बॉलीवुड में शादी, अफेयर, ब्रेकअप और फिर दूसरी शादी कोई नई कहानी नहीं है। कई सितारों की निजी जिंदगी में रिश्तों का बनना-बिगड़ना उनकी लोकप्रियता का हिस्सा बन चुका है। ऐसे माहौल में गोविंदा की कही एक बात इसलिए ठहरकर सुनने लायक लगती है क्योंकि उसमें सिर्फ एक अभिनेता की सफाई नहीं, बल्कि विवाह, आकर्षण और परिवार के प्रति जिम्मेदारी को समझने का एक अलग नजरिया भी दिखाई देता है।
गोविंदा की पत्नी सुनीता आहूजा लंबे समय से उनके पुराने रिश्तों और कथित अफेयर्स को लेकर बेबाक बातें करती रही हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अतीत को अतीत मानकर छोड़ा जा सकता है, लेकिन अगर वही कहानी दोबारा दोहराई जाए तो उसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। दिलचस्प बात यह है कि गोविंदा ने इन आरोपों को सीधे-सीधे स्वीकार या खारिज करने के बजाय अपने रिश्ते की तस्वीर कुछ दूसरे ढंग से पेश की।
उन्होंने सुनीता के बारे में कहा कि वह उन्हें बहुत प्यार से डांटती हैं और वह भी उसे प्यार से स्वीकार करते हैं। इस हल्के-फुल्के अंदाज के पीछे एक गंभीर बात छिपी है—हर रिश्ते में शिकायत का मतलब हमेशा दूरी नहीं होता। कई बार शिकायत अपनेपन की दूसरी भाषा भी होती है।
‘मिठाई की दुकान में रहकर भूखे निकलना…’
गोविंदा का सबसे दिलचस्प बयान वह है जिसमें उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति मिठाई की दुकान में रहकर भी भूखा निकल जाए तो यह दुखद है। सुनने में यह बात मजाकिया लगती है, लेकिन रिश्तों की मनोविज्ञान की भाषा में देखें तो यह आकर्षण और आत्मसंयम के बीच का फर्क समझाती है।
बॉलीवुड की दुनिया में दशकों तक काम करने वाले किसी अभिनेता के सामने आकर्षण के अवसरों की कमी नहीं होती। लगातार खूबसूरत और लोकप्रिय अभिनेत्रियों के साथ काम करना, स्क्रीन पर प्रेम का अभिनय करना, शूटिंग के दौरान घंटों साथ रहना और प्रशंसकों की लगातार मिलने वाली तवज्जो—ये सब किसी भी व्यक्ति के लिए भावनात्मक सीमाओं को चुनौती दे सकते हैं। लेकिन अवसर का मौजूद होना और उस अवसर को संबंध में बदल देना दो अलग बातें हैं।
गोविंदा का यह कहना कि वह अपनी महिला सह-कलाकारों के साथ काम के दौरान प्रेमपूर्ण रिश्ता बनाते थे, लेकिन शूटिंग खत्म होने के बाद घर लौट आते थे, इसी सीमा की तरफ इशारा करता है। अभिनय में भावनाएं पैदा करना और निजी जिंदगी में उन भावनाओं को आगे बढ़ाना एक ही चीज नहीं है। यही अंतर किसी भी विवाह के लिए महत्वपूर्ण है।
आकर्षण होना गलत नहीं, सीमा भूल जाना समस्या है
रिश्तों को समझने के लिए शायद यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कि विवाह के बाद आकर्षण समाप्त नहीं हो जाता। कोई व्यक्ति शादीशुदा है, इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया में उसे कोई दूसरा व्यक्ति आकर्षक नहीं लगेगा। असल परीक्षा वहां शुरू होती है जहां आकर्षण मौजूद हो।
क्या व्यक्ति उस आकर्षण को सिर्फ आकर्षण रहने देता है या उसे अपनी जिंदगी में ऐसी जगह दे देता है जहां उसका विवाह और परिवार असुरक्षित महसूस करने लगे?
गोविंदा की बातों को इसी नजरिए से देखा जा सकता है। उन्होंने अपने दौर की अभिनेत्रियों के साथ अपनी केमिस्ट्री को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही परिवार को अपनी प्राथमिकता बताया। उन्होंने अपनी पत्नी को अपने करियर और बच्चों की परवरिश में महत्वपूर्ण भूमिका का श्रेय भी दिया। यह बात आज के रिश्तों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
किसी रिश्ते में वफादारी का अर्थ सिर्फ यह नहीं कि व्यक्ति किसी और के साथ संबंध न बनाए। वफादारी का एक बड़ा हिस्सा यह भी है कि वह अपने साथी को सार्वजनिक और निजी जीवन में सम्मान दे, उसकी भावनाओं की कीमत समझे और ऐसे फैसलों से बचे जिनका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है।
सुनीता की शिकायत में भी एक रिश्ता दिखाई देता है
गोविंदा और सुनीता के बीच की बातचीत का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुनीता उन्हें आलोचना करती हैं, लेकिन गोविंदा उस आलोचना को सिर्फ अपमान की तरह नहीं देखते। उन्होंने लगभग मजाकिया अंदाज में कहा कि सुनीता उन्हें चार बार प्यार से तारीफ करने के बाद एक बार डांटती हैं। इसलिए उन्हें उस डांट में भी प्यार दिखाई देता है। यहां रिश्तों की एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक परत सामने आती है।
जब किसी व्यक्ति को अपने साथी से शिकायत होती है तो वह हमेशा रिश्ते को खत्म करना नहीं चाहता। कई बार शिकायत का मतलब होता है—‘मैं चाहता हूं कि तुम मुझे समझो।’ बेशक, हर शिकायत को प्यार का प्रमाण मानना सही नहीं होगा। लगातार अपमान, नियंत्रण या मानसिक प्रताड़ना किसी स्वस्थ रिश्ते का हिस्सा नहीं हो सकते। लेकिन दो लोगों के बीच होने वाली छोटी-छोटी नोकझोंक, शिकायत और असहमति में अगर सम्मान और अपनापन बचा हुआ है तो वही रिश्ता लंबे समय तक टिक सकता है।
बॉलीवुड के ग्लैमर के बीच ‘शरीफ’ होने का दावा
गोविंदा ने खुद को 34 साल की उम्र तक ‘बहुत शरीफ’ बताया। यह उनका आत्म-मजाक भी हो सकता है और अपने जीवन को देखने का उनका नजरिया भी। उनकी यह बात सच है या सिर्फ एक अभिनेता का अपने अतीत को देखने का तरीका—इसे तय करना आसान नहीं है। किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी का अंतिम सच वही जानता है।
लेकिन यहां सवाल गोविंदा के सच या झूठ से कहीं बड़ा है। अगर यह सिर्फ एक मुखौटा है, तब भी वह एक दिलचस्प मुखौटा है। और अगर यह सच है तो इससे भी ज्यादा अच्छी बात है। क्योंकि समाज में आदर्श सिर्फ इसलिए जरूरी नहीं होते कि हर व्यक्ति वास्तव में वैसा ही हो। कई बार आदर्श का सार्वजनिक रूप से मौजूद रहना भी लोगों को यह याद दिलाता है कि विकल्प मौजूद है।
खासकर उस मनोरंजन उद्योग में जहां विवाहित सितारों के दूसरे रिश्ते और फिर दूसरी शादियां लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं, वहां एक अभिनेता का यह कहना कि उसने अवसरों के बावजूद अपने परिवार और विवाह को प्राथमिकता दी, सुनने में निश्चित रूप से सुखद है।
पत्नी के लिए इसका अर्थ क्या है?
विवाह में सबसे बड़ी सुरक्षा शायद यही भावना होती है कि ‘मेरा साथी मुझे चुनता है।’ हर दिन, हर परिस्थिति में नहीं तो कम से कम उन क्षणों में जरूर जब उसके सामने दूसरा विकल्प मौजूद हो। सुनीता के लिए गोविंदा की ये बातें इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं क्योंकि वह सिर्फ यह नहीं कह रहे कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ जीवन बिताया। वह यह भी बता रहे हैं कि उनके पास आकर्षण, प्रसिद्धि और अवसरों की दुनिया थी, लेकिन उन्होंने घर लौटना चुना। यह बात किसी पत्नी के लिए किसी भी महंगे उपहार से ज्यादा मायने रख सकती है।
परिवार सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, एक चुनाव भी है
आज रिश्तों की सबसे बड़ी समस्या शायद यह नहीं कि लोगों को प्यार नहीं होता। समस्या यह है कि प्यार के साथ जिम्मेदारी निभाने की इच्छा कमजोर पड़ सकती है। एक रिश्ते को चलाने के लिए प्रेम जरूरी है, लेकिन सिर्फ प्रेम काफी नहीं। उसमें आत्मसंयम चाहिए, सीमाओं की समझ चाहिए, साथी की गरिमा का ख्याल चाहिए और कई बार अपने मन की इच्छा को ‘न’ कहने की क्षमता भी चाहिए।
गोविंदा की ‘मिठाई की दुकान’ वाली बात को अगर इसी संदर्भ में पढ़ें तो उसका अर्थ और गहरा हो जाता है। जिंदगी में आकर्षण की मिठाइयां बहुत हो सकती हैं। लेकिन हर मिठाई खाना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी समझदारी इसी में होती है कि व्यक्ति दुकान देखकर मुस्कुराए, अपनी पसंद की चीजों को पहचाने और फिर अपने घर लौट जाए।
क्योंकि अंततः शादी किसी जेल का नाम नहीं है और न ही वफादारी का अर्थ यह है कि व्यक्ति को दुनिया में सुंदरता या आकर्षण दिखाई देना बंद हो जाए। वफादारी शायद इससे कहीं ज्यादा परिपक्व चीज है आकर्षण को पहचानना, लेकिन अपने फैसले की जिम्मेदारी भी पहचानना।गोविंदा की कहानी का सबसे अच्छा हिस्सा शायद यही है।
यह सच है या सिर्फ एक खूबसूरत मुखौटा, इसका फैसला पाठक नहीं कर सकता। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपने परिवार के सामने ऐसा जीवन प्रस्तुत करता है जिसमें प्रेम, हंसी, शिकायत, सीमाएं और घर लौटने की आदत बची रहती है, तो उस मुखौटे में भी एक सामाजिक उपयोगिता जरूर है। और अगर यह मुखौटा नहीं, सच है—तो फिर ‘मिठाई की दुकान से खाली पेट लौटना’ सिर्फ एक मजेदार फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन की एक गंभीर सीख बन जाता है। हर अवसर का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता। कुछ अवसरों को छोड़ देना भी अपने परिवार के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है।








