़ सकता है, लेकिन किसान की जेब और उसकी उम्मीदों का ग्राफ लगातार गिर रहा है।

3. नहरों का अंत: पारिस्थितिकी तंत्र की ‘हत्या’

रिपोर्ट में यह रेखांकित करना अनिवार्य है कि नहरें सिर्फ सिंचाई का ज़रिया नहीं थीं।

  • प्राकृतिक पुनर्भरण (Recharge): नहर से होने वाला ‘सीपेज’ (पानी का रिसाव) पूरे इलाके के भू-जल स्तर को बनाए रखता था।

  • ट्यूबवेल का बोझ: आज नहरें खत्म होने से किसान ट्यूबवेल पर निर्भर है, जो धरती को सोख रहा है, जबकि नहरें उसे ‘सींचती’ थीं। नर्सिंग होम और कॉर्पोरेट दफ्तरों के नीचे दबी ये नहरें अब शहर को पानी तो नहीं दे सकतीं, लेकिन आने वाले समय में अकाल ज़रूर दे सकती हैं।

4. मानवीय विडंबना: बेरुखी और तंगहाली

शहर और गाँव के बीच का रिश्ता अब भावनात्मक नहीं, बल्कि शुद्ध बाज़ारू हो गया है।

  • दोहरा शोषण: किसान एक तरफ घटते संसाधनों और महंगी खाद-बीज की मार झेल रहा है, तो दूसरी तरफ अपनों की बेरुखी की। शहर में बसा भाई ज़मीन बेचना चाहता है, पर गाँव में पसीना बहाने वाले भाई को वह ज़मीन रियायत पर नहीं देता।

  • अफ़सरशाही का पर्दा: सरकारी कागजों पर योजनाएं फल-फूल रही हैं, लेकिन चार्ट का आईना किसान की ‘कंगाली, तंगहाली और मुफ़लिसी’ को साफ बयां कर रहा है।

आज गाँव और शहर के बीच का रिश्ता केवल ‘स्वार्थ’ की डोर से बँधा है। शहर में बैठा भाई गाँव की ज़मीन को सिर्फ एक ‘रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट’ मानता है।

  • वह गाँव के भाई को ज़मीन जोतने नहीं देता कि कहीं कब्ज़ा न हो जाए।

  • वह ज़मीन को बिल्डर को ऊंचे दामों पर बेच देगा, लेकिन अपने ही परिवार को खेती के लिए रियायत नहीं देगा। इस स्थिति में किसान न केवल व्यवस्था से, बल्कि अपनों की बेरुखी से भी हार रहा है। उसका घर सिमट रहा है, खेत सिमट रहे हैं और अंततः उसकी हिम्मत भी सिमट रही है।

7. नहरों का ‘कब्रिस्तान’ और जल-विज्ञान की अनदेखी

कानपुर में हैलट अस्पताल के पास जीटी रोड को पार करने वाली उस ऐतिहासिक नहर का उदाहरण रोंगटे खड़े कर देने वाला है। शहर वालों के लिए वह नहर सिर्फ एक बाधा थी, जिसे पाटकर दुकानें बना ली गईं। लेकिन वे यह भूल गए कि:

  • नहर बनाम ट्यूबवेल: एक नहर केवल सिंचाई नहीं करती, वह ‘रिसाव’ (Seepage) के जरिए मीलों तक धरती की कोख भरती है। जो काम कोई ट्यूबवेल नहीं कर सकता, वह नहर की बूंद-बूंद करती है।

  • नमी का अंत: जब नहरों को दफन किया गया, तो ज़मीन की प्राकृतिक नमी खत्म हो गई। अब किसान को कंक्रीट के जंगलों के बीच से अपनी फसलों के लिए पानी निचोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

9. भविष्य की चेतावनी: कंक्रीट क्या भूख मिटाएगा?

शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और वनों की कटाई ने हमें एक ऐसे मुहाने पर खड़ा कर दिया है जहाँ ‘खाद्य संकट’ अब कोई कल्पना नहीं, बल्कि कड़वी हकीकत है। यदि नहरों को इसी तरह दफन किया जाता रहा और कृषि योग्य भूमि पर कंक्रीट के नर्सिंग होम उगते रहे, तो आने वाली नस्लें सोना-चांदी या सीमेंट तो खाएंगी नहीं।

बीते सप्ताह की बड़ी घटनाएं जानने केलिए पढ़ें यहां-

 https://tesariaankh.com/tisari-aankh-ki-saptahiki-weekly-roundup-may-2026/

समय है कि हम:

  1. कृषि भूमि के गैर-कृषि उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएं।

  2. पुरानी नहरों और लुप्त होती नदियों के पुनरुद्धार को ‘इमरजेंसी मिशन’ घोषित करें।

  3. किसान को केवल ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि इस देश की ‘धड़कन’ समझकर नीतियां बनाएं।

यह रिपोर्ट 12 मई 2026 को जारी ग्रीष्मकालीन फसलों के आंकड़ों और शहरीकरण के कृषि पर पड़ते प्रभावों का विश्लेषण कर रही है। जहाँ कागजों पर मामूली बढ़त तो दिखती है, वहीं धरातल पर संसाधनों का सिमटना एक गंभीर ‘खाद्य संकट’ की आहट दे रहा है।

10. सांख्यिकीय अवलोकन (ग्रीष्मकालीन फसलें – 2026)

नीचे दिया गया चार्ट पिछले वर्ष की तुलना में चालू वर्ष की प्रगति को दर्शाता है:

फसल चालू वर्ष (2026) पिछले वर्ष (2025) अंतर (लाख हेक्टेयर)
चावल 31.05 32.42 -1.36 (गिरावट)
दलहन 24.97 23.76 +1.21
महीन बाजरा 0.03 0.03 0.00 (स्थिर)
श्री अन्न (मोटे अनाज) 16.01 14.25 +1.77
तिलहन 11.04 9.58 +1.47
कुल योग 83.08 80.01 +3.07

मुख्य निष्कर्ष: कुल रकबे में 3.07 लाख हेक्टेयर की वृद्धि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में “ऊंट के मुंह में जीरा” के समान है। चावल जैसे मुख्य खाद्यान्न के रकबे में गिरावट चिंताजनक है।

11. संसाधनों का कब्रिस्तान

आंकड़ों से परे, वास्तविक संकट “सिमटते संसाधनों” का है। शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार केवल ज़मीन नहीं निगल रहे, बल्कि कृषि की जीवनरेखा को भी दफन कर रहे हैं।

  • नहरों का विलोपन: कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों का उदाहरण गवाह है कि कैसे पुरानी नहरों को पाटकर नर्सिंग होम और कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए।

  • पारिस्थितिकीय प्रभाव: नहरें केवल सिंचाई का साधन नहीं थीं, बल्कि वे ‘ग्राउंड वाटर’ को रिचार्ज करने का प्राकृतिक माध्यम थीं। उनके खत्म होने से ट्यूबवेल पर निर्भरता बढ़ी है, जो मिट्टी की नमी और जल स्तर दोनों को सोख रहा है।

  • आवासीकरण: कृषि योग्य भूमि का आवासीय कॉलोनियों में बदलना भविष्य में उत्पादन क्षमता को स्थायी रूप से समाप्त कर रहा है।

12. सामाजिक और आर्थिक विडंबना

किसान आज दोहरे शोषण का शिकार है:

  1. पारिवारिक अलगाव: शहरों में बसे लोग गाँव की ज़मीन को केवल एक ‘प्रॉपर्टी’ की तरह देखते हैं। वे इसे बेचने को तैयार हैं, लेकिन खेती करने वाले भाइयों को रियायती दर पर देने या जोतने देने में हिचकते हैं।

  2. कागज़ी योजनाएं: अफ़सरशाही के आंकड़ों में ‘प्रगति’ दिखती है, लेकिन वह किसान की कंगाली और मुफ़लिसी का समाधान नहीं कर पा रही है। किसान की “उम्मीदें” उन बुनियादी सुविधाओं के साथ दफन हो रही हैं जो कभी उसे विरासत में मिली थीं।

यदि कृषि योग्य भूमि के गैर-कृषि उपयोग पर सख्त कानून नहीं बनाए गए और जल संसाधनों (नहरों/नदियों) के संरक्षण को ‘मास्टर प्लान’ का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाया गया, तो देश एक बड़े खाद्य संकट की ओर बढ़ जाएगा।

“विकास की चमक तब तक अधूरी है, जब तक अन्नदाता की सांसें और उसकी ज़मीन सुरक्षित नहीं हैं।”

संदर्भ: PIB प्रेस विज्ञप्ति (12 मई 2026)

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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