आज जब हम 21वीं सदी में महिला सशक्तिकरण और संसद में उनके 33 प्रतिशत आरक्षण का ढिंढोरा पीट रहे हैं, तब केरल के तिरुवनंतपुरम से आई एक तस्वीर ने लोकतंत्र के दावों की कलई खोल दी है। यह घटना साबित करती है कि राजनीति में ‘मर्यादा’ और ‘शुचिता‘ जैसे शब्द केवल चुनावी रैलियों के लिए बचे हैं, जबकि हकीकत में सत्ता के गलियारों में महिलाओं को आज भी एक ‘आसान निवाला’ और ‘वस्तु‘ समझने वाली कुत्सित मानसिकता हावी है।
केरल की शर्मनाक घटना: जब जीत के सम्मान की जगह मिला ‘अवांछित स्पर्श’
हाल ही में संपन्न हुए केरल विधानसभा चुनाव 2026 में 48 वर्षीय कांग्रेस नेता कृष्णा ने कोल्लम सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 20 साल बाद उस सीट पर किसी महिला ने कब्जा किया था। लेकिन इस सफलता का ‘पुरस्कार’ उन्हें क्या मिला? सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में वरिष्ठ कांग्रेस नेता फिलिप को सरेआम विधायक कृष्णा के कंधे पर हाथ रखते और उनकी कमर को छूते हुए देखा गया। कृष्णा की असहजता साफ झलक रही थी, उन्होंने तुरंत हाथ जोड़कर खुद को दूर किया और वहां से निकल गईं। यह केवल एक ‘गलत व्यवहार’ नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक अपराधी सोच का परिणाम है जो मानती है कि एक महिला चाहे विधायक बन जाए या मंत्री, वह पुरुषों की जागीर ही रहेगी।

नीतीश कुमार से लेकर वर्तमान तक: दोहराई जाती अभद्रता
यह मानसिकता किसी एक राज्य या पार्टी तक सीमित नहीं है। कुछ समय पहले बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरह एक महिला का मास्क हटाने का प्रयास किया था, वह भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी थी। जब शीर्ष पदों पर बैठे पुरुष नेता सार्वजनिक मंचों पर ऐसी हरकतें करने का साहस जुटा लेते हैं, तो वे स्पष्ट संदेश देते हैं कि वे महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और उनके ‘पर्सनल स्पेस’ का रत्ती भर भी सम्मान नहीं करते।
ऐतिहासिक प्रहार: जयललिता और मायावती के जख्म
भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे ‘चीरहरणों’ से भरा पड़ा है।
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जयललिता (1989): तमिलनाडु विधानसभा के भीतर डीएमके विधायकों द्वारा जयललिता की साड़ी खींचने की कोशिश ने पूरी दुनिया को शर्मसार किया था।
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मायावती (1995): लखनऊ का मीराबाई गेस्ट हाउस कांड जहाँ सपा के गुंडों ने एक दलित महिला नेता को उनके कमरे में बंद कर शारीरिक और मानसिक यातना देने की कोशिश की थी।
ये घटनाएं चीख-चीख कर कहती हैं कि पुरुष प्रधान सत्ता संरचना ने हमेशा सफल महिलाओं को उनके चरित्र, पहनावे या लिंग के आधार पर निशाना बनाकर उन्हें ‘बाजारू’ साबित करने की कोशिश की है। यहाँ तक कि कंगना रनौत जैसे किरदारों को भी उनकी पुरानी फिल्मों के आधार पर ‘हल्का’ किया जाता है।
सोनिया-प्रियंका का मौन और आरक्षण का पाखंड
आज सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी जैसी महिला नेता कांग्रेस का नेतृत्व कर रही हैं, लेकिन केरल की घटना पर उनका ‘मौन’ सबसे ज्यादा अखरता है। एक तरफ ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ का नारा है और दूसरी तरफ अपनी ही विधायक के साथ हुई बदसलूकी पर चुप्पी। क्या महिला आरक्षण केवल एक चुनावी पाखंड है?
कब बदलेगी हमारी सोच?
अंत में हालात देखकर यही लग रहा है कि कहीं कुछ नहीं बदला। चाहे बात स्मृति ईरानी की हो या जवाहरलाल नेहरू के दौर की महिलाओं की, या फिर मोहसिना किदवई जैसी धवल छवि की महिलाओं की—सबको कहीं न कहीं अपमानजनक कड़वी सच्चाई का जहर पीना पड़ा है। यह एक गहरी पीड़ा है।
महिलाओं के प्रति हमारी सोच कब बदलेगी? क्या हम महिलाओं को बराबरी का हक सिर्फ बिस्तर पर ‘हमसफर’ बनाकर देने से आगे की सोच नहीं रख सकते? यह एक बड़ा सवाल है, जो राजनीति के उन ‘पिस्सुओं’ के मुंह पर तमाचा है जो नारी को केवल एक वस्तु समझते हैं। जब तक ऐसी कुत्सित मानसिकता वाले नेताओं का बहिष्कार नहीं होगा, तब तक शुचिता की हर बात बेमानी रहेगी।








