आखिरकार, केंद्र सरकार ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर पर अपना कड़ा रुख बदल दिया है। अब तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है—स्मार्ट मीटर तो लगेंगे, लेकिन ‘प्रीपेड मोड’ अब आप पर थोपा नहीं जाएगा।
Central Electricity Authority (CEA) की नई अधिसूचना के मुताबिक, अब फैसला उपभोक्ता का होगा। आप चाहें तो प्रीपेड चुनें, या फिर पुराने ढर्रे पर पोस्टपेड जारी रखें।
पहले क्या था, अब क्या बदला?
पुराने नियमों में एक अघोषित दबाव था। राज्य सरकारों और बिजली कंपनियों ने इसे ऐसे लागू किया जैसे स्मार्ट मीटर का मतलब ही ‘प्रीपेड’ हो। धीरे-धीरे एक “विकल्प” को “मजबूरी” बना दिया गया। लेकिन अब नई अधिसूचना ने साफ कर दिया है कि:
-
स्मार्ट मीटर: जरूरी (Technological Upgrade)
-
प्रीपेड मोड: वैकल्पिक (Consumer Choice)
जनता के गुस्से ने बदली नीति की दिशा
यह बदलाव रातों-रात नहीं आया। जमीन पर लोगों का गुस्सा बढ़ रहा था। Uttar Pradesh State Electricity Consumers Council और अवधेश वर्मा जैसे जानकारों ने इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया। सवाल सीधा था— “बिना सहमति प्रीपेड क्यों?” इसी दबाव का नतीजा है कि केंद्र को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
https://x.com/mrp440/status/2041155343414337696?s=20
क्यों डरे हुए थे उपभोक्ता?
प्रीपेड सिस्टम (पहले रिचार्ज, फिर बिजली) मोबाइल की तरह तो है, लेकिन बिजली जैसी बुनियादी जरूरत के लिए यह कई चुनौतियां लेकर आया:
-
तकनीकी खामियां: रिचार्ज के बावजूद घंटों बिजली न आना।
-
पारदर्शिता की कमी: चेक मीटर न होने से “मीटर तेज चलने” का डर।
-
डिजिटल डिवाइड: बुजुर्गों और ग्रामीणों के लिए ऐप से रिचार्ज करना एक बड़ा सिरदर्द बन गया।
आगे की राह: क्या अब मिलेगी राहत?
अब गेंद राज्यों के पाले में है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों को अपने पुराने आदेश बदलने पड़ सकते हैं। हेल्पलाइन 1912 पर आने वाली शिकायतों का अंबार इस बात का सबूत है कि लोग इस ‘जबरन सुधार’ से खुश नहीं थे।
https://tesariaankh.com/current-affairs-up-road-accidents-lucknow-traffic-analysis-2026/
यह सिर्फ एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं की जीत है। लेकिन असली सवाल अभी भी कायम है— क्या बिजली कंपनियां जमीन पर इस ‘विकल्प’ को ईमानदारी से लागू करेंगी, या यह भी सिर्फ कागजी आदेश बनकर रह जाएगा?








