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सियासत के चाणक्य चेकमेट, भारतीय राजनीति में हाशिये पर

सोशल इंजीनियरिंग की आग में झुलसती ब्राह्मण लीडरशिप

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की लिस्ट ने देश की राजनीति में एक सन्नाटा पैदा कर दिया है। जहां 35 साल में पहली बार किसी भी प्रमुख दल ने ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा, वहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब राजनीति में ‘ब्राह्मण’ सिर्फ एक वोट बैंक बनकर रह गया है, नेतृत्वकर्ता नहीं? दक्षिण की यह लहर अब उत्तर भारत के हिंदी पट्टी वाले राज्यों— उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश— में भी महसूस की जा रही है।

उत्तर प्रदेश: ‘शंख’ से ‘साइकिल’ तक का सफर और नेतृत्व का संकट

कभी यूपी की राजनीति का केंद्र रहे ब्राह्मण (करीब 11-12%) आज खुद को चौराहे पर पा रहे हैं।

  • इतिहास: गोविंद वल्लभ पंत से लेकर एन.डी. तिवारी तक, यूपी ने ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों की लंबी फेहरिस्त देखी।

  • वर्तमान: 2007 में बसपा की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (हाथी नहीं गणेश है…) ने ब्राह्मणों को सत्ता की चाबी बनाया, लेकिन नेतृत्व दलित केंद्रित रहा। आज भाजपा के पास इस समुदाय का भारी समर्थन है, लेकिन जब बात ‘स्वतंत्र ब्राह्मण लीडरशिप’ की आती है, तो विकास दुबे कांड जैसे घटनाक्रमों के बाद समुदाय के भीतर एक अनकहा असंतोष और असुरक्षा का भाव दिखता है। समुदाय को लगता है कि वे सत्ता में हिस्सेदार तो हैं, लेकिन निर्णायक भूमिका से दूर होते जा रहे हैं।

बिहार: मंडल की राजनीति और लुप्त होता वजूद

बिहार में तो कहानी और भी चुनौतीपूर्ण है। 1990 के ‘मंडल युग’ के बाद से राज्य की राजनीति पिछड़ों और अति-पिछड़ों (OBC/EBC) के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

  • संकट: जगन्नाथ मिश्रा बिहार के आखिरी प्रभावी ब्राह्मण मुख्यमंत्री थे। उसके बाद से लालू-नीतीश के दौर में ब्राह्मण नेतृत्व पूरी तरह हाशिए पर चला गया।

  • चुनौती: करीब 4-5% आबादी वाला यह समुदाय अब किसी भी दल के लिए ‘किंग मेकर’ नहीं, बल्कि ‘वोट सप्लीमेंट’ बन गया है। राजद, जदयू या भाजपा, सभी का फोकस ‘बहुजन’ और ‘लव-कुश’ समीकरण पर है, जिससे ब्राह्मण नेता सिर्फ सजावटी पदों तक सीमित हो गए हैं।

राजस्थान और मध्य प्रदेश: किलों के बीच ढहता आधार

इन दो राज्यों में ब्राह्मण और राजपूत पारंपरिक रूप से सत्ता के करीब रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में:

  • राजस्थान: यहां ब्राह्मणों की आबादी करीब 7% है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने समय-समय पर ब्राह्मण चेहरे (जैसे सीपी जोशी या घनश्याम तिवाड़ी) आगे किए, लेकिन जातीय गौरव की जंग में अब जाट और गुर्जर राजनीति ज्यादा आक्रामक हो गई है।

  • मध्य प्रदेश: यहाँ ब्राह्मण आबादी (करीब 5%) विंध्य और मध्य क्षेत्र में प्रभावी है। हालांकि यहां अभी भी कुछ कद्दावर नेता मौजूद हैं, लेकिन ‘आदिवासी’ और ‘ओबीसी’ कार्ड के चलते पार्टियां अब ब्राह्मणों को टिकट देने में कंजूसी बरतने लगी हैं।

Brahmin-Politics-image-Social-Media
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ब्राह्मण नेतृत्व खत्म होने के 3 बड़े कारण

  1. सोशल इंजीनियरिंग का दबाव: हर दल अब ‘जिसकी जितनी संख्या भारी’ के फार्मूले पर चल रहा है। दलित, मुस्लिम और ओबीसी का एकजुट वोट बैंक ब्राह्मणों की 3-4% आबादी पर भारी पड़ रहा है।

  2. कैडर आधारित राजनीति का अभाव: अन्य जातियों की तरह ब्राह्मणों का अपना कोई मजबूत ‘क्षेत्रीय दल’ नहीं है। वे हमेशा राष्ट्रीय दलों (भाजपा/कांग्रेस) पर निर्भर रहे, जहां उनकी आवाज पार्टी लाइन में दब जाती है।

  3. स्वार्थ बनाम समुदाय: जानकारों का मानना है कि ब्राह्मण नेताओं ने खुद को ‘मास लीडर’ बनाने के बजाय ‘मैनेजर’ के रूप में स्थापित कर लिया, जिससे समुदाय से उनका जमीनी जुड़ाव कम हुआ।

तमिलनाडु ने जो संकेत दिया है, वह हिंदी पट्टी के ब्राह्मणों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यदि आने वाले समय में इन राज्यों में भी ‘ब्राह्मण शून्य’ उम्मीदवार वाली सूचियां दिखने लगें, तो अचरज नहीं होना चाहिए। राजनीति के ‘चाणक्य’ को अब सोचना होगा कि वे ‘किंग’ बनेंगे या सिर्फ ‘किंगमेकर’ की भीड़ का हिस्सा रहेंगे।

https://x.com/RakeshKishore_l/status/2024493862803427705?s=20

क्या ब्राह्मण सिर्फ वोट बैंक का ‘सेफ हाउस’ बन गया है?

भारतीय राजनीति के मौजूदा दौर में एक अजीबोगरीब विरोधाभास पैदा हो गया है। हिंदी भाषी राज्यों में ब्राह्मणों की स्थिति उस मुसाफिर जैसी हो गई है, जिसे घर बचाने के लिए उस छत के नीचे खड़ा होना पड़ रहा है जहाँ उसकी आवाज के लिए कोई जगह नहीं है।

‘स्वाभिमान’ और ‘सुरक्षा’ का चक्रव्यूह

जैसा कि आपने सही पकड़ा, हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति ने ब्राह्मण समुदाय को एक ऐसे कोने में धकेल दिया है जहाँ उनके पास ‘विकल्प’ खत्म हो गए हैं।

  • मजबूरी की राजनीति: गैर-मुस्लिम समर्थक दलों को वोट देना उनकी पसंद से ज्यादा अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को बचाने की ‘मजबूरी’ बन गई है।

  • बिना शर्त समर्थन: जब कोई समुदाय किसी एक दल के लिए ‘गारंटीड वोट’ बन जाता है, तो वह दल उस समुदाय के लिए नया नेतृत्व पैदा करने की जहमत नहीं उठाता। दलों का तर्क सीधा है— “हम तुम्हें संरक्षण दे रहे हैं, तुम्हारी पहचान सुरक्षित है, क्या यह काफी नहीं?”

राष्ट्रीय स्तर पर ‘कद्दावर नेतृत्व’ का अकाल

आज अगर हम भाजपा, कांग्रेस या किसी भी क्षेत्रीय दल को देखें, तो राष्ट्रीय स्तर पर एक भी ऐसा ‘ब्राह्मण मास लीडर’ नजर नहीं आता जिसकी एक आवाज पर कश्मीर से कन्याकुमारी तक का ब्राह्मण समाज खड़ा हो सके।

  • मैनेजर बनाम लीडर: आज ब्राह्मण नेता या तो ‘चाणक्य’ की भूमिका में पर्दे के पीछे रणनीतियां बना रहे हैं (जैसे अमित शाह के साथ काम करने वाले कई रणनीतिकार) या फिर सिर्फ एक खास विभाग तक सीमित हैं।

  • क्षेत्रीय क्षत्रपों का अंत: उत्तर प्रदेश में कभी लक्ष्मीकांत बाजपेई या कलराज मिश्र जैसे चेहरों का जो दबदबा था, वह अब प्रतीकात्मक रह गया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी अब ‘ब्राह्मण चेहरा’ केवल कैबिनेट की बैलेंसिंग के लिए रखा जाता है, एजेंडा सेट करने के लिए नहीं।

‘सोशल इंजीनियरिंग’ में खोती आवाज

राजनीतिक दल अब ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के नाम पर दलित, पिछड़ा और मुस्लिम गठजोड़ बनाने में जुटे हैं। इस अंकगणित में ब्राह्मणों की 3-10% आबादी को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (मान लिया गया कि ये तो हमारे ही हैं) ले लिया जाता है।

  • नतीजा: ब्राह्मणों का मुद्दा न तो मैनिफेस्टो का हिस्सा बनता है और न ही उनकी नाराजगी को दूर करने के लिए कोई विशेष प्रयास किए जाते हैं। उन्हें लगता है कि ‘वर्चस्व’ तो दूर, अब वे अपनी शर्तों पर मोलभाव (Bargaining) करने की ताकत भी खो चुके हैं।

चुनौती: क्या भविष्य सिर्फ ‘वोटर’ का है?

अगर यही स्थिति रही, तो आने वाले दशकों में ब्राह्मण राजनीति का ‘वजूद’ पूरी तरह ‘वोट बैंक’ में तब्दील हो जाएगा। चुनौती यह नहीं है कि ब्राह्मणों को टिकट क्यों नहीं मिल रहा, चुनौती यह है कि क्या इस समुदाय के पास कोई ऐसी ‘विजनरी लीडरशिप’ है जो राष्ट्रीय स्तर पर यह कह सके कि हम केवल रक्षक नहीं, बल्कि नीति-निर्माता भी हैं?

जब चाणक्य के वंशज ही ‘चेकमेट’ हो गए

आज के दौर में ब्राह्मणों की स्थिति उस मोहरे जैसी हो गई है जिसे पता है कि बिसात पर उसकी जगह सीमित है, लेकिन उसके पास घर बचाने के लिए एक खास खाने में खड़े रहने के अलावा कोई चारा नहीं है। यह ‘मजबूरी की राजनीति’ और ‘नेतृत्व का शून्य’ अब एक गंभीर सामाजिक संकट की ओर इशारा कर रहा है।

स्वाभिमान बनाम सुरक्षा: एक कठिन सौदा

ब्राह्मणों को आज ‘हिंदू-मुस्लिम’ राजनीति की उस धुरी पर ला खड़ा किया गया है, जहाँ उनकी पहली प्राथमिकता अपना ‘स्वाभिमान’ नहीं, बल्कि ‘सुरक्षा’ और ‘अस्तित्व’ बन गई है।

  • संरक्षण का भ्रम: राजनीतिक दलों ने बहुत चतुराई से यह नैरेटिव सेट कर दिया है कि— “हम तुम्हें संरक्षण दे रहे हैं, तुम्हारी संस्कृति और पहचान सुरक्षित है, क्या इतना काफी नहीं?”

  • मूक समर्थक: इसी ‘संरक्षण’ के बदले ब्राह्मणों से ‘बिना शर्त समर्पण’ की उम्मीद की जाती है। नतीजा यह है कि वे उन दलों को समर्थन देने पर मजबूर हैं जहाँ उनकी संख्या तो गिनी जाती है, पर उनकी बात नहीं सुनी जाती।

‘राष्ट्रीय चेहरा’ तलाशती आँखें

आज भारतीय राजनीति के फलक पर नजर दौड़ाएं तो एक बड़ा सवाल खड़ा होता है— कहाँ है वो कद्दावर ब्राह्मण नेता? * मैनेजर बनकर रह गए नेता: एक दौर था जब अटल बिहारी वाजपेयी जैसा व्यक्तित्व था जिसकी एक आवाज पर पूरा समाज एकजुट हो जाता था। आज ब्राह्मण नेता या तो ‘पार्टी मैनेजर’ की भूमिका में सिमट गए हैं या फिर पर्दे के पीछे की रणनीतियों तक।

  • विजन का अभाव: कोई भी ऐसा नेता नजर नहीं आता जिसके पास राष्ट्रीय स्तर पर ब्राह्मणों के सामाजिक और आर्थिक हितों के लिए कोई स्पष्ट ‘विजन’ हो। जब नेतृत्व ही नहीं होगा, तो समुदाय केवल एक ‘वोटिंग मशीन’ बनकर रह जाएगा।

‘सोशल इंजीनियरिंग’ की बलि चढ़ती मेधा

दलों के पास आज दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए तो ठोस प्लान और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के फॉर्मूले हैं, लेकिन ब्राह्मणों के लिए उनके पास सिर्फ ‘सांत्वना’ है।

  • वोट बैंक की मजबूरी: चूंकि ब्राह्मण गैर-मुस्लिम राजनीति के पाले में ‘फिक्स’ मान लिए गए हैं, इसलिए कोई भी दल उनके लिए अलग से मेहनत करने या नया नेतृत्व खड़ा करने की जरूरत नहीं समझता।

  • नतीजा: ब्राह्मण आज राजनीति की उस ‘सीढ़ी’ की तरह हैं जिसका इस्तेमाल सब करते हैं, लेकिन पहुँचने के बाद उसे किनारे कर दिया जाता है।

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क्या सिर्फ ‘संरक्षित’ रहना ही नियति है?

आज ब्राह्मण समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस ‘वोट बैंक’ की छवि से बाहर कैसे निकले। यदि समय रहते एक ऐसा ‘स्वतंत्र और कद्दावर राष्ट्रीय नेतृत्व’ खड़ा नहीं हुआ जो स्वाभिमान और हिस्सेदारी की बात कर सके, तो वह दिन दूर नहीं जब तमिलनाडु की तरह उत्तर भारत की सूचियों से भी ब्राह्मणों का नाम पूरी तरह गायब हो जाएगा।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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