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मणिकर्णिका घाट विवाद: क्या सत्ता को चुकानी पड़ सकती है भारी कीमत

मणिकर्णिका घाट विवाद: क्या विकास काशी की जीवन-शैली को बदल देगा?

वाराणसी।
काशी सिर्फ एक शहर नहीं, एक जीवन-दृष्टि है। यहां मृत्यु उत्सव है, अव्यवस्था अनुशासन है और विरोध मौन में दर्ज होता है। मणिकर्णिका घाट को लेकर उठा मौजूदा विवाद दरअसल किसी एक घाट के सौंदर्यीकरण या ध्वस्तीकरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह काशी की उस जीवन-शैली पर सीधा प्रहार है, जिसने सदियों से समय, सत्ता और सभ्यताओं को देखा है—और उन्हें अपने ढंग से पचा लिया है।

मणिकर्णिका घाट काशी का हृदय है, जहां चिता की अग्नि कभी बुझती नहीं। यहां जीवन और मृत्यु आमने-सामने बैठते हैं। डोम समुदाय, पंडे, साधु, तीर्थयात्री और स्थानीय लोग—सब इस घाट को किसी “परियोजना स्थल” की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा की तरह देखते हैं।

लेकिन हालिया विकास योजनाओं और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद सवाल उठ रहे हैं—क्या काशी को “मैनेज” किया जा सकता है? क्या मणिकर्णिका को सुव्यवस्थित करके उसकी आत्मा बची रह सकती है?

जीवन-शैली बनाम परियोजना

काशी की जीवन-शैली स्वतःस्फूर्त है। यहां न तो मृत्यु को छुपाया जाता है, न ही जीवन को सजाया जाता है। जब घाट पर बैरिकेड, तय रास्ते, निगरानी और सौंदर्यीकरण के नाम पर हस्तक्षेप बढ़ता है, तो काशी का फक्कड़पन असहज होने लगता है।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि मणिकर्णिका को देखने की चीज़ नहीं, जीने की प्रक्रिया है। यहां हर क्षण एक अनुष्ठान है, जिसे किसी मास्टर प्लान में नहीं बांधा जा सकता।

मौन असंतोष

काशी का विरोध शोर नहीं करता। यहां लोग नारे नहीं लगाते, बल्कि दूरी बना लेते हैं। “पहले जैसा नहीं रहा” — यह वाक्य इन दिनों घाटों पर बार-बार सुनाई देता है। यही वह संकेत है, जो बताता है कि भीतर कुछ टूट रहा है।

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पंडितों, डोमों और घाट से जुड़े परिवारों में यह आशंका गहरी है कि विकास की यह दौड़ कहीं काशी को एक दर्शनीय स्थल भर न बना दे—जहां श्रद्धा औपचारिक और मोक्ष पर्यटन पैकेज बन जाए।

क्या विकास विरासत को निगल जाएगा?

इतिहास बताता है कि काशी ने कई बार अपने स्वरूप बदले हैं, लेकिन अपनी आत्मा नहीं छोड़ी। फिर भी हर युग में यह सवाल लौटकर आता है—क्या आधुनिकता काशी को समझ रही है या सिर्फ प्रदर्शित कर रही है?

मणिकर्णिका घाट विवाद इस सवाल को एक बार फिर हमारे सामने खड़ा करता है। यदि काशी की जीवन-शैली—उसका सहजपन, निर्भीकता और मृत्यु से संवाद—कमज़ोर पड़ा, तो यह सिर्फ एक घाट का नुकसान नहीं होगा, बल्कि उस काशी का, जिसे शिव की नगरी कहा जाता है।

क्या काशी का ‘श्राप’ मोदी के अभियान को प्रभावित कर सकता है?

काशी में श्राप शब्द डराने के लिए नहीं, चेताने के लिए प्रयुक्त होता है। यह किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सत्ता के लिए होता है जो काशी को समझे बिना बदलने का प्रयास करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए काशी सिर्फ संसदीय क्षेत्र नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक और सांस्कृतिक अभियान का प्रतीक रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या काशी में उपजा असंतोष उनके अभियान को कमजोर कर सकता है?

श्राप का अर्थ क्या है?

काशी का श्राप कोई मंत्र नहीं, बल्कि लोक-चेतना का विचलन है। इतिहास गवाह है कि काशी ने कभी सीधे विद्रोह नहीं किया, लेकिन जब उसने दूरी बनाई—तो राजसत्ता को उसका मूल्य चुकाना पड़ा। यहां नाराज़गी तालियों की कमी में दिखती है, नारों की नहीं।

विकास बनाम आत्मा

मोदी सरकार ने काशी में बड़े पैमाने पर विकास कार्य किए—कॉरिडोर, घाटों का सौंदर्यीकरण, कनेक्टिविटी। लेकिन मणिकर्णिका घाट, प्राचीन मंदिरों के ध्वस्तीकरण के आरोप, और धार्मिक विरासत पर उठते सवाल एक अलग विमर्श को जन्म दे रहे हैं। यह विमर्श वोटिंग मशीन में नहीं, बल्कि विश्वास की दरार में दर्ज होता है।

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पांडित्य और फक्कड़पन की असहमति

काशी का पंडित सत्ता से सवाल पूछता है और काशी का फक्कड़ उसे चुनौती मानता है। जब दोनों चुप हो जाएं, तब समझना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है। मौजूदा हालात में यही मौन सबसे बड़ा संकेत है। समर्थन है, लेकिन पहले जैसी भावनात्मक तीव्रता नहीं।

क्या यह चुनावी नुकसान में बदलेगा?

सीधा उत्तर—जरूरी नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं।
काशी राष्ट्रव्यापी राजनीति का प्रतीक बन चुकी है। यहां उपजा असंतोष तुरंत हार में न बदले, लेकिन यह उस नैरेटिव को कमजोर कर सकता है, जिसमें मोदी को काशी का “स्वाभाविक प्रतिनिधि” माना गया है।

इतिहास की चेतावनी

इतिहास बताता है कि काशी ने कभी किसी को ताज नहीं दिया, लेकिन कई ताज उतरते देखे हैं। जो शासक इसे केवल परियोजना समझते रहे, वे समय के साथ अप्रासंगिक हो गए। काशी को साधने की कोशिश करने वालों को ही काशी ने सबसे पहले परखा है।

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काशी का श्राप कोई दैवी कोप नहीं, बल्कि नैतिक असंतुलन की प्रतिक्रिया है। अगर विकास काशी की आत्मा के साथ संवाद करता रहा, तो यह असंतोष पिघल सकता है। लेकिन अगर काशी को सिर्फ एक राजनीतिक मंच समझा गया, तो उसका मौन भारी पड़ सकता है।

क्योंकि काशी नाराज़ होकर शोर नहीं करती—
वह चुप होकर इतिहास लिखती है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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