उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के गठन में लंबे समय से हो रही देरी के बीच आखिरकार राज्य सरकार ने आयोग का गठन कर दिया है। आयोग के गठन के बाद अधिवक्ता डॉ. शमशेर यादव ‘जगराना’ ने इसे अपनी ओर से दाखिल जनहित याचिका और लगातार की गई पैरवी का परिणाम बताते हुए “जनहित की जीत” करार दिया है।
जगराना ने अपने फेसबुक पोस्ट में दावा किया कि उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के गठन में दो वर्ष से अधिक की देरी को लेकर उनके द्वारा दायर जनहित याचिका में हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार ने आयोग का गठन किया।
उनके मुताबिक, सुनवाई के दौरान अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि याचिका की लगातार पैरवी के दौरान आयोग के गठन में हो रही देरी के साथ-साथ हजारों लंबित शिकायतों का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया।
हाईकोर्ट की सख्ती के बीच तेज हुई प्रक्रिया
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ आयोग के रिक्त पदों को भरने में हो रही देरी पर राज्य सरकार से जवाब मांग रही थी।
20 अगस्त की सुनवाई में अदालत ने देरी पर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार को प्रक्रिया पूरी करने के लिए चार सप्ताह का और समय दिया था। अदालत ने यह भी नोट किया था कि आयोग के पद लंबे समय से रिक्त हैं।
यानी जिस आयोग के गठन को लेकर लंबे समय से प्रशासनिक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही थी, उस पर न्यायिक निगरानी बढ़ने के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला।
इसके बाद 8 सितंबर को उत्तर प्रदेश शासन के अल्पसंख्यक कल्याण अनुभाग-4 ने आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का कार्यालय आदेश जारी कर दिया।
मोहसिन रजा अध्यक्ष, आठ सदस्य नियुक्त
सरकारी आदेश के अनुसार मोहसिन रजा को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनके अलावा आठ सदस्यों की नियुक्ति की गई है।
नवनियुक्त अध्यक्ष और सभी सदस्यों को बधाई देते हुए जगराना ने उम्मीद जताई कि आयोग अब पूरी निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ काम करेगा और लंबे समय से लंबित शिकायतों के निस्तारण की दिशा में प्रभावी कदम उठाएगा।

‘लड़ाई किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के लिए नहीं थी’
जगराना ने अपने पोस्ट में लिखा कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि संस्था को सक्रिय कराने और हजारों पीड़ितों की शिकायतों को न्याय दिलाने के लिए थी।
उन्होंने कहा कि आयोग का गठन जनहित की जीत है और अब उम्मीद है कि नवनियुक्त आयोग निष्पक्षता एवं संवेदनशीलता के साथ जनहित में कार्य करेगा।
अब जगराना के दावे की अगली कसौटी आयोग का काम
हालांकि आयोग का गठन निश्चित तौर पर इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन अब असली सवाल उसके कामकाज को लेकर है।
यदि लंबे समय से शिकायतें लंबित हैं, तो नए आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका प्रभावी और समयबद्ध निस्तारण होगी। आयोग कितनी शिकायतों पर सुनवाई करता है, संबंधित विभागों से कितनी तेजी से जवाब मांगता है और शिकायतकर्ताओं को वास्तविक राहत कितनी मिलती है—इन्हीं सवालों से उसकी सक्रियता और प्रभावशीलता तय होगी।
इस लिहाज से देखा जाए तो जनहित याचिका ने जहां आयोग के गठन का रास्ता साफ करने में भूमिका निभाई, वहीं अब आयोग के कामकाज की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। जगराना का फेसबुक पोस्ट इस घटनाक्रम को अपनी जनहित याचिका की सफलता के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि सरकारी आदेश आयोग के गठन की पुष्टि करता है।
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दोनों को साथ रखकर देखें तो यह मामला प्रशासनिक देरी, न्यायिक निगरानी और जनहित के सवालों के बीच बनी एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है।
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