Shia Islam in Iran: पश्चिम एशिया की प्राचीन सभ्यताओं के बीच स्थित Iran सदियों से केवल एक देश नहीं, बल्कि संस्कृतियों, व्यापार मार्गों और राजनीतिक विचारों का संगम रहा है। पूर्व में भारतीय उपमहाद्वीप और चीन, पश्चिम में मेसोपोटामिया और भूमध्यसागर, उत्तर में रूस और दक्षिण में फारस की खाड़ी—इस भौगोलिक स्थिति ने ईरान को हमेशा से एक रणनीतिक चौराहा बनाया है।
आज के समय में ईरान केवल अपने भू-राजनीतिक महत्व के कारण नहीं बल्कि शिया इस्लाम के सबसे बड़े केंद्रों में से एक होने के कारण भी वैश्विक राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे देशों में भी बड़ी शिया आबादी है, और इन क्षेत्रों में ईरान का प्रभाव अक्सर इसी धार्मिक पहचान से जुड़ा माना जाता है।
धर्म और राजनीति के इस गहरे संबंध को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि आखिर शिया इस्लाम ईरान में कैसे स्थापित हुआ और किस तरह धार्मिक नेतृत्व ने समय-समय पर राजनीतिक आंदोलनों को दिशा दी।
सुन्नी-शिया विभाजन की शुरुआत
शिया और सुन्नी विभाजन की जड़ें 7वीं शताब्दी में पैगंबर Muhammad की मृत्यु के बाद शुरू हुए नेतृत्व विवाद में मिलती हैं।
पैगंबर के निधन के बाद इस्लामी समुदाय में यह प्रश्न उठा कि उनके बाद नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा। एक बड़े समूह ने पैगंबर के करीबी साथी Abu Bakr को पहला खलीफा मान लिया। यही समूह आगे चलकर सुन्नी कहलाया।
लेकिन एक दूसरा समूह मानता था कि पैगंबर के उत्तराधिकारी उनके चचेरे भाई और दामाद Ali ibn Abi Talib होने चाहिए। यही समूह आगे चलकर शिया कहलाया।
शिया मान्यता के अनुसार पैगंबर के परिवार की वंश परंपरा में एक विशेष आध्यात्मिक अधिकार होता है, जिसे “नस्स” कहा जाता है। इस परंपरा के अनुसार इमामों की एक श्रृंखला मानी जाती है जो अंततः “गायब इमाम” Muhammad al-Mahdi तक जाती है।
इस मतभेद ने धीरे-धीरे धार्मिक और राजनीतिक विभाजन का रूप ले लिया। लंबे समय तक शिया समुदाय इस्लामी दुनिया में एक अल्पसंख्यक समूह के रूप में ही रहा।
1501: जब ईरान बना पहला शिया राज्य
ईरान के इतिहास में बड़ा मोड़ 1501 में आया जब Shah Ismail I ने सफवीद साम्राज्य की स्थापना की।
सफवीद मूल रूप से मध्य एशिया के योद्धा कबीले थे। उन्होंने ईरान को राजनीतिक रूप से एकजुट किया और शिया इस्लाम को राज्य धर्म घोषित कर दिया। यह पहली बार था जब किसी बड़े इस्लामी राज्य ने आधिकारिक रूप से शिया विचारधारा को अपनाया।
सफवीद शासकों के सामने एक चुनौती यह भी थी कि उस समय ईरान की अधिकांश आबादी सुन्नी थी। इसलिए उन्होंने लेबनान और अन्य क्षेत्रों से शिया विद्वानों को बुलाया और धार्मिक संस्थाओं को मजबूत किया।
इन विद्वानों को सरकारी पद, वेतन और सामाजिक प्रतिष्ठा दी गई। इसके बदले में उन्होंने राज्य की वैधता को धार्मिक आधार प्रदान किया।
इस व्यवस्था में सत्ता के दो केंद्र बने—
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एक राजनीतिक सत्ता
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दूसरा धार्मिक नेतृत्व
यह मॉडल लगभग चार सौ वर्षों तक चला।
काजार काल और धार्मिक नेतृत्व का उभार
18वीं सदी के अंत में सफवीद साम्राज्य के पतन के बाद Qajar Dynasty सत्ता में आई। इसी समय ब्रिटेन और रूस जैसे बाहरी शक्तियों का प्रभाव ईरान की राजनीति में बढ़ने लगा।
धार्मिक नेतृत्व को डर था कि विदेशी प्रभाव उनके सामाजिक और नैतिक अधिकार को कमजोर कर सकता है।
1892 में यह तनाव एक बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया जिसे इतिहास में तंबाकू आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
शिया धर्मगुरु Mirza Hassan Shirazi ने तंबाकू के उपयोग के खिलाफ एक धार्मिक फतवा जारी किया। यह विरोध उस समय हुआ जब काजार शाह ने तंबाकू व्यापार का अधिकार एक ब्रिटिश कंपनी को दे दिया था।
इस फतवे का असर इतना व्यापक था कि पूरे देश में लोगों ने तंबाकू का इस्तेमाल बंद कर दिया। अंततः शाह को यह समझौता रद्द करना पड़ा।
यह घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि ईरान में धार्मिक नेतृत्व जनता को संगठित करने की कितनी बड़ी शक्ति रखता था।
https://x.com/MomadMUFC/status/2029383720755708327?s=20
पहलवी राजवंश और पश्चिमीकरण
1925 में Reza Shah Pahlavi ने पहलवी राजवंश की स्थापना की।
उन्होंने ईरान को एक आधुनिक, केंद्रीकृत और पश्चिमी शैली के राष्ट्र-राज्य में बदलने की कोशिश की। इसके तहत कई बड़े बदलाव किए गए:
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आधुनिक शिक्षा प्रणाली की स्थापना
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यूरोपीय कानूनी ढांचे को अपनाना
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धार्मिक स्कूलों का प्रभाव कम करना
इन कदमों से धार्मिक नेतृत्व की आर्थिक और सामाजिक शक्ति कम होने लगी।
बाद में उनके उत्तराधिकारी Mohammad Reza Shah Pahlavi ने भी इसी नीति को जारी रखा। लेकिन पश्चिमीकरण और बढ़ती तानाशाही के कारण जनता और धार्मिक नेताओं के बीच असंतोष बढ़ता गया।
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1979 की इस्लामी क्रांति
1970 के दशक के अंत तक पहलवी शासन राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ चुका था।
आखिरकार 1979 में एक ऐतिहासिक घटना घटी—Iranian Revolution।
इस क्रांति का नेतृत्व शिया धर्मगुरु Ruhollah Khomeini ने किया। क्रांति के बाद राजशाही समाप्त हो गई और ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया।
इस नए राजनीतिक ढांचे की नींव विलायत-ए-फक़ीह (Velayat-e-Faqih) सिद्धांत पर रखी गई। इस सिद्धांत के अनुसार सर्वोच्च धार्मिक विद्वान को राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति भी प्राप्त होती है।
आज ईरान में सर्वोच्च नेता की संस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है।
क्षेत्रीय राजनीति और “शिया क्रेसेंट”
1979 के बाद ईरान ने शिया पहचान को केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रखा। उसने इसे क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया।
ईरान ने लेबनान में शिया संगठन Hezbollah को समर्थन दिया।
इसके अलावा इराक, सीरिया, अज़रबैजान और यमन जैसे देशों में भी शिया समूहों के साथ उसके संबंध मजबूत हुए। इस क्षेत्रीय प्रभाव को अक्सर “शिया क्रेसेंट” कहा जाता है।
इस रणनीति के जरिए ईरान अपने प्रतिद्वंद्वी सुन्नी शक्तियों—विशेषकर Saudi Arabia—और बाहरी शक्तियों जैसे United States तथा Israel का संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
क्या सच में 1400 साल से चल रहा है सुन्नी-शिया युद्ध?
अक्सर यह कहा जाता है कि सुन्नी और शिया समुदायों के बीच 1400 साल से लगातार संघर्ष चल रहा है। लेकिन कई विशेषज्ञ इस धारणा को अतिरंजित मानते हैं।
इतिहास के लंबे दौर में मध्य पूर्व के कई हिस्सों में सुन्नी और शिया समुदाय साथ-साथ रहते आए हैं। वर्तमान में जो तनाव दिखाई देता है, वह काफी हद तक आधुनिक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष का परिणाम है।
ईरान का इतिहास यह दिखाता है कि यहां धर्म और राजनीति कभी पूरी तरह अलग नहीं रहे।
शिया इस्लाम ने ईरान में केवल धार्मिक पहचान नहीं बनाई बल्कि राष्ट्रीय पहचान, राजनीतिक आंदोलन और क्षेत्रीय रणनीति को भी प्रभावित किया।
1501 में सफवीद साम्राज्य से शुरू हुई यह यात्रा 1979 की इस्लामी क्रांति तक पहुंची और आज भी ईरान की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को आकार दे रही है।








