Brahmin Leadership Crisis: भारतीय राजनीति में एक दौर ऐसा था जब मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ब्राह्मण चेहरों का दबदबा था। वर्तमान स्थिति में ब्राह्मणों को ‘कोर वोटर’ तो माना जाता है, लेकिन ‘निर्णायक नेतृत्व’ (Decisive Leadership) के पदों से वे गायब हैं। इसकी वजहों का विश्लेषण करता यह विचारोत्तेजक लेख।
‘बी-2’ (Brahmin-Baniya) को सॉफ्ट टारगेट क्यों बनाया गया?
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अहिंसक प्रकृति: इस समुदाय का स्वभाव व्यापार और बौद्धिकता से जुड़ा है, न कि सड़क पर शक्ति प्रदर्शन (Street Power) से। राजनीति इसी कमजोरी का फायदा उठाती है।
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वैचारिक विलेन: ‘ब्राह्मणवाद’ को जातिवाद का पर्याय बनाकर पेश किया गया, जिससे अन्य जातियों को एकजुट करना आसान हो गया।
3. खुद ब्राह्मणों की भूमिका: कहाँ हुई चूक?
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बिखराव: ब्राह्मण कभी एक ‘वोट बैंक’ की तरह व्यवहार नहीं कर पाए, वे हमेशा विचारधारा या पार्टी के प्रति वफादार रहे। ब्राह्मण न तो वोट बैंक बन पाया है न पाएगा। इसकी वजह उनकी उच्च दर्जे की चेतना है जो कि आज के दौर में किसी को रास नहीं आ रही।
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नेतृत्व का मोहभंग: ब्राह्मण नेताओं ने समुदाय के हितों के बजाय पार्टी के हितों को ऊपर रखा, जबकि अन्य जातियों (जैसे ठाकुरों) के नेताओं ने सत्ता में रहते हुए भी अपनी जातीय जड़ों को मजबूत किया। इसके उलट यह भी कह सकते हैं ब्राह्मण स्वार्थी होकर खत्म हुए।
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4. अन्य सवर्ण जातियों का उदय और ब्राह्मणों का हाशिये पर जाना
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कैसे सवर्ण राजनीति का चेहरा अब ‘ब्राह्मण’ से बदलकर ‘ठाकुर’ या अन्य मार्शल जातियों की ओर शिफ्ट हो गया है। अगर इस सवाल पर गौर करें तो इसे राजनीति के अपराधीकरण और गिरते स्तर से जोड़कर देखा जा सकता है। शालीन राजनीति का सूरज जैसे जैसे अस्त हुआ ब्राह्मण हाशिये पर सिमटता गया।
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क्या यह सोची-समझी रणनीतिक घेराबंदी है ताकि सवर्णों के भीतर का बौद्धिक नेतृत्व कमजोर किया जा सके? यही सच है। कोई ब्राह्मण को आगे बढ़ते देखना पसंद नहीं करता सब उसको हाशिये पर ढकेलने में लगे हैं।
5. निष्कर्ष: भविष्य की राह
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क्या ब्राह्मणों को फिर से चाणक्य की भूमिका में लौटना होगा?
चाणक्य की भूमिका का सवाल बहुत दूर का है। असलियत में ब्राह्मण आज सत्ता परिवर्तन कराने की अपनी व्यूह रचना भूल चुका है। यही वजह है आज उसकी हालत चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु की तरह हो गई है। जिसे चक्रव्यूह के अंदर लड़ना आता है उससे निकलना नहीं।
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क्या बिना नेतृत्व के यह समुदाय सिर्फ एक ‘वफादार वोटर’ बनकर रह जाएगा?
वफादार किसका बनेगा। जिसे वह वोट करेगा वह उसे वफादार माने तो। जहां वोट की कोई कीमत नहीं वहां ब्रह्मण करेगा क्या। वास्तव में ब्राह्मण ने इतिहास से सही सबक नहीं लिया और राज्य की अवधारणा को गलत समझा जिसमें सबसे ऊपर धर्म था फिर राजा। धर्म शासित राज्य की परिकल्पना को गलत समझना समय के साथ बदलाव खुद में न लाना ब्राह्मणों के पतन का कारण बना।
1. “क्या ‘सर्वजन हिताय’ वाली छवि ने कमजोर कर दिया?”
एक धारणा ब्राह्मण परिवारों में रही है जो पीढ़ी दर पीढ़ी जाती रही है कि कोउ नृप होए हमें क्या हानी। यानी ब्राह्मणों को सत्ता से क्या मतलब। दूसरे ब्राह्मण का धन केवल भिक्षा। दूसरी बात दूसरी जातियों ने ब्राह्मण के लिए एक नैरेटिव के रूप में कही। नतीजतन ये शांत प्रिय वर्ग अपने ही घेरे में फंसकर रह गया। ब्राह्मण पुत्र गुंडा या माफिया कम ही होता है। ब्राह्मण खुद को परशुराम का वंशज कहलाने में खुश होते हैं। इसका नमूना पूर्वांचल के कद्दावर नेता या माफिया रहे हरिशंकर तिवारी पर फिट बैठती है जो सारा जीवन अपने ऊपर लगे अपराधी का कलंक मिटाने में लगे रहे। उन्होंने अपने को शिक्षाविद के रूप में स्थापित करना चाहा।
2. ब्राह्मणों की भूमिका सीमित क्यों ?”
ये एक दूसरा सवाल सीमित कर दिया गया या सीमित हो गए। दोनों बातें हैं तात्कालिक स्थितियों ने पुराने दौर में जब राजा महाराजा जमींदार या कद्दावर लोग ब्राह्मणों का सम्मान करते थे उस समय ब्राह्मण को सत्ता हाथ में लेने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। ब्राह्मण अपने सम्मान से खुश और प्रफुल्लित थे। उनके लिए यह सुख बहुत था कि राजा या मंत्री ने आकर उनके पैर छुए उन्हें सम्मान दिया।
3. बात ब्राह्मण बनिया समीकरण की
यह सच है कि वर्तमान राजनीतिक दौर में ब्राह्मण वोट दे तो ठीक न दे तो ठीक वाली स्थिति है। सवाल ये है कि ब्राह्मण जाए तो जाए कहां। किसी को उसकी जरूरत नहीं। अलबत्ता बनियों से चंदा भी अब किसी को नहीं चाहिए क्योंकि अडानी, अम्बानी सारे खर्च उठाने को तैयार बैठे हैं। इसमें पिस रहे हैं गरीब बनिये। यानी बनियों के छोटे छोटे चंदे की जगह कारपोरेट की एकमुश्त बड़ी रकम ने ले ली जो दलों को ज्यादा आसान लगा। इसमें इस चंदे का बदला अब उन्हें सीमित दायरे में देना पड़ रहा है।
4. “ठाकुरवादी राजनीति का उभार और ब्राह्मण
क्या ठाकुरों की राजनीति ने ब्राह्मणों को दरकिनार किया यह मानना गलत होगा क्योंकि ठाकुर ब्राह्मणों के कंधे पर चढ़कर आगे नहीं बढ़े। हां उनकी दबंग छवि क्षत्रप होने का स्वभाव और क्षत्रपों का एक सरदार मानने की प्रवृ्त्ति के चलते सत्ता में उनकी भागीदारी बनी रही। हालांकि ठाकुरों की राजनीति भी मजबूत स्थिति में नहीं है।
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अंत में एक सवाल
अंत में एक सवाल यह भी है कि क्या ब्राह्मण अपनी ही चुप्पी का शिकार हुए वास्तव में देखा जाए तो ब्राह्मणों का अहंकार और यह सोच उन्हें ले डूबी की हम तो सत्ता बनाते बिगाड़ते हमारा कोई क्या कर लेगा। सत्ता का हमें साथ लेकर चलना उनकी मजबूरी है। लेकिन यह सोच गलत साबित हुई जब दलित और पिछड़ों की चेतना का उदय हुआ और इसमें ब्राह्मण अलग थलग पड़ते गए। शुरुआत में यह अधिक महसूस इसलिए नहीं हुआ कि उस समय के परिदृश्य में नारायण दत्त तिवारी सरीखे नेता थे। लेकिन जैसे जैसे पुरानी पीढ़ी खत्म हुई सत्ता के शीर्ष पर ब्राह्मण नेतृत्व सिमटता गया और अंत में गायब हो गया। उत्तर प्रदेश में नाम गिनाएं तो मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, दिनेश शर्मा जैसे नेता उभरे लेकिन ब्रह्मदत्त द्विवेदी सरीखा कद्दावर नेता नहीं हुआ। ब्राह्मणों को आत्म मंथन करने की जरूरत है कि उनकी दुर्दशा का जिम्मेदार कौन। इसके लिए कोई और नहीं वह खुद जिम्मेदार हैं।








