बिहार के जमुई में कक्षा 10 में पढ़ने वाली एक छात्रा और उसके सहपाठी के साथ सड़क पर हुई बदसलूकी और मारपीट का वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में आक्रोश है। हर मां बाप अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। 19 सितंबर की शाम कोचिंग से लौट रहे दोनों नाबालिगों को एक समूह ने कथित तौर पर रास्ते में रोक लिया। वीडियो में उनके साथ मारपीट और छात्रा के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किए जाने के दृश्य सामने आए हैं। पुलिस ने तीन नाबालिग आरोपियों को गिरफ्तार किया है, सात संदिग्धों की पहचान की है और मामले की जांच के लिए SIT गठित की है। लेकिन असली चोट इस तरह का दुस्साहस करने वालों के हौसलों और हिम्मत पर करनी जरूरी है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह घटना अकेली नहीं है। इसी साल मार्च में नालंदा के नूरसराय में भी एक महिला के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म के प्रयास, मारपीट और कपड़े फाड़ने की घटना सामने आई थी। आरोपियों ने घटना का वीडियो भी बनाया और उसके बाद वह सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ। पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया था और तीसरे की तलाश जारी थी। दोनों घटनाओं की परिस्थितियां और पीड़ित अलग हैं, लेकिन एक बात बेहद परेशान करने वाली समानता के रूप में सामने आती है—सार्वजनिक जगह पर महिला या लड़की को निशाना बनाना, घटना का वीडियो बनाना और फिर उसे सोशल मीडिया पर फैलाना। क्या बिहार में एक बार फिर आदिम युग या अपराधी युग की वापसी हो रही है। ये दस्तक परेशान करने वाली है।
क्या सड़क पर निकलना इतना बड़ा अपराध है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सड़क पर निकलना अपराध है। क्या बेटियां घर से बाहर नहीं निकल सकती हैं। की घटना में दो नाबालिग छात्र कोचिंग से लौट रहे थे। उन्हें रास्ते में रोककर घेरा गया और उनके साथ कथित तौर पर मारपीट तथा छात्रा के साथ अभद्रता की गई। यह सवाल सिर्फ जमुई का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या किसी लड़की या महिला का सड़क पर निकलना, पढ़ाई के लिए कोचिंग जाना या अपने किसी परिचित के साथ कहीं जाना उसे भीड़ के सामने जवाबदेह बना देता है?
अगर किसी लड़की को सड़क पर रोककर उससे पूछताछ करने, उसके साथ बदसलूकी करने या उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का अधिकार कोई समूह अपने हाथ में लेने लगे, तो यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि कानून के शासन को चुनौती है।
नालंदा की घटना ने भी यही चेतावनी दी थी
नालंदा के नूरसराय की घटना ने मार्च में ही यह दिखा दिया था कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के साथ-साथ अपराध का वीडियो बनाकर उसे प्रसारित करना भी एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक महिला को रास्ते में रोका गया, उसके साथ मारपीट और कथित तौर पर दुष्कर्म का प्रयास किया गया तथा घटना को कैमरे में रिकॉर्ड किया गया। बाद में वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ।
यानी अपराध करने वाले केवल अपराध तक नहीं रुक रहे। कई मामलों में वे पीड़िता की बेइज्जती को कैमरे में कैद करके उसे सार्वजनिक तमाशे में बदल देते हैं। यह मानसिकता और भी खतरनाक है।
किसी पीड़िता की गरिमा पर हमला करने के बाद उसके वीडियो को वायरल करना उसके लिए दूसरी बार हिंसा जैसा हो सकता है। इसलिए ऐसे वीडियो को शेयर करना या पीड़िता की पहचान उजागर करना भी गंभीर चिंता का विषय है।
जमुई मामले में बिहार पुलिस ने ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भी कार्रवाई शुरू की है, जिनसे नाबालिग पीड़िता की पहचान सामने आने का खतरा था। 32 सोशल मीडिया अकाउंट्स को नोटिस दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
नवादा से सामने आई तस्वीर भी परेशान करने वाली
नवादा के आनंदपुरा स्थित एक सरकारी स्कूल में कक्षा 6 से 8 की छात्राओं ने प्रधानाध्यापक पर अनुचित व्यवहार और गलत तरीके से छूने के आरोप लगाए हैं। कुछ छात्राओं ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानाध्यापक स्कूल के बाथरूम की ओर झांकते थे। एक छात्रा ने परीक्षा के दौरान कॉपी और प्रश्नपत्र लेने के लिए कार्यालय जाने पर गलत तरीके से छूने का आरोप लगाया। मामले के सामने आने के बाद स्कूल में हंगामा हुआ और पुलिस ने प्रधानाध्यापक को गिरफ्तार कर लिया। उनके खिलाफ POCSO सहित संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। बिलखती छात्राओं की आवाज को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है?
जिन बच्चियों को स्कूल में पढ़ने, सीखने और सुरक्षित महसूस करने का अधिकार होना चाहिए, अगर वही बच्चियां स्कूल परिसर में किसी शिक्षक के व्यवहार से डरने लगें तो यह केवल एक व्यक्ति पर लगे आरोप का मामला नहीं रह जाता। यह स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है।
सुशासन और सुराज की असली परीक्षा
राजनीति में सुशासन और सुराज बड़े लोकप्रिय शब्द हैं। लेकिन किसी सरकार के लिए सुशासन की असली परीक्षा भाषणों में नहीं, बल्कि उस सड़क पर होती है जहां एक आम लड़की शाम को पढ़ाई करके अपने घर लौटती है। उसे यह भरोसा होना चाहिए कि सड़क पर कानून का राज है।
उसे यह डर नहीं होना चाहिए कि कुछ लोग उसे रोक सकते हैं, उसके साथ अभद्रता कर सकते हैं और फिर उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल सकते हैं।
जमुई की घटना के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की, तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया और SIT गठित की। अब आगे की कार्रवाई यह तय करेगी कि बाकी संदिग्धों तक जांच कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है और पीड़ितों को न्याय एवं सहायता कितनी जल्दी मिलती है।
गुस्से से आगे बढ़कर व्यवस्था पर सवाल जरूरी
सोशल मीडिया पर इन घटनाओं के बाद स्वाभाविक रूप से गुस्सा दिखाई दे रहा है। कुछ लोगों ने सरकार से इस्तीफे की मांग की है, कुछ ने राष्ट्रपति शासन की मांग की है और कुछ ने आरोपियों के एनकाउंटर की बात कही है। इन घटनाओं को देखने के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का एनकाउंटर न्याय और बुलडोजर न्याय सही प्रतीत होता है। जिसमें अपराधी की कमर ही तोड़ दी जाती है। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि ऐसी घटनाएं होने से पहले उन्हें रोकने के लिए पुलिस की मौजूदगी, सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा, महिलाओं और बच्चों की शिकायतों पर त्वरित प्रतिक्रिया तथा स्थानीय स्तर पर निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
बिहार सरकार कठघरे में
जमुई और नालंदा की घटनाएं गंभीर हैं। इन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। लेकिन इन घटनाओं के आधार पर पूरे बिहार या बिहार के हर व्यक्ति को अपराध से जोड़ना भी उचित नहीं होगा। अपराध की जिम्मेदारी उन लोगों की है जिन पर उसके लिए आरोप हैं। लेकिन सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी अलग है। सरकार से यह पूछा जाना चाहिए कि नागरिकों, खासकर महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित सार्वजनिक वातावरण देने के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना किसी राज्य को बदनाम करना नहीं है।
बिहार की बेटियों को नारे नहीं, सुरक्षा चाहिए
जमुई की घटना और नालंदा की घटना को केवल दो अलग-अलग आपराधिक मामलों के रूप में देखकर आगे बढ़ जाना आसान है।लेकिन इनके भीतर छिपे सवालों को नजरअंदाज करना मुश्किल है। एक लड़की को सड़क पर सुरक्षित महसूस करने के लिए किसी राजनीतिक दल के नारे की जरूरत नहीं है। उसे पुलिस पर भरोसा चाहिए। उसे प्रशासन पर भरोसा चाहिए। उसे कानून पर भरोसा चाहिए। और सबसे बढ़कर उसे यह भरोसा चाहिए कि अगर कोई उसकी गरिमा और स्वतंत्रता पर हमला करेगा तो व्यवस्था उसके साथ खड़ी होगी। बिहार की बेटियों की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा है, जो एक नागरिक अपने राज्य और उसकी व्यवस्था पर करता है।








