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सिनेमा का अल्फ़ा मेल फॉर्मूला: कब तक ‘शो-पीस’ और सफलता का चारा बनी रहेंगी महिला किरदार?

Objectification of women: बॉलीवुड की अधिकांश फिल्मों में महिला किरदारों को मात्र शो-पीस बनाकर पेश किया जाता है या सिर्फ हीरो के कद को बड़ा बनाने में उनकी सहयोगी की भूमिका रहती है। हालांकि कुछ फिल्में महिला प्रधान बनी हैं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर वे उतना सफल नहीं रहीं जितना हीरो प्रधान फिल्में रही हैं। हालांकि किसी भी बड़े हीरो के साथ महिला एक्ट्रेस को मजबूत और स्वतंत्र दिखाना मुमकिन है, लेकिन उसके लिए एक तो स्क्रिप्ट ऐसी लिखनी होगी जिसमें महिला किरदार का स्वतंत्र स्टारडम सामने आए; दूसरे, निर्देशकों को जोखिम उठाने के लिए आगे आना होगा और इसके लिए अपनी सोच बदलनी होगी। इस मिथक को तोड़ना होगा कि हीरो को बड़ा बनाने के लिए आसपास कमजोर महिला पात्रों की भीड़ जुटा दी जाए।

फिल्में मांग रही हैं बराबरी का हक

वास्तव में हिन्दी सिनेमा अब बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुका है। महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में खुद को पुरुषों से बेहतर साबित कर चुकी हैं। ऐसे में अगर फिल्म की हीरोइन को निडर, समझदार और साहसी दिखाया जाएगा, तो इससे हीरो का कद कम नहीं होगा। जब महिला किरदार पावरफुल होता है, तो पूरी फिल्म में कहानी का रोमांच और अधिक बढ़ जाता है।

महिलाएं शो-पीस नहीं

फिल्म की एक्ट्रेस को शो-पीस या अंग-प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करने की सामंती सोच को तोड़ने का अब वक्त आ गया है। एक महिला किरदार को फिल्म में ग्लैमरस और हीरो का लव-इंटरेस्ट (प्यार) दिखाएं, लेकिन बिना किसी ऑब्जेक्ट (वस्तु) की तरह पेश किए। कैमरे की आंख उसे गलत तरीके से न टटोले। महिला एक्ट्रेस को सफलता के चारे की तरह पेश न किया जाए। अभिनेत्री और राजनैतिक कंगना रनौत ने भी इस पर आपत्ति उठाई है।

कैमरा महिलाओं के खास अंगों पर क्यों?

फिल्म की डिमांड के नाम पर महिलाओं के विशेष अंगों को दिखाने की परंपरा पर अब विराम लगना चाहिए। एक्टरों के पौरुष सूचक अंगों पर कैमरा उतनी तेजी से फोकस नहीं करता जितना महिलाओं के निजी अंगों पर। फिल्म में उत्पीड़न की शिकार सिर्फ महिला होती है और एक्टर बदला लेने वाला ‘बब्बर शेर’। जबकि असल जिंदगी में महिला भी शेरनी है। उसका किरदार मजबूत करने वाले स्क्रिप्ट राइटर आने चाहिए। निर्देशकों को अपनी सोच बदलनी चाहिए।

सवाल यही है कि क्या फिल्ममेकर खुद अपनी कहानियों को बदलेंगे, या जब तक ऐसी पुरानी फॉर्मूला फिल्में बॉक्स-ऑफिस पर लगातार फ्लॉप नहीं होंगी, तब तक इंडस्ट्री में यह बदलाव नहीं आएगा? सवाल इसके अलावा भी हैं—जब तक बदलाव नहीं आएगा, महिलाएं फिल्म की सफलता का चारा बनाकर डाली जाती रहेंगी। हॉलीवुड में ऐसा नहीं है, वहां एक्ट्रेस भी दमदार होती हैं और फिल्म में कई बार उनका रोल एक्टर पर भारी होता है। लेकिन हिन्दी या साउथ सिनेमा में एक्ट्रेस को सिर्फ अंग-प्रदर्शन की वस्तु बनाकर रख दिया गया है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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