देश के नेता विपक्ष राहुल गांधी ने छात्रो से एक बड़ी बात कही है, कोटा, आप कमाल थे। यकीन मानिए, कल हमने मिलकर इतिहास की शुरुआत की। हज़ारों छात्र मैदान में थे, लाखों लोगों ने ऑनलाइन देखा – और देश को पहली बार खुलकर पता चला कि शिक्षा के नाम पर कितनी बड़ी वसूली चल रही है। लेकिन यह तो सिर्फ़ शुरुआत है। कोटा में जो लौ जली है, उसे अब पूरे देश में बदलाव की मशाल बनाना है। और इस सफ़र में आपकी जगह तय है।
खास बात यह है कि राहुल गांधी इस एक अभियान से युवाओं के मन की बात को अभिव्यक्ति देने वाले पहले नेता बनकर उभरे हैं। उन्होंने इस पर प्रतिक्रियाएं भी मांगी हैं। लेकिन राहुल गांधी के इस मूवमेंट में ऐसा क्या था जिसने सत्ता पक्ष की अभेद्य दीवारों को हिलाकर रख दिया जिसकी काट सत्ता पक्ष के तमाम सिपहसालार अपनी पुरजोर कोशिशों के बावजूद अभी तक नहीं निकाल पाए हैं।
इतिहास को दोहराना
व्याख्या करने वाले कह रहे हैं कि लगता राहुल गांधी ने कांग्रेस के इतिहास को एक बार फिर दोहराना शुरू किया है कुछ विश्लेषकों से इसे इतिहास से जोड़कर देखना शुरू किया है और इसे देखने के लिए हमें इतिहास में झांकना होगा जब ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ दर्ज कराने में असफल जनता का मनोबल टूटने लगा था तब 1930 के आसपास महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया था जो पूरी तरह अहिंसक था। जैसा कि इसके नाम से जाहिर है सविनय अवज्ञा आंदोलन आज के संदर्भ में इसे Resist Movement के रूप में राहुल गांधी लेकर आए हैं।
इस आंदोलन का मकसद छात्रों युवाओं के हितों पर कुठराघात करने वाली नीतियों के खिलाफ निकलकर खुलकर अहिंसक विरोध करना है। इतिहास के पन्नों में दर्ज तारीखों के हिसाब से यह आंदोलन 1930 से 1934 तक चला था। जिसका व्यापक असर हुआ था।
सविनय अवज्ञा आंदोलन आंदोलन महात्मा गांधी ने तब छेड़ा था जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आवाज उठाने का कोई रास्ता नहीं बचा था। विश्लेषकों का मानना है कि आज के दौर में कांग्रेस या राहुल गांधी क्या ये मान चुके हैं कि एनडीए को हटाना वर्तमान चुनावी तंत्र में संभव नहीं है। ये एक सवाल है लेकिन राहुल गांधी ईवीएम के घोटाले का आरोप लगाते हुए कई बार यह खुलासा कर चुके हैं कि वोट कहां से और कैसे प्राप्त किये जा रहे हैं।
दोनों आंदोलनों का समय
देश की स्वतंत्रता के लिए यह सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण था। जिसने पूरे देश को एकजुट कर दिया था तो क्या एनडीए के शासन तंत्र से छुटकारा पाने के लिए ऐसा मूवमेंट संभव है यह एक सवाल हो सकता है लेकिन युवाओं और छात्रों का इस मूवमेंट से जुड़ना इस आंदोलन के लम्बी दूरी तय करने के संकेत दे रहा है। गांधी का आंदोलन ब्रिटिश सरकार के चुने हुए कानूनों,मांगों या आदेशों का पालन करने से इनकार करने के साथ अहिंसक प्रतिरोध का संगठित आंदोलन था।
राहुल गांधी ने छात्रों के भविष्य से जोड़कर माता पिता की आकांक्षाओं से जोड़कर इसका श्रीगणेश किया है। कोटा में जिस तरह से छात्र जुटे राहुल गांधी के रूप में उन्हें उम्मीद की किरण दिखी यह कांग्रेस और राहुल गांधी की सफलता पाने की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। देखना यह होगा कि क्या यह मूवमेंट एक निर्णायक भूमिका निभाएगा। बाकी क्षेत्रीय दल इस से जुड़ेंगे ये सवाल भविष्य के गर्भ में है।
विनीता आरके- लेखिका सामाजिक विषयों पर चिंतक हैं।








