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UPSC 2026: ‘रणछोड़’ से ‘रणविजय’ तक—एक पिता का कबूलनामा

UPSC 2026: आज रविवार है। सुबह की पहली किरण के साथ जब मेरा छोटा बेटा ‘मॉक टेस्ट’ देने के लिए घर से निकला, तो मुझे करीब तीन दशक पुराना अपना वह दिन याद आ गया। यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा थी, मैं सेंटर के गेट तक पहुँचा भी था, लेकिन वहाँ उमड़ी ‘दिग्गजों’ की भीड़ और उनके गंभीर चेहरों को देखकर मेरे हाथ-पांव फूल गए। उस भीड़ के मनोविज्ञान ने मुझे इतना डराया कि मैं बिना परीक्षा दिए बैरंग वापस लौट आया। उस दिन मैं अपनी ही नजरों में ‘कायर’ साबित हुआ था, क्योंकि मेरा डर मेरी काबिलियत से बड़ा हो गया था।

आज जब 24 मई की UPSC प्रिलिम्स परीक्षा में मात्र 14 दिन बचे हैं, तो मैं अपने घर में एक अलग ही दृश्य देख रहा हूँ। एक ऐसा दृश्य जो मनोविज्ञान और जीवन के रंगों के सरगम से सजा है।

जिद का ‘सप्तरंगी’ सफर

मेरे बच्चों की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। बड़े बेटे ने इंजीनियरिंग चुनी, तो छोटे ने कानून (Law)। बड़े की जिद ‘श्रेष्ठता’ (Excellence) की थी—GATE क्वालीफाई करने के बाद भी वह तब तक नहीं रुका जब तक उसने अपनी पसंद के संस्थान से शोध (PhD) शुरू नहीं कर दिया। वह आज तकनीक की उन गहराइयों (VLSI) में उतर रहा है, जहाँ देश का डिजिटल भविष्य तय होता है।

वहीँ छोटा बेटा, जिसकी ‘जिद’ का आलम यह था कि एक बेहतर यूनिवर्सिटी के लिए उसने 24 घंटे के भीतर बस, ट्रेन और नाव तक का सहारा लेकर आधा हिंदुस्तान नाप दिया। आज वह यूपीएससी के उस मैदान में खड़ा है जहाँ से मैं कभी भाग खड़ा हुआ था।

मेरा प्रयोग: न डांटा, न मारा, बस ‘आसमान’ दिया

एक पत्रकार के रूप में मैंने जीवन भर संघर्ष देखा। समाज की विसंगतियों को करीब से महसूस किया। तभी मैंने तय किया था कि मैं अपने बच्चों को ‘अनुशासन’ के पिंजरे में नहीं रखूँगा, बल्कि उन्हें ‘आजादी और समझ’ का खुला आकाश दूँगा।

सच तो यह है कि आज तक मैंने अपने दोनों बेटों को न कभी मारा, न डांटा। यहाँ तक कि कभी पढ़ने के लिए भी नहीं टोका। मेरा प्रयोग सीधा था—“अगर बच्चे को खुद की जिम्मेदारी का अहसास हो जाए, तो उसे किसी बाहरी दबाव की जरूरत नहीं पड़ती।” आज घर की दीवारों पर सजे मैडल और शील्ड्स गवाह हैं कि बिना डराए भी बच्चे शिखर तक पहुँच सकते हैं।

UPSC 2026: 24 मई की धुन और ‘4S’ का गणित

यूपीएससी की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए आखिरी 14 दिन सबसे कठिन होते हैं। यहाँ किताबों से ज्यादा दिमाग का खेल होता है। मेरे बेटे का कहना है—“कोर्स पूरा होना सिर्फ पहला पड़ाव है, असली चुनौती उस 2 घंटे के दबाव में खुद को साबित करने की है।”

तैयारी के इस अंतिम दौर में ‘4S’ फार्मूला ही आपकी किस्मत बदल सकता है:

  1. Study (अध्ययन): जो पढ़ा है, उस पर अटूट भरोसा।

  2. Stress (तनाव प्रबंधन): परीक्षा के डर को अपनी एकाग्रता (Focus) में बदलना।

  3. Stamina (सहनशक्ति): एग्जाम हॉल में दिमाग को थकने न देना।

  4. Success (सफलता): जब पहले तीन ‘S’ मिलते हैं, तो चौथा ‘S’ खुद-ब-खुद मिल जाता है।

संदेश: भीड़ से मत डरिए, खुद को चुनिए

आज के परीक्षार्थी जो स्ट्रेस में हैं, उन्हें बस इतना समझना है कि हर ‘दिग्गज’ भी कभी न कभी ‘जीरो’ से ही शुरू करता है। वह भीड़, जो मुझे डरा गई थी, दरअसल वह सिर्फ एक भ्रम है। असली मुकाबला आपके अपने ‘भय’ से है।

मैंने कभी मैदान छोड़ दिया था, लेकिन आज मेरे बच्चे उसी भीड़ को चीरकर आगे बढ़ रहे हैं। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उन्हें घर में ‘भय’ नहीं, ‘भरोसा’ मिला। हार जाना बुरा नहीं है, लड़ने से पहले मैदान छोड़ देना दुखद है।

अगर आप अपने बच्चों को वाकई सफल देखना चाहते हैं, तो उन्हें दिशा मत दीजिये, उन्हें ‘दृष्टि’ दीजिये। और परीक्षार्थियों के लिए बस इतना ही—24 मई की जंग केवल किताबों से नहीं, ‘कौशल’ और ‘कलेजे’ से जीती जाएगी। अपनी जिद को कमजोर मत पड़ने दीजिये, क्योंकि रास्ता उन्हीं के लिए बनता है जो मैदान में डटे रहते हैं।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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