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Balrampur Model: शिशु मातृ मृत्युदर का विश्लेषण और भारत के प्रयासों में बलरामपुर माडल की प्रासंगिकता

Balrampur Model: सरकारी भाषा में कहें तो मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु कुपोषण देशी भाषा में जच्चा बच्चा की मौत की दर एक बड़ी चुनौती है। जिसे नियंत्रित रखना विकास की ओर बढ़़ रहे हर देश के लिए आवश्यक है। ऐसे में इस को केवल स्वास्थ्य समस्या न मानकर एक मानवाधिकार और सामाजिक विकास की चुनौती के रूप में लिया जाना ज्यादा प्रासंगिक लगता है। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में जिलाधिकारी विपिन कुमार के प्रयास इसी दिशा में बढ़ने के संकेत देते हैं।

भारत में इस दिशा में कुछ नहीं हुआ यह सोचना गलत होगा क्योंकि पिछले दो दशकों में मातृ स्वास्थ्य में ऐतिहासिक सुधार हुआ है, लेकिन देश के भीतर क्षेत्रीय असमानता (Regional Disparity) स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए अभी भी एक बड़ी चुनौती है जिसे दूर कर पाना प्रशासनिक सहयोग के बिना असंभव लगता है।

हमारे सामने है उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में शुरू की गई ‘ओटीपी और आधार आधारित’ पोषण वितरण की नई तकनीक-संचालित व्यवस्था।

ओटीपी से पोषक आहार या उम्र आधारित पोषण

बलरामपुर जिले में बच्चों, गर्भवती महिलाओं और गर्भवती महिलाओं के पोषण स्तर को बेहतर बनाने के उद्देश्य से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों पर अब ओटीपी से पोषक आहार की सुविधा दी जा रही है। पोषक आहार वितरण की व्यवस्था में ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) का प्रावधान अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ ही लाभार्थियों की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार पोषक आहार को आकर्षक नाम भी दिए गए हैं। इससे लाभार्थियों को अपने पोषक आहार की पहचान में आसानी होगी।

श्रेणी का नाम लक्षित लाभार्थी मुख्य आहार
शिशु अमृत 6 माह से 1 वर्ष के बच्चे आटा-बेसन का मीठा हलवा
शिशु आहार 1 से 3 वर्ष के बच्चे हलवा
बाल पुष्टिकर 3 से 6 वर्ष के बच्चे आटा-बेसन की बर्फी, दलिया, मूंग दाल खिचड़ी
संपूर्ण मातृ आहार गर्भवती एवं धात्री माताएं आटा-बेसन व सोया बर्फी, दलिया-खिचड़ी
बाल संजीवनी 1 से 3 वर्ष के अति कुपोषित बच्चे विशेष मीठा हलवा

जिलाधिकारी डॉ विपिन कुमार जैन कहते हैं

इस व्यवस्था के तहत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अब पोषक आहार प्राप्त करने के लिए अपने मोबाइल फोन पर एक विशेष एप ईएलएमडी डाउनलोड करना होगा। मोबाइल एप में उनके आंगनबाड़ी केंद्र से संबंधित आवश्यक जानकारी दर्ज करने के बाद कार्यकर्ता को एक ओटीपी मिलेगा। ओटीपी बताने पर ही उन्हें लाभार्थियों की संख्या के अनुसार पोषक आहार की खेप सौंपी जाएगी।

ओटीपी न बताने की स्थिति में पोषक आहार का वितरण नहीं होगा। यह कदम वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। इस योजना के तहत आधार पंजीकरण और चेहरा प्रमाणीकरण के बाद ही लाभार्थियों तक पोषक आहार पहुंचेगा।

यह हैं पोषक आहार की विभिन्न रोचक श्रेणियां

शिशु अमृत: छह माह से एक वर्ष तक के बच्चों के लिए आटा-बेसन का मीठा हलवा।
शिशु आहार: एक से तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए हलवा।
बाल पुष्टिकर: तीन से छह वर्ष तक के बच्चों के लिए आटा-बेसन की बर्फी, दलिया और मूंग दाल की नमकीन खिचड़ी।
संपूर्ण मातृ आहार: गर्भवती और धात्री माताओं के लिए आटा-बेसन और सोया बर्फी, दलिया-मूंग दाल की नमकीन खिचड़ी।
बाल संजीवनी: एक से तीन वर्ष तक के अति कुपोषित बच्चों के लिए विशेष मीठा हलवा।

ये तो हुई बात बलरामपुर के माडल प्रोजेक्ट की। अब देखते हैं दुनिया का परिदृश्य क्या कहता है और इसकी प्रासंगिकता क्या है।

वैश्विक व राष्ट्रीय परिदृश्य: लैंसेट रिपोर्ट के आईने में

  • वैश्विक और राष्ट्रीय आंकड़े: लैंसेट (2023) के अनुसार दुनिया भर में 2,40,000 मातृ मृत्यु में से 24,700 मौतें (लगभग 10.2%) अकेले भारत में होना।

  • भारत की ऐतिहासिक प्रगति: पिछले 20 वर्षों में भारत द्वारा दर्ज की गई 68-70% की ऐतिहासिक गिरावट, जो वैश्विक औसत (34%) से दोगुनी रफ्तार को दर्शाती है।

  • क्षेत्रीय विरोधाभास (Regional Contrast): * एक तरफ केरल (MMR: 19) और तेलंगाना (MMR: 43) जैसे राज्य विकसित देशों की कतार में हैं।

    • दूसरी तरफ असम (195), मध्य प्रदेश (173) और उत्तर प्रदेश (167) जैसे राज्य अब भी राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं और ‘उच्च जोखिम’ श्रेणी में हैं।

जमीनी चुनौती: कुपोषण और असमानता

  • मातृ मृत्यु का मूल कारण: अत्यधिक रक्तस्राव (PPH) और एनीमिया (खून की कमी), जिनका सीधा संबंध गर्भावस्था के दौरान मिलने वाले पोषण से है।

  • पारंपरिक व्यवस्था की कमियां: कागजी रिकॉर्ड में हेरफेर, लाभार्थियों की गलत पहचान और पोषण सामग्री की कालाबाजारी, जिससे वास्तविक जरूरतमंद माताओं और बच्चों तक पोषण नहीं पहुंच पाता।

उम्मीद की किरण ‘बलरामपुर मॉडल’

जिलाधिकारी डॉ. विपिन कुमार जैन द्वारा शुरू की गई इस तकनीकी व्यवस्था के तीन मुख्य स्तंभ:

  • ईएलएमडी (ELMD) ऐप और OTP व्यवस्था: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए आपूर्ति (Supply Chain) को ट्रैक करने हेतु वन टाइम पासवर्ड को अनिवार्य बनाकर भ्रष्टाचार पर रोक।

  • पहचान का सुदृढ़ीकरण: आधार पंजीकरण और चेहरा प्रमाणीकरण (Face Authentication) के जरिए यह सुनिश्चित करना कि सही उम्र के सही लाभार्थी को ही आहार मिले।

  • उम्र आधारित लक्षित पोषण (Targeted Nutrition): आहार को ‘शिशु अमृत’, ‘बाल पुष्टिकर’, ‘संपूर्ण मातृ आहार’ और अति कुपोषित बच्चों के लिए ‘बाल संजीवनी’ जैसे वैज्ञानिक और आकर्षक नामों व श्रेणियों में बांटना।

इस प्रयास की प्रासंगिकता (Relevance)

  • सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति: यह मॉडल संयुक्त राष्ट्र के SDG-2 (भुखमरी की समाप्ति और पोषण) और SDG-3 (अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण – MMR को 70 से नीचे लाना) को हासिल करने की दिशा में यह एक व्यावहारिक कदम है।

  • ‘कागज़ से धरातल’ का अंतर पाटना: नीतियां बनाना आसान है, लेकिन यह मॉडल दिखाता है कि तकनीक के जरिए ‘लास्ट-माइल डिलीवरी’ (अंतिम व्यक्ति तक पहुंच) को कैसे पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जा सकता है।

  • अन्य उच्च जोखिम वाले राज्यों के लिए ‘ब्लूप्रिंट’: असम, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य जहां भौगोलिक और सामाजिक चुनौतियां अधिक हैं, वहां इस डिजिटल और जवाबदेह मॉडल को आसानी से दोहराया (Replicate) जा सकता है।

भावी राह (Conclusion & Way Forward)

बलरामपुर की यह पहल साबित करती है कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ तकनीक का सही तालमेल हो, तो कुपोषण और मातृ मृत्यु दर जैसे जानलेवा संकटों से मजबूती से लड़ा जा सकता है। कहते भी हैं जैसा भोजन वैसा मन। शरीर और मन स्वस्थ रखने के लिए खानपान पर ध्यान सबसे जरूरी है।

तीसरी आंख के सुझाव

  • हमारा सुझाव है कि ग्रामीण स्तर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को इस डिजिटल तकनीक के लिए लगातार प्रशिक्षित किया जाए।
  • दूरदराज के क्षेत्रों में बायोमेट्रिक और इंटरनेट कनेक्टिविटी की बाधाओं को दूर किया जाए।
  • ‘बलरामपुर मॉडल’ की सफलता का मूल्यांकन कर इसे उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों और देश के सभी उच्च जोखिम वाले राज्यों में अनिवार्य नीति के रूप में लागू किया जाना चाहिए।
Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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