मायावती ने EVM बंद कर बैलेट पेपर की वापसी की मांग की, अखिलेश यादव ने कहा—जीतने के बाद भी EVM का विरोध जारी रहेगा। कांग्रेस पहले से ‘वोट चोरी’ के आरोप के जरिए चुनाव आयोग, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है। ऐसे में सवाल है कि क्या 2027 के यूपी चुनाव से पहले EVM और चुनावी पारदर्शिता विपक्ष के बड़े राजनीतिक मुद्दों में शामिल होने जा रहे हैं? दुनिया का अनुभव इस बहस को क्या बताता है? आने वाले चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, मतदाता भी इसे लेकर असमंजस में दिख रहा है।
लखनऊ से शुरू बहस, निशाने पर EVM, चुनावी भरोसा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से काफी पहले चुनावी राजनीति में EVM बनाम बैलेट पेपर का सवाल फिर प्रमुखता से सामने आ गया है। 28 सितंबर 2026 को बसपा प्रमुख मायावती ने EVM से मतदान बंद कराकर बैलेट पेपर की व्यवस्था बहाल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में संदेह बढ़ने से लोकतंत्र में भरोसा कमजोर हो सकता है। मायावती ने नगीना से 2024 में चंद्रशेखर आजाद की जीत को लेकर भी EVM में कथित हेरफेर का आरोप लगाया। ये आरोप उनके राजनीतिक दावे हैं; इनके समर्थन में कोई न्यायिक रूप से स्थापित निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
अखिलेश का पक्ष
इसी दिन समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी EVM के विरोध को दोहराया। उन्होंने कहा कि अगर उनकी पार्टी सभी सीटें भी जीत जाए, तब भी वह EVM का विरोध करती रहेगी और बैलेट पेपर से चुनाव की मांग जारी रखेगी।
इससे बहस का एक नया पहलू सामने आया है। अब EVM का विरोध केवल चुनाव परिणाम से असहमति के संदर्भ में नहीं, बल्कि चुनाव प्रणाली को लेकर स्थायी राजनीतिक मांग के रूप में पेश किया जा रहा है।
कांग्रेस का वोट चोरी अभियान तस्वीर को बड़ा बना रहा
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस को अलग करके देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। कांग्रेस और राहुल गांधी पिछले एक साल से ‘वोट चोरी’ के आरोप को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाए हुए हैं। कांग्रेस के आधिकारिक मंच पर सितंबर 2026 में भी राहुल गांधी के ‘Vote Chori’ अभियान से जुड़े कई कार्यक्रम और वक्तव्य दर्ज हैं। 27 सितंबर को कांग्रेस ने ‘Vote Chori 2024’ और चुनाव आयोग से जुड़े अभियान को फिर प्रमुखता दी।
क्या है आपत्तियां
कांग्रेस की मौजूदा आपत्तियां केवल EVM तक सीमित नहीं हैं। उनमें मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी, नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया, Special Intensive Revision (SIR) और चुनाव आयोग की भूमिका जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। हालिया रिपोर्टों में विपक्ष के इन आरोपों और चुनाव आयोग के अपने बचाव के बीच टकराव को प्रमुखता दी गई है।
कांग्रेस के लिए यह मुद्दा नया भी नहीं है। पार्टी के आधिकारिक रिकॉर्ड में राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं के EVM तथा चुनावी प्रक्रिया से जुड़े पुराने बयान भी दर्ज हैं। 2023 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में EVM manipulation का मुद्दा भी चर्चा में आया था।
तस्वीर कुछ इस तरह दिखाई देती है
| राजनीतिक दल | मौजूदा प्रमुख आपत्ति/मांग |
|---|---|
| बसपा | EVM बंद कर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग |
| सपा | EVM का विरोध और बैलेट पेपर की मांग |
| कांग्रेस | ‘वोट चोरी’, मतदाता सूची, SIR और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल; EVM की पारदर्शिता पर भी लंबे समय से सवाल |
| चुनाव आयोग | EVM-VVPAT प्रणाली को सुरक्षित और सत्यापन योग्य बताता है |
यह समानता यह जरूर दिखाती है कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता विपक्षी राजनीति का साझा विषय बन रही है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगा कि 2027 में सभी विपक्षी दलों का साझा चुनावी अभियान केवल EVM पर ही केंद्रित होगा।
दुनिया में EVM का मॉडल कितना प्रचलित है?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। International IDEA के 178 देशों के मौजूदा डेटाबेस के अनुसार 144 देशों में फिलहाल e-voting का इस्तेमाल नहीं होता, जबकि 27 देशों में बाध्यकारी राष्ट्रीय चुनावों में किसी न किसी रूप में e-voting इस्तेमाल हो रही है। कुछ अन्य देशों में इसका इस्तेमाल केवल उप-राष्ट्रीय चुनावों में है। लेकिन इन 27 देशों को सीधे “EVM वाले 27 देश” कहना सही नहीं होगा।
इलेक्ट्रानिक मतदान के प्रचलित तरीके
- Direct Recording Electronic यानी DRE मशीन
- VVPAT वाली मशीन
- VVPAT के बिना DRE
- इंटरनेट वोटिंग
- Electronic Ballot Printer
- Optical Scan/Optical Recognition जैसी प्रणालियां
क्या ईवीएम व ई वोटिंग एक है
International IDEA के मौजूदा आंकड़ों में 178 देशों में 15 देशों में DRE मशीनें, 12 में Internet Voting, 4 में Electronic Ballot Printers और 7 में Optical Mark/Character Recognition जैसी व्यवस्थाएं दर्ज हैं। यानी “EVM” और “e-voting” को एक ही मानना तकनीकी रूप से सही नहीं है।
किन देशों में भारत जैसी मशीनें हैं?
भारत की व्यवस्था Direct Recording Electronic यानी DRE मशीन और VVPAT पर आधारित है। International IDEA के डेटाबेस में DRE मशीनों के इस्तेमाल वाले देशों में भारत के साथ अल्बानिया, बांग्लादेश, भूटान, ब्राजील, बुल्गारिया, ईरान, मैक्सिको, ओमान, पनामा, पेरू, रूस, वेनेजुएला और अमेरिका के कुछ राज्य आदि शामिल हैं। हालांकि हर देश में मशीन की तकनीक और कागजी सत्यापन व्यवस्था समान नहीं है।
अखिलेश की बात को समझें
इसलिए अखिलेश यादव का अमेरिका और जर्मनी का उदाहरण देते हुए यह कहना कि वहां बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं, मोटे तौर पर एक राजनीतिक तुलना है, लेकिन अमेरिका की पूरी चुनाव व्यवस्था को केवल “बैलेट पेपर” कहना अधूरा होगा। अमेरिका में राज्य के अनुसार अलग-अलग मतदान और मतगणना तकनीकें इस्तेमाल होती हैं।
जर्मनी की संघीय चुनाव व्यवस्था में फिलहाल पारंपरिक बैलेट पेपर प्रमुख है और International IDEA उसे e-voting छोड़ चुके देशों में रखता है।
कितने देशों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग छोड़ दी?
यही इस बहस का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। International IDEA के अनुसार 11 देशों में e-voting का इस्तेमाल हुआ और बाद में उसे छोड़ दिया गया। यानी लगभग 6 प्रतिशत देशों के मामले में ऐसा हुआ। IDEA ने यह भी दर्ज किया है कि ऐसे निर्णयों में विश्वास और सुरक्षा संबंधी चिंताएं एक प्रमुख कारण रही हैं।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। इन 11 देशों को “EVM इस्तेमाल करके बैलेट पेपर पर लौटने वाले 11 देश” कहना सही नहीं होगा। कुछ देशों में EVM, कुछ में Internet Voting और कुछ में स्थानीय स्तर की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था का प्रयोग हुआ था।
International IDEA के मौजूदा रिकॉर्ड में छोड़ी गई e-voting व्यवस्था वाले देशों में उदाहरण के तौर पर इक्वाडोर, फिनलैंड, जर्मनी, आयरलैंड, जापान, कजाखस्तान, नेपाल, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, पाकिस्तान और रोमानिया दर्ज हैं।
जर्मनी
जर्मनी ने DRE मशीनों का इस्तेमाल किया था। 2009 में संवैधानिक अदालत के फैसले के बाद वहां इलेक्ट्रॉनिक मतदान का इस्तेमाल व्यावहारिक रूप से बंद हो गया। IDEA भी इसे abandoned category में रखता है।
आयरलैंड
2002 में तीन निर्वाचन क्षेत्रों में electronic voting machines का परीक्षण हुआ। बाद में सुरक्षा, लागत और जनता की स्वीकार्यता को लेकर बहस हुई और 2009 में सरकार ने प्रणाली को खत्म करने की घोषणा की।
नॉर्वे
नॉर्वे का मामला भारत की EVM से अलग है। वहां 2011 और 2013 में इंटरनेट वोटिंग का परीक्षण हुआ। 2014 में इंटरनेट वोटिंग को छोड़ने का फैसला किया गया, जबकि मतदान केंद्रों पर कागजी मतदान जारी रहा।
जापान
जापान में स्थानीय चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान का इस्तेमाल 2002 से शुरू हुआ था। लेकिन 2018 में आखिरी नगरपालिका ने भी इसे छोड़ दिया और उसके बाद देश में किसी नगरपालिका में यह व्यवस्था उपयोग में नहीं रही।
पाकिस्तान
पाकिस्तान का मामला भी अलग है। वहां 2018 में विदेश में रहने वाले नागरिकों के लिए इंटरनेट वोटिंग का पायलट हुआ, लेकिन 2024 के आम चुनाव में इसे लागू नहीं किया गया।
इसलिए “11 देशों ने EVM को असफल मानकर बैलेट पेपर अपना लिया” कहना गलत होगा। सही बात यह है कि 11 देशों ने किसी न किसी प्रकार की e-voting व्यवस्था को बाद में छोड़ दिया।
दुनिया में बैलेट पेपर अभी भी बहुमत में क्यों है?
इसका सबसे सीधा जवाब International IDEA के आंकड़ों में मिलता है। 178 देशों में 144 देशों में फिलहाल e-voting इस्तेमाल नहीं होती। इसका अर्थ यह है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा आज भी पेपर आधारित मतदान या पेपर बैलेट से शुरू होने वाली चुनावी प्रक्रिया पर निर्भर है।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर देश में वोटों की गिनती हाथ से ही होती है। कई देशों में मतदाता पेपर बैलेट पर वोट करता है और बाद में मशीन से उसकी स्कैनिंग या गणना होती है।
यानी दुनिया में असली बहस सिर्फ EVM बनाम बैलेट पेपर नहीं है। बल्कि बड़ी बहस है “मतदान कैसे हो और मतदाता अपने वोट की स्वतंत्र एवं विश्वसनीय पुष्टि कैसे कर सके?”
भारत में EVM के साथ VVPAT क्यों जोड़ा गया?
भारत में EVM बहस को समझने के लिए VVPAT को समझना जरूरी है। VVPAT में मतदाता द्वारा चुने गए उम्मीदवार की जानकारी वाली पर्ची कुछ सेकंड के लिए दिखाई देती है। चुनाव आयोग के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र/सेगमेंट में पांच randomly selected polling stations की VVPAT पर्चियों का मिलान इलेक्ट्रॉनिक परिणाम से किया जाता है। इस व्यवस्था को लेकर विपक्ष का एक प्रमुख सवाल शत-प्रतिशत VVPAT मिलान का रहा है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग का तर्क है कि मौजूदा EVM-VVPAT व्यवस्था में मशीनों की जांच, मॉक पोल, सीलिंग, स्ट्रॉन्ग रूम, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी और निर्धारित VVPAT verification जैसे कई स्तर हैं।
इसलिए बहस के दो अलग प्रश्न हैं पहला क्या EVM में हेरफेर संभव है? दूसरा क्या मौजूदा व्यवस्था इतनी पारदर्शी है कि राजनीतिक दल और मतदाता उसके परिणाम पर भरोसा कर सकें? इन दोनों प्रश्नों को एक मान लेना बहस को सरल बना देगा, लेकिन तथ्यात्मक रूप से दोनों अलग हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या रहा है?
अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने EVM-VVPAT व्यवस्था को बरकरार रखा था और बैलेट पेपर पर लौटने की मांग स्वीकार नहीं की थी। अदालत ने VVPAT verification से जुड़े अतिरिक्त निर्देश भी दिए थे।
इसका अर्थ यह है कि वर्तमान भारतीय चुनाव व्यवस्था में EVM का इस्तेमाल कानूनी और संवैधानिक रूप से जारी है। इसलिए राजनीतिक दलों की ओर से बैलेट पेपर की मांग और वर्तमान चुनाव व्यवस्था की कानूनी स्थिति—दो अलग बातें हैं।
क्या 2027 में EVM बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा?
यहीं से यूपी की राजनीति का असली सवाल शुरू होता है। अभी उपलब्ध घटनाक्रम में तीन अलग-अलग धाराएं एक जगह आती दिखाई देती हैं।
पहली धारा—बसपा की है जिसमें मायावती सीधे EVM हटाकर बैलेट पेपर की मांग कर रही हैं। उन्होंने EVM को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोप भी लगाए हैं।
दूसरी धारा—सपा की है जिसमें अखिलेश यादव ने EVM विरोध को चुनाव परिणाम से अलग स्थायी राजनीतिक रुख के रूप में पेश किया है। उनका कहना है कि जीतने के बाद भी सपा बैलेट पेपर की मांग जारी रखेगी।
तीसरी धारा कांग्रेस की है। कांग्रेस का ‘वोट चोरी’ अभियान EVM से बड़ा है। इसमें मतदाता सूची, SIR, चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे शामिल हैं। पार्टी सितंबर 2026 में भी इस अभियान को सक्रिय रूप से चला रही है।
विश्वसनीयता का संकट
इस लिहाज से 2027 के लिए अभी इतना कहा जा सकता है कि विपक्षी दलों के अलग-अलग आरोप और मांगें चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के सवाल पर एक-दूसरे के करीब आती दिखाई दे रही हैं।
लेकिन क्या यह साझा राजनीतिक अभियान में बदलता है, क्या INDIA ब्लॉक के सभी दल इसे अपने घोषणापत्र में शामिल करते हैं और क्या यह जनता के बीच बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है—इसका फैसला आगे के राजनीतिक घटनाक्रम से होगा।
असली राजनीतिक लड़ाई EVM से ज्यादा ‘भरोसे’ की है
EVM पर विवाद का एक पहलू तकनीकी है और दूसरा राजनीतिक। तकनीकी सवाल है मशीन कितनी सुरक्षित है? कानूनी सवाल है मौजूदा सत्यापन व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं? राजनीतिक सवाल है क्या सभी दल चुनाव परिणाम को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त भरोसा महसूस करते हैं? और लोकतांत्रिक सवाल है क्या मतदाता को यह विश्वास है कि उसका वोट उसी उम्मीदवार के खाते में गया जिसे उसने चुना?
2027 का सवाल विश्वसनीयता का
मायावती की मांग, अखिलेश यादव का स्थायी EVM विरोध और कांग्रेस का ‘वोट चोरी’ अभियान इन तीनों को एक साथ देखने पर यही बड़ा मुद्दा उभरता है—2027 से पहले विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन दूसरी तरफ चुनाव आयोग मौजूदा EVM-VVPAT प्रणाली को सत्यापन और सुरक्षा की कई परतों वाली व्यवस्था बताता है। इसलिए यूपी चुनाव से पहले बहस केवल “EVM सही या गलत” तक सीमित नहीं रहेगी। असली बहस यह होगी कि भारत की चुनावी प्रणाली में पारदर्शिता, सत्यापन और राजनीतिक भरोसे को किस तरह बढ़ाया जाए।
यही 2027 के चुनाव से पहले EVM विवाद को एक तकनीकी मुद्दे से बढ़ाकर लोकतांत्रिक भरोसे की राजनीतिक बहस बना सकता है।
तथ्य-पेटी: एक नजर में
- 178 देशों का International IDEA डेटाबेस
- 144 देशों में फिलहाल e-voting नहीं
- 27 देशों में बाध्यकारी राष्ट्रीय चुनावों में किसी न किसी रूप में e-voting
- 11 देशों में e-voting इस्तेमाल के बाद छोड़ दी गई
- भारत DRE EVM + VVPAT व्यवस्था का इस्तेमाल करता है
- मायावती: EVM बंद कर बैलेट पेपर की वापसी की मांग
- अखिलेश यादव: जीतने की स्थिति में भी EVM विरोध जारी रखने की बात
- कांग्रेस: ‘वोट चोरी’ अभियान—मतदाता सूची, SIR, चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
- ECI: EVM-VVPAT को सत्यापन योग्य और बहु-स्तरीय सुरक्षा वाली व्यवस्था बताता है।
एआई की मदद से तैयार लेख








