दिव्या मित्तल ने IAS की नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। वास्तव में देखा जाए तो यह सिर्फ एक अधिकारी का इस्तीफा नहीं है। भ्रष्ट हो चुके तंत्र के गाल पर यह एक जोरदार तमाचा है। 6 मई 2026 से दिव्या मित्तल राजस्व विभाग में विशेष सचिव के रूप में काम कर रही थीं। उनका इस्तीफा अचानक आया फैसला नहीं लगता। यह एक ऐसी होनहार अधिकारी के मन की व्यथा है, जिसने 13 साल पहले व्यवस्था का हिस्सा बनकर देश और समाज के लिए काम करने का सपना देखा था, लेकिन शायद धीरे-धीरे उसे यह महसूस हुआ कि व्यवस्था में प्रतिभा से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और हो गया है।
यह सिर्फ व्यक्तिगत फैसला नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें जनता के बीच जाकर काम करने वाले अधिकारी को राजनीतिक टकराव के बाद करीब दस महीने तक वेटिंग फॉर पोस्टिंग में रखा जाता है और फिर फील्ड की भूमिका से हटाकर सचिवालय की कुर्सी दे दी जाती है।
पद बड़ा, लेकिन क्या उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल बड़ा था?
दिव्या मित्तल के मन में देश के लिए कुछ करने की कितनी ललक रही होगी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लंदन की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया। IIT दिल्ली की छात्रा, IIM बेंगलुरु से प्रबंधन की पढ़ाई और लंदन में मैनेजमेंट कंसल्टेंट रह चुकीं दिव्या मित्तल ने UPSC की परीक्षा पास करके IAS को चुना। उनके सामने विदेश में शानदार करियर था। उन्होंने फिर भी IAS चुना। क्यों? क्योंकि शायद उनके लिए नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं थी। वह व्यवस्था का हिस्सा बनकर व्यवस्था को बदलने का सपना लेकर आई थीं। और यहीं से उनकी कहानी दूसरी दिशा में मुड़ती है।
मिर्जापुर में जनता के बीच पहचान, फिर दस महीने की खामोशी
मिर्जापुर की जिलाधिकारी रहते हुए दिव्या मित्तल ने आम लोगों से सीधे संवाद और अपने अलग अंदाज की कार्यशैली से पहचान बनाई। लहुरियादह जैसे गांव में पानी पहुंचाने की पहल ने उनकी प्रशासनिक छवि को और मजबूत किया। लेकिन इसी दौरान उनका राजनीतिक टकराव भी सामने आया। तबादला हुआ। जिस जगह भेजा गया, वहां की पोस्टिंग रद्द हो गई। और फिर करीब दस महीने तक पोस्टिंग का इंतजार।
यहां सवाल पूछना जरूरी है
तबादला प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार को अधिकारियों को स्थानांतरित करने का पूरा अधिकार है। लेकिन जिस अधिकारी की नई पोस्टिंग का आदेश हो और फिर वह भी रद्द हो जाए तथा अधिकारी करीब दस महीने तक नियमित जिम्मेदारी से बाहर रहे, तो उसे केवल सामान्य प्रशासनिक घटना कहकर आगे बढ़ जाना आसान नहीं है।
दस महीने बहुत लंबा समय होता है
यह किसी अधिकारी के करियर में केवल दस महीने नहीं होते। यह उसकी कार्यक्षमता, आत्मविश्वास और प्रशासनिक ऊर्जा को प्रभावित करने वाला समय हो सकता है। इसीलिए यह सवाल आज भी खड़ा है—क्या यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी या एक ऐसी अघोषित सजा, जिसका कोई लिखित आदेश नहीं था?
देवरिया में दिव्या मित्तल ने खोल दिया था असली मोर्चा
इसके बाद दिव्या मित्तल देवरिया की जिलाधिकारी बनीं। लेकिन यहां कहानी और ज्यादा साफ दिखाई देने लगी। 3 जुलाई 2025 को देवरिया में DISHA की बैठक थी। भाजपा सांसद शशांक मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली इस बैठक में मंत्री, सांसद, विधायक और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे। बैठक में बरहज विधायक दीपक मिश्रा ने अधिकारियों के कामकाज पर सवाल उठाए और एक संविदा कर्मचारी के ट्रांसफर को रोकने के लिए किए गए अपने प्रयासों का जिक्र किया। बैठक में तल्खी बढ़ी और विधायक बैठक से बाहर चले गए।
दिव्या मित्तल की साफगोई
इसके बाद दिव्या मित्तल ने वह बात कह दी, जो शायद इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति थी। उन्होंने जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट संदेश दिया कि अधिकारियों और कर्मचारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता। यह कोई बंद कमरे की शिकायत नहीं थी। यह बात उन्होंने जनप्रतिनिधियों के सामने सार्वजनिक बैठक में कही। और वीडियो सामने आने के बाद यह पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया। बैठक में मौजूद कुछ अधिकारियों ने उनकी बात पर तालियां भी बजाईं।
राजनीति की तिलमिलाहट
यानी दिव्या मित्तल ने उस सीमा को सार्वजनिक रूप से रेखांकित कर दिया था, जिसे लेकर प्रशासन और राजनीति के बीच अक्सर खींचतान रहती है। लेकिन राजनीति चुप नहीं रही। कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने दिव्या मित्तल के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकतंत्र में प्रशासन का काम लोगों और जनप्रतिनिधियों की बात सुनना है और ऐसा कोई सरकारी आदेश नहीं है कि जनप्रतिनिधि अपनी बात नहीं रख सकते।
फिर देवरिया सदर के विधायक शलभ मणि त्रिपाठी सामने आए।उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों को किसी अधिकारी से जीओ समझने की जरूरत नहीं है। उनका कहना था कि अधिकारी अपना काम करें और जनप्रतिनिधियों को अपना काम करने दें। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अधिकारी ठीक से काम करें तो लोगों को शिकायत लेकर जनप्रतिनिधियों के पास आने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
अब इस पूरे घटनाक्रम पर एक नजर
एक तरफ एक IAS अधिकारी थी, जो कह रही थी कि ट्रांसफर-पोस्टिंग प्रशासनिक प्रक्रिया है और अधिकारियों पर दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए। दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि थे, जो कह रहे थे कि जनता अपनी समस्याएं लेकर उनके पास आती है और वे अधिकारियों पर काम कराने का दबाव बनाएंगे। यहां असली लड़ाई किसी एक कर्मचारी के ट्रांसफर की नहीं थी। यह अधिकार क्षेत्र की लड़ाई थी। और दिव्या मित्तल ने इस लड़ाई में अपनी सीमा स्पष्ट कर दी थी।
जिन्हें दिव्या की कार्यशैली से परेशानी थी, वे सामने थे
यहां किसी पर मनगढ़ंत आरोप लगाने की जरूरत नहीं है। नाम सामने हैं। बयान सामने हैं। बैठक का वीडियो सामने है। विवाद सार्वजनिक है। दिव्या मित्तल के सामने कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही का विरोधी रुख सामने आया। विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने भी उनके रुख पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। बैठक में बरहज विधायक दीपक मिश्रा की अधिकारियों के साथ तल्खी और बैठक से बाहर निकलने की घटना सामने आई।
अब पाठक खुद तय कर सकता है कि दिव्या मित्तल की कार्यशैली किसे असहज कर रही थी। किसे ऐसी जिलाधिकारी पसंद आती जो हर सिफारिश को आदेश समझकर मान ले? और किसे ऐसी जिलाधिकारी असुविधाजनक लगेगी जो सार्वजनिक बैठक में खड़े होकर कह दे कि ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता? यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
और फिर फील्ड से सचिवालय
इसके बाद 6 मई 2026 से दिव्या मित्तल को राजस्व विभाग में विशेष सचिव की जिम्मेदारी मिल गई। फिर से साफ कर देना जरूरी है—विशेष सचिव कोई छोटी या दंडात्मक पोस्ट नहीं है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में पद का नाम ही सब कुछ नहीं होता। एक अधिकारी की असली क्षमता उसके काम की प्रकृति से सामने आती है। दिव्या मित्तल की पहचान जनता के बीच काम करने वाली जिलाधिकारी की थी। वह फील्ड में जाती थीं। जनता से संवाद करती थीं। स्थानीय समस्याओं को सीधे पकड़ती थीं। और इसी कार्यशैली ने उन्हें लोकप्रिय बनाया था।
ऐसे अधिकारी को फील्ड से हटाकर सचिवालय में बैठाना प्रशासनिक दृष्टि से उचित हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा का इस्तेमाल वहां हो रहा था? या फिर व्यवस्था ने उन्हें वहां पहुंचा दिया जहां फाइलें थीं, लेकिन जनता नहीं? यही फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।
क्या यह टॉर्चर था?
किसी सरकारी दस्तावेज में यह नहीं लिखा है कि दिव्या मित्तल को “टॉर्चर” किया गया। लेकिन दस महीने की वेटिंग, राजनीतिक टकरावों की श्रृंखला और उसके बाद फील्ड से हटना—इन घटनाओं को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि एक अधिकारी के लिए यह अनुभव मानसिक और पेशेवर रूप से कितना कठिन रहा होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
और शायद यही वह जगह है जहां दिव्या मित्तल का इस्तीफा एक व्यक्तिगत घटना से बड़ा हो जाता है। क्योंकि सवाल यह नहीं कि दिव्या मित्तल ने नौकरी क्यों छोड़ी। सवाल यह है कि एक ऐसी महिला जिसने लंदन की नौकरी छोड़कर IAS चुना, उसे 13 साल बाद IAS से बाहर निकलने की जरूरत क्यों महसूस हुई? उन्होंने राजनीतिक दबाव को अपने इस्तीफे का घोषित कारण नहीं बताया है। इसलिए यह कहना कि उन्होंने किसी नेता के दबाव में इस्तीफा दिया, तथ्य नहीं है। लेकिन घटनाओं का क्रम सवाल जरूर पूछता है। और कभी-कभी घटनाओं का क्रम किसी भी बयान से ज्यादा बोलता है।
शायद असली जीत कुर्सी बचाने में नहीं थी
जो लोग किसी अधिकारी को उसकी पोस्टिंग से हटाकर, उसकी आवाज को दबाकर या उसकी कार्यशैली को कुंठित करके खुद को विजेता समझते हैं, उन्हें शायद यह समझना चाहिए कि सरकारी कुर्सी हमेशा स्थायी नहीं होती। दिव्या मित्तल ने वह कुर्सी ही छोड़ दी। जिस कुर्सी के लिए कोई व्यक्ति जीवन भर संघर्ष करता है, उसे उन्होंने अपने हाथ से छोड़ दिया। क्योंकि शायद उनके लिए कुर्सी से बड़ा कुछ और था।
अपनी शर्तों पर जीने की आजादी। और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे व्यंग्यात्मक पक्ष है। अगर किसी अधिकारी को दबाकर यह महसूस किया गया हो कि उसे हरा दिया गया, तो शायद यह जीत अधूरी है। क्योंकि दिव्या मित्तल ने अंततः वही किया जो कोई भी स्वतंत्र व्यक्ति कर सकता है। उन्होंने कुर्सी छोड़ दी, लेकिन अपनी आवाज नहीं। उन्होंने पद छोड़ा है, सपना नहीं। और संभव है कि उनकी अगली पारी शिक्षा, लेखन या किसी दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र में हो।
अगर ऐसा हुआ तो यह उन लोगों के लिए और बड़ा जवाब होगा जिन्होंने यह समझ लिया था कि IAS की कुर्सी छीनकर किसी अधिकारी की उपयोगिता भी खत्म की जा सकती है। नहीं। प्रतिभा को पद की जरूरत होती है, लेकिन प्रतिभा केवल पद पर निर्भर नहीं होती। दिव्या मित्तल का इस्तीफा इसलिए महत्वपूर्ण है। यह सिर्फ एक IAS अधिकारी का इस्तीफा नहीं है।
यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा किया गया सवाल है जिसमें राजनीतिक सिफारिश और प्रशासनिक स्वतंत्रता के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। और अगर किसी प्रतिभाशाली अधिकारी को यह महसूस होने लगे कि जनता के लिए काम करने से ज्यादा जरूरी राजनीतिक रूप से सुविधाजनक होना है, तो फिर सवाल उस अधिकारी से नहीं, पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।
दिव्या मित्तल ने IAS छोड़ा है। शायद उन्होंने हार नहीं मानी। शायद उन्होंने सिर्फ वह मैदान छोड़ दिया जहां नियमों से ज्यादा ताकत का खेल चल रहा था। और इसीलिए यह इस्तीफा किसी एक अफसर की विदाई नहीं लगता। यह व्यवस्था के चेहरे पर पड़ा वह तमाचा है जिसकी गूंज शायद बहुत लंबे समय तक सुनाई देगी।
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