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Dalit Politics UP: कांशीराम की विरासत से मायावती के नेपथ्य तक की कहानी

Dalit Politics UP: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 80 का दशक एक बड़ी करवट का गवाह बना। बरसों से कांग्रेस के ‘सुरक्षित’ पाले में सोए दलित समुदाय को DS4 और फिर बहुजन समाज पार्टी (BSP) के नारों ने झकझोर कर जगा दिया। ‘साहब’ कांशीराम की साइकिल ने जो जमीन तैयार की, उस पर मायावती के रूप में एक ऐसी ‘दलित चेतना’ का उदय हुआ, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक के सियासी पंडितों के गणित बिगाड़ दिए।

90 का दशक: जब ‘आयरन लेडी’ का खौफ बोलता था

90 का दशक आते-आते मायावती उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर काबिज हुईं। यह वह दौर था जब दलितों के भीतर यह आत्मविश्वास जागा कि अब वे ‘प्रजा’ नहीं, ‘शासक’ हैं। लेकिन यह रास्ता कांटों भरा था। गेस्ट हाउस कांड उसी दौर की एक काली परछाई है, जहाँ मायावती पर हमला हुआ। उस वक्त अगर भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपनी जान पर खेलकर मायावती को न बचाया होता, तो यूपी की राजनीति का भूगोल कुछ और ही होता। मुलायम सिंह यादव पर लगे उन आरोपों ने सपा और बसपा के बीच ऐसी खाई खोदी, जिसे भरने में दशकों लग गए।

सत्ता का मोह और ‘जातीय संकीर्णता’ की चूक

सियासी पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि मायावती अगले 20 साल तक अजेय रहेंगी। लेकिन सत्ता पाने के बाद मायावती ने एक बड़ी रणनीतिक चूक की। दलितों के जिस ‘बहुजन’ स्वरूप की बात कांशीराम करते थे, मायावती ने उसे धीरे-धीरे अपनी ही उप-जाति (जाटव) तक समेटना शुरू कर दिया।

  • नतीजा: दलितों की अन्य बिरादरियां (पासी, कोरी, वाल्मीकि, खटीक आदि) खुद को उपेक्षित महसूस करने लगीं।

  • विवादों का साया: मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण से लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों तक, मायावती विवादों में घिरती गईं और आम दलितों से उनका संपर्क कटता गया।

2012 के बाद का नेपथ्य: कहाँ खो गया वह ‘हाथी’?

2012 में सत्ता हाथ से जाने के बाद मायावती ने जैसे संघर्ष का मैदान ही छोड़ दिया। जो नेता कभी सड़कों पर दहाड़ता था, वह प्रेस नोट और सोशल मीडिया तक सीमित हो गया। आज हालत यह है कि बसपा का वोट बैंक तेजी से छिटक रहा है।

बड़ा सवाल: अगर मायावती नहीं, तो कौन? आज दलित समुदाय एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ उसे अपना भविष्य धुंधला नजर आ रहा है।

असमंजस में दलित: विकल्पहीनता का संकट

आज उत्तर प्रदेश में दलितों की स्थिति ‘अभिमन्यु’ जैसी है, जो चक्रव्यूह में तो है पर रास्ता दिखाने वाला कोई ‘कृष्ण’ नहीं है।

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  • भाजपा: लाभार्थी योजनाओं के जरिए दलितों के एक बड़े हिस्से को जोड़ने में सफल रही है, लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर दलितों का एक वर्ग अभी भी वहां पूरी तरह सहज नहीं है।

  • सपा और कांग्रेस: इन पार्टियों के पास आज भी कोई ऐसा कद्दावर दलित चेहरा नहीं है, जो मायावती के विकल्प के तौर पर खड़ा हो सके और पूरे समुदाय का विश्वास जीत सके।

निष्कर्ष: भविष्य की राह और दलितों की अनकही छटपटाहट

अंततः सवाल वही है कि क्या दलित समुदाय अब सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ बनकर रह जाएगा? सच तो यह है कि दलित अब वोट बैंक नहीं बनना चाहता, क्योंकि वह सत्ता की मलाई चख चुका है। उसे अब प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, बल्कि सत्ता में सीधी और सक्रिय भागीदारी चाहिए। यही वजह है कि वह न तो भाजपा के साथ पूरे मन से जुड़ पा रहा है और न ही सपा या कांग्रेस के पाले में पूरी तरह जा पा रहा है।

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विडंबना यह है कि इन प्रमुख दलों ने भी दलितों को सिर्फ ‘मायावती का वोट बैंक’ मानकर अपने हाल पर छोड़ दिया है। नतीजतन, मायावती की यह पूरी ‘कोटरी’ आज राजनीतिक रूप से उपेक्षित है। खुद मायावती भी इस बचे-खुचे वोट बैंक के आधार पर सियासी सौदेबाजी तो करती हैं, लेकिन उस सौदेबाजी के बदले में आम दलित के हाथ खाली ही रहते हैं। आज दलित समुदाय राजनीति के उस चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपने वजूद की नई इबारत लिखना चाहता है, लेकिन नेतृत्व की शून्यता उसे फिर से पुराने घेरों में ही कैद रहने पर मजबूर कर रही है।

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Author: Tesari Aankh

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