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Donald Trump Iran War Protest: ‘No Kings’ आक्रोश: क्या ट्रंप के लिए ईरान और घरेलू मोर्चा संभालना मुश्किल है? | Trump vs No Kings Protest

‘No Kings’ आक्रोश: क्या ट्रंप के लिए घरेलू और वैश्विक मोर्चा संभालना मुश्किल हो रहा है?

अमेरिका के सभी 50 राज्यों में गूँजता ‘No Kings’ का नारा महज़ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली और उनकी विदेश नीति के खिलाफ एक बड़े जन-आक्रोश का संकेत है। न्यूयॉर्क से लेकर लॉस एंजिल्स तक की सड़कों पर उतरे लाखों लोग यह बता रहे हैं कि अमेरिकी जनता अब ‘टकराव’ की राजनीति से आज़िज़ आ चुकी है। जिस तरह से 3,000 से अधिक स्थानों पर प्रदर्शन हुए, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू मोर्चे पर ट्रंप की पकड़ को कड़ी चुनौती मिल रही है।

ईरान संकट: प्रतिष्ठा का प्रश्न या रणनीतिक भूल?

आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ईरान को सीधे निशाने पर लेना ट्रंप के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है? यदि यह युद्ध केवल इज़राइल और ईरान के बीच सीमित रहता, तो शायद वैश्विक स्तर पर इसके परिणाम इतने गंभीर नहीं होते। लेकिन अमेरिका ने जिस तरह इसे अपनी ‘प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बना लिया है, उसने स्थिति को और जटिल कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप ने ईरान के साथ मोर्चा खोलकर अपनी उन घरेलू समस्याओं से ध्यान भटकाने की कोशिश की थी जो अब उन पर और भारी पड़ती दिख रही हैं।

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विदाई का डर और ‘परमाणु’ विकल्प की आशंका

आर्थिक मंदी, आव्रजन नीतियों पर असंतोष और अब युद्ध के मुहाने पर खड़े देश को देखकर यह अंदेशा लगाया जा रहा है कि क्या ट्रंप को अपनी ‘शर्मनाक विदाई’ का डर सताने लगा है? जब कोई नेतृत्व घरेलू मोर्चे पर चौतरफा घिर जाता है, तो वह अक्सर अपनी सत्ता और छवि बचाने के लिए आक्रामक कदम उठाता है। ऐसे में यह गंभीर चिंता का विषय है कि क्या घरेलू असंतोष को दबाने और अपनी ताकत दिखाने के लिए ट्रंप ‘परमाणु विकल्प’ जैसे किसी आत्मघाती कदम पर विचार कर सकते हैं? हालांकि ऐसा करना न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी होगा, लेकिन ट्रंप की अनिश्चित कार्यशैली ने इस बहस को जन्म दे दिया है।

https://x.com/nikkioceangirl/status/2038117918697832633?s=20

लोकतंत्र बनाम ‘तानाशाही’ के आरोप

विरोध प्रदर्शनों में जिस तरह के नारे लग रहे हैं और स्पीकर्स (जैसे रॉबर्ट डी नीरो और बर्नी सैंडर्स) जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह ट्रंप की नेतृत्व शैली को ‘राजशाही’ की ओर झुका हुआ बता रहे हैं। दूसरी ओर, प्रदर्शनों के दौरान कुछ स्थानों पर कम्युनिस्ट झंडे और चरमपंथी नारों की उपस्थिति ने स्थिति को और अधिक ध्रुवीकृत (Polarized) कर दिया है। यह अराजकता ट्रंप के लिए एक तरफ तो चुनौती है, और दूसरी तरफ इसे आधार बनाकर वे और सख्त कदम उठाने की कोशिश कर सकते हैं।

https://tesariaankh.com/politics-trump-modi-praise-middle-east-war-india-strategy-analysis/

निष्कर्ष: आगे की राह

डोनाल्ड ट्रंप के लिए आने वाले तीन साल कांटों भरे हो सकते हैं। एक तरफ उन्हें ईरान के साथ छिड़े युद्ध को किसी तार्किक अंत तक पहुँचाना है, तो दूसरी तरफ अपने ही देश की जनता के गुस्से को शांत करना है। क्या वे शांति का रास्ता चुनेंगे या फिर अपनी ‘शक्तिशाली’ छवि को बरकरार रखने के चक्कर में कोई ऐसा कदम उठाएंगे जो इतिहास में एक काला अध्याय बन जाए? जवाब समय की कोख में है, लेकिन फिलहाल अमेरिका की सड़कें अशांत हैं और दुनिया की नज़रें व्हाइट हाउस पर टिकी हैं।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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