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NCERT किताब विवाद: माफी के बाद भी सवाल कायम: क्या जिम्मेदारों पर होगा एक्शन?

नई दिल्ली: कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक “Exploring Society: India and Beyond, Vol II” में न्यायपालिका पर लिखे गए विवादित अध्याय को लेकर देश में नया विवाद खड़ा हो गया है। अध्याय “Corruption in the Judiciary” को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी आपत्ति के बाद NCERT ने 10 मार्च 2026 को सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगते हुए पूरी किताब को वापस लेने का फैसला किया।

मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस सामग्री को “गंभीर रूप से आपत्तिजनक” बताते हुए पूरे देश में इस अध्याय पर रोक लगाने और किताब को जब्त करने के निर्देश दिए। अदालत की सख्ती के बाद NCERT को न सिर्फ माफी मांगनी पड़ी बल्कि पूरे वॉल्यूम को ही वापस लेने का निर्णय लेना पड़ा।

हालांकि माफी और किताब की वापसी के बाद भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि सामग्री वास्तव में इतनी गंभीर गलती थी, तो सिर्फ माफी मांगकर मामला खत्म नहीं होना चाहिए। यह भी पूछा जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और संपादकीय टीम पर क्या कार्रवाई होगी।

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जांच होनी चाहिए

कुछ शिक्षाविदों और राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि अगर सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है, तो NCERT के निदेशक और इस किताब की तैयारी में शामिल जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। उनके अनुसार यदि गलती इतनी बड़ी है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

इसी बीच शिक्षा क्षेत्र में एक और विवाद, जिसे कई लोग “यूजीसी फियास्को” कह रहे हैं, भी चर्चा में है। आलोचकों का कहना है कि इन विवादों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। उनके अनुसार अपने शुरुआती कार्यकाल में प्रधानमंत्री प्रशासनिक मामलों में सख्त रुख के लिए जाने जाते थे, ऐसे में अब ऐसी घटनाओं पर स्पष्ट प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही है।

कुछ लोगों का यह भी सवाल है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में इस तरह की चूक हो रही है तो क्या इसके लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए। आलोचकों के मुताबिक शिक्षा मंत्री की भूमिका और मंत्रालय की निगरानी व्यवस्था पर भी चर्चा जरूरी है।

दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद ने एक व्यापक बहस को भी जन्म दिया है। भारत की न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की संख्या करीब 5.5 करोड़ बताई जाती है, ऐसे में न्यायपालिका पर भरोसा बनाए रखना और साथ ही संस्थागत सुधारों पर गंभीर चर्चा करना दोनों ही जरूरी हैं।

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फिलहाल, NCERT की माफी के बाद भी यह बहस थमने के बजाय और तेज हो गई है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस विवाद को केवल एक प्रशासनिक गलती मानकर छोड़ देती है या फिर जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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