भुवनेश्वर/रायगड़ा: 13 अप्रैल 2026। जब पूरा देश त्योहारों की खुशियों में डूबा है, ओडिशा के रायगड़ा और कोरापुट की पहाड़ियों में आदिवासी महिलाएं अपने ‘अस्तित्व’ की आखिरी लड़ाई लड़ रही हैं। यह लड़ाई सिर्फ एक सड़क या खदान की नहीं है, यह उस ‘सभ्यता’ को बचाने की है जिसे अंधी और बहरी सरकारों ने कॉरपोरेट के हाथों गिरवी रख दिया है।
1. दो दशक, एक ही दर्द: 2007 से 2026 तक का अनवरत संघर्ष
इतिहास खुद को दोहरा रहा है। 2007 में झारसुगुड़ा के केचोबाहाल गांव की महिलाओं ने लाठियां उठाकर ‘वन सुरक्षा समिति’ बनाई थी ताकि जंगल माफियाओं को खदेड़ा जा सके। उन महिलाओं ने बंजर जमीन को फिर से हरा-भरा किया था। आज 2026 में, रायगड़ा की महिलाएं उसी जज्बे के साथ ‘वेदांता’ जैसी विशालकाय कंपनी और सरकारी पुलिस के सामने ढाल बनकर खड़ी हैं।
यह विडंबना ही है कि जो हाथ जंगल उगाते हैं, आज उन्हीं हाथों को पुलिस की लाठियों और झूठे मुकदमों से कुचला जा रहा है।

2. सिजीमाली: लोकतंत्र के सीने पर ‘कॉरपोरेट’ का बूट
रायगड़ा के काशीपुर में जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
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तड़के 3 बजे का ‘आतंक’: ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने युद्ध जैसी रणनीति अपनाई। बिजली काटी गई और सोते हुए ग्रामीणों पर हमला किया गया।
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नारी शक्ति का अपमान: 11 मार्च 2026 को एक 19 वर्षीय गर्भवती महिला और दुधमुंहे बच्चों वाली मांओं को रात के अंधेरे में गिरफ्तार किया गया। क्या एक लोकतांत्रिक सरकार अपनी ही बेटियों के साथ ऐसा सलूक करती है?
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फर्जी ग्राम सभाएं: ‘वेदांता’ को खदान देने के लिए प्रशासन ने मरे हुए लोगों और छोटे बच्चों के फर्जी हस्ताक्षर करवाकर ‘सहमति’ का ढोंग रचा। सिजीमाली की पहाड़ियों में बसने वाले ‘तीजी राजा’ (देवता) की कसम खाकर आदिवासी कह रहे हैं—”जान देंगे, जमीन नहीं।”
3. खानाबदोश बनाने की सरकारी साजिश
ओडिशा भारत के खनिज भंडार का 17% हिस्सा समेटे हुए है, लेकिन इसका फायदा किसे मिल रहा है?
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अमीर जमीन, गरीब लोग: बॉक्साइट निकाल लिया जाएगा, एल्युमीनियम से विमान बनेंगे, लेकिन उन आदिवासियों का क्या होगा जिनका सब कुछ छिन जाएगा?
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धोखे की राजनीति: कलेक्टर द्वारा ‘पट्टा’ (दस्तावेज) मांगना उन लोगों के साथ क्रूर मजाक है जो पीढ़ियों से इस जंगल के मालिक हैं। PESA एक्ट और वन अधिकार कानून (FRA) को फाइलों में दफन कर दिया गया है।
4. कहाँ है जनमत? कहाँ है ‘ब्राह्मण-बनिया’ मीडिया?
सोशल मीडिया पर उठ रहा यह सवाल जायज है। जब आदिवासी महिलाएं अपनी जमीन बचाने के लिए गोलियां और लाठियां खाती हैं, तो मुख्यधारा का मीडिया अक्सर मौन रहता है।
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कॉरपोरेट-पुलिस नेक्सस: अस्पताल में घायल पुलिसकर्मियों के साथ कंपनी के अधिकारियों की तस्वीरें साफ करती हैं कि सत्ता का रिमोट किसके हाथ में है।
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सत्ता की नैतिकता: पूर्व मंत्री रानेंद्र प्रताप स्वैन ने सही सवाल उठाया—”क्या कॉरपोरेट शासन स्वीकार्य है?”
5. जनमत की अपील: क्या हम साथ खड़े हैं?
आज रायगड़ा और कोरापुट की पहाड़ियों से जो चीखें आ रही हैं, वे सिर्फ आदिवासियों की नहीं हैं। वे इस धरती के पर्यावरण को बचाने की आखिरी पुकार हैं।
https://x.com/lokeshbag67/status/2043363636962566634?s=20
यदि आज सिजीमाली और पट्टांगी की महिलाओं का हौसला टूट गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। यह समय पक्ष चुनने का है—आप ‘कॉरपोरेट मुनाफे’ के साथ हैं या उन ‘माटी की बेटियों’ के साथ जो सिर्फ सांस लेने के लिए अपना जंगल मांग रही हैं?
📢 एक सामूहिक पुकार: क्या हम अपनी ही माटी की चीख सुन पा रहे हैं?
यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों या घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि उस ‘आदिवासी अस्मिता’ की रक्षा के लिए एक आह्वान है जिसे विकास की वेदी पर बलि चढ़ाया जा रहा है।
जरा सोचिए…
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2007 में: जब झारसुगुड़ा की उन 50 महिलाओं ने माफियाओं के खिलाफ लाठियां उठाई थीं, तब उन्होंने सिर्फ जंगल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की ‘सांसें’ बचाई थीं। उन्होंने बंजर जमीन को फिर से हरा-भरा कर यह साबित किया था कि जंगल का असली संरक्षक कौन है।
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2026 में: आज वही महिलाएं फिर से लाठियां उठाने पर मजबूर हैं—लेकिन इस बार सामने सिर्फ माफिया नहीं, बल्कि पूरी सरकारी मशीनरी और कॉरपोरेट की ताकत है।
यह जनमत की अग्नि परीक्षा है: क्या हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जहाँ ‘विकास’ का मतलब आदिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना हो? जहाँ गर्भवती महिलाओं को रात के अंधेरे में जेलों में ठूंसा जाए ताकि एक निजी कंपनी का मुनाफा सुरक्षित रहे?
“जब अंतिम पेड़ कट चुका होगा, जब अंतिम नदी जहरीली हो चुकी होगी और जब अंतिम मछली पकड़ी जा चुकी होगी, तब जाकर हमें एहसास होगा कि हम ‘पैसा’ नहीं खा सकते।”
https://tesariaankh.com/politics-cachar-nehru-statue-bulldozer-culture-debate/
हमारी अपील: हम देश के हर जागरूक नागरिक, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और युवाओं से अपील करते हैं कि वे इस रिपोर्ट को जन-जन तक पहुँचाएं। ओडिशा की इन वीर महिलाओं का संघर्ष सिर्फ उनका नहीं, बल्कि हम सबका है। यदि आज हम मौन रहे, तो कल यह ‘कॉरपोरेट की भूख’ हमारे घरों के दरवाजों पर भी दस्तक देगी।








