लखनऊ: वर्तमान दौर की राजनीति में जहां नेताओं के प्रति जनविश्वास और साख का संकट साफ दिखाई देता है, वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक ऐसे निर्विवाद नेता के रूप में उभरे हैं, जिन पर जनता का भरोसा अडिग है। राजनीति में किसी भी नेतृत्व के लिए जनता का यह विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी होती है। इसी जनविश्वास की एक और नजीर हाल ही में लखनऊ में देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री कार्यालय (पंचम तल) के सीधे हस्तक्षेप के बाद भ्रष्टाचार में लिप्त दो सरकारी कर्मचारियों पर निलंबन की बड़ी गाज गिरी।
यह कार्रवाई केवल दो अधिकारियों का सस्पेंशन नहीं है, बल्कि यह उस ‘योगी मॉडल’ की बानगी है जिसके दम पर उत्तर प्रदेश की जनता आज सुकून की सांस ले पा रही है।
सत्तारूढ़ दल से इतर, योगी पर अटूट भरोसा
उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले जानते हैं कि करीब एक दशक के शासन के बाद विरोधी हवाएं भले ही पार्टी के प्रति जनता के रुख को थोड़ा डगमगा दें, लेकिन जब बात योगी आदित्यनाथ की आती है, तो जनता का यह भरोसा भगवा दल के साथ मजबूती से खड़े होने पर मजबूर कर देता है। संन्यासी की वेशभूषा, भगवा वस्त्र और अपराधियों के खिलाफ ‘बुलडोजर न्याय’—आज उत्तर प्रदेश में सुशासन का दूसरा नाम बन चुके हैं। जनता ने पूर्ववर्ती सरकारों के दौर का वह कटु यथार्थ भी भोगा है जब सड़कों पर चलना दूभर था, यही कारण है कि आज योगी सरकार की हर सख्ती को जनता एक नजीर के रूप में स्वीकार करती है।
यूपी से बाहर ‘भगवा सुशासन’ और बुलडोजर मॉडल की गूंज
यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की देशव्यापी लोकप्रियता का ही नतीजा है कि आज सुदूरवर्ती राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल) में भी जब भाजपा के उभार की बात होती है, तो वहां का नेतृत्व और माहौल भगवामय होने लगता है, जहां ‘भगवा’ सीधे तौर पर सुशासन का प्रतीक बन चुका है। योगी के ‘बुलडोजर न्याय’ के मॉडल को आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक देशव्यापी स्वीकृति मिली है। देश के बहुसंख्यक समाज और हिंदुओं के रहनुमा के रूप में उन्हें एक अभेद्य सुरक्षा कवच देने में वर्तमान भारतीय राजनीति में योगी आदित्यनाथ का सानी कोई दूसरा नेता नजर नहीं आता। यही राष्ट्रीय साख उनके हर फैसले के पीछे जनता के भरोसे को और मजबूत करती है।
कमीशनखोरी और ब्लैकमेलिंग का गठजोड़ ध्वस्त
ताजा मामला व्यावसायिक शिक्षा विभाग के प्रशिक्षण निदेशालय का है, जहां सहायक निदेशक धीरेंद्र झा और प्रधान सहायक इमरान अहमद ने आपसी गठजोड़ कर भ्रष्टाचार का बड़ा जाल बुन रखा था।
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कमीशनखोरी का 10% मॉडल: सहायक निदेशक धीरेंद्र झा पर हर निर्माण कार्य में ठेकेदारों से 10 प्रतिशत कमीशन लेने और ट्रांसफर सीजन में मोटी रकम वसूलने का आरोप था।
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शिकायत और उगाही का अनूठा खेल: वहीं बाबू इमरान अहमद का तरीका और भी शातिर था। वह पहले खुद दूसरों के नाम से विभाग में फर्जी शिकायतें करता था और फिर उसी शिकायत को रफा-दफा करने के एवज में मोटी रकम ऐंठता था। इसके साथ ही उस पर कर्मचारियों के उत्पीड़न और धार्मिक भेदभाव के भी गंभीर आरोप सही पाए गए।
पंचम तल का दखल और ‘जीरो टॉलरेंस’
जब इस भ्रष्टाचार की गूंज मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची, तो बिना किसी देरी के ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत सीधे पंचम तल से दखल दिया गया। विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. हरिओम ने गोपनीय जांच कराई और आरोपों की पुष्टि होते ही सहायक निदेशक धीरेंद्र झा को निलंबित कर देवीपाटन मंडल से अटैच कर दिया। वहीं, निदेशालय स्तर पर निदेशक प्रशिक्षण अभिषेक सिंह ने इमरान अहमद को निलंबित करते हुए उन पर ‘गिरोह बंद’ होकर काम करने का गंभीर आरोप तय किया।
तीसरी आँख का नजरिया: मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी यह प्रेसनोट साफ करता है कि योगी आदित्यनाथ के लिए भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि जनता के उस विश्वास को बनाए रखने का जरिया है, जो उनकी सबसे बड़ी ताकत है। सचिवालय के गलियारों में चर्चा है कि इस कार्रवाई के बाद विभाग के कुछ और बड़े चेहरे भी शासन के रडार पर हैं। साफ संदेश है कि व्यवस्था में घुन लगाने वाले चाहे जितने रसूखदार हों, संन्यासी के राज में बख्शे नहीं जाएंगे।
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