Air India Pilot Drug Test: एयर इंडिया के एक पायलट का ड्रग्स टेस्ट पॉजिटिव आया है। यह वही पायलट है जो फुकेत से दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाले उस विमान को कमांड कर रहा था, जिसने उड़ान के दौरान अचानक ऊंचाई खो दी थी। इसके बाद डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) ने सभी भारतीय एयरलाइंस को अगले साल जुलाई तक अपने सभी पायलटों का साइकोएक्टिव सब्सटेंस के लिए एक बार टेस्ट कराने का आदेश दिया है। इंडियन एक्सप्रेस ने यह जानकारी दी है।
अगस्त से शुरू हुई थी प्रक्रिया
सूत्रों के मुताबिक, एयरलाइंस को यह निर्देश अगस्त में दिया गया था और टेस्टिंग शुरू भी हो चुकी है। अनुमान है कि भारतीय एयरलाइंस में करीब 14,000 पायलट हैं। DGCA के आदेश लागू होने से पहले ही एयर इंडिया ग्रुप ने अपनी तरफ से एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस में काम करने वाले करीब 5,000 पायलटों का एक बार का ड्रग टेस्ट शुरू कर दिया था।
4 सितंबर को जब बर्मा के एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन से फुकेत-दिल्ली फ्लाइट के पायलट-इन-कमांड के पॉजिटिव ड्रग टेस्ट की जानकारी सामने आई, उसके कुछ घंटे बाद एयर इंडिया ने कहा कि उसने संबंधित फ्लाइट की सेवा समाप्त कर दी है।
नियम और कड़े किये जाने के संकेत
सिविल एविएशन मिनिस्टर के. राममोहन नायडू के मुताबिक, एविएशन कर्मचारियों के साइकोएक्टिव सब्सटेंस के इस्तेमाल की टेस्टिंग के लिए नए और शायद ज्यादा कड़े नियमों का ड्राफ्ट DGCA इस महीने के आखिर तक जारी कर सकता है।
अगस्त में नायडू ने कहा था कि सिविल एविएशन मिनिस्ट्री ने DGCA को सुझाव दिया है कि सभी पायलटों का साल में एक बार डोप टेस्ट होना चाहिए। फिलहाल मौजूदा नियमों के मुताबिक हर साल 10 फीसदी पायलटों की रैंडम टेस्टिंग होती है।
10 फीसदी की रैंडम टेस्टिंग जरूरी
31 जनवरी 2022 से लागू साइकोएक्टिव सब्सटेंस की टेस्टिंग से जुड़े मौजूदा DGCA सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (CAR) के तहत पायलटों और एयर ट्रैफिक कंट्रोल को फोकस सेगमेंट में रखा गया है। इन दोनों सेगमेंट के 10 फीसदी कर्मचारियों की हर साल प्राइमरी रैंडम टेस्टिंग जरूरी है।
ये नियम एविएशन के सेफ्टी-सेंसिटिव कामों में लगे कर्मचारियों पर भी लागू होते हैं। इनमें एयरक्राफ्ट सर्टिफाइंग स्टाफ, ट्रेनी पायलट, इंस्ट्रक्टर और एग्जामिनर शामिल हैं। इन कर्मचारियों का हायरिंग के समय या किसी खास घटना के बाद टेस्ट करवाना जरूरी होता है।
अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग उठी थी
सूत्रों के मुताबिक, DGCA पहले से ही एविएशन कर्मचारियों की साइकोएक्टिव सब्सटेंस के लिए टेस्टिंग से जुड़े नियमों में बदलाव की प्रक्रिया में था। एयर इंडिया की घटना के बाद ड्रग टेस्टिंग प्रोटोकॉल को और सख्त करने और ड्रग्स के गलत इस्तेमाल के साबित मामलों में कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग उठी है।
नियमों में बदलाव को लेकर बातचीत चल रही थी। इसी दौरान रेगुलेटर ने करीब 12 महीनों के दौरान सभी एयरलाइन पायलटों का कम से कम एक बार ड्रग टेस्ट कराने का फैसला किया।
ऐसे होती है जांच
DGCA के CAR के मुताबिक, जिस कर्मचारी का टेस्ट किया जाना है, उसके यूरिन सैंपल को दो अलग-अलग कंटेनर में बांटकर स्टोर किया जाना चाहिए। टेस्टिंग की प्रक्रिया पहले कंटेनर में रखे सैंपल की स्क्रीनिंग से शुरू होती है। यह स्क्रीनिंग सैंपल इकट्ठा करने के तुरंत बाद की जाती है।
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अगर शुरुआती टेस्ट नॉन-नेगेटिव आता है, यानी साइकोएक्टिव सब्सटेंस की मौजूदगी का संकेत मिलता है, तो पायलट को कन्फर्मेटरी टेस्ट के नतीजे आने तक तुरंत उड़ान से हटा दिया जाता है।
इसके बाद दूसरे कंटेनर में रखे सैंपल को हाई-कॉम्प्लेक्सिटी इंस्ट्रूमेंटेशन का इस्तेमाल करके एक निर्धारित लैब में कन्फर्मेटरी टेस्ट के लिए भेजा जाता है।
दवाओं या खाने की चीजों से आ सकता है पाजिटिव
शुरुआती स्क्रीनिंग में कुछ दवाओं और खाने की चीजों के कारण भी पॉजिटिव रिजल्ट आने की आशंका होती है। तकनीकी वजहों से कुछ मामलों में गलत पॉजिटिव रिजल्ट भी आ सकता है।
अगर कन्फर्मेटरी टेस्ट नेगेटिव आता है, तो संबंधित संगठन के इंचार्ज को मेडिकल रिव्यू ऑफिसर (MRO) से सलाह लेनी होती है। इसका मकसद यह पता लगाना होता है कि शुरुआती पॉजिटिव नतीजा किसी वैध इलाज या किसी दूसरे नुकसान न पहुंचाने वाले स्रोत की वजह से तो नहीं आया था।
उदाहरण के लिए, कोडीन वाली दर्द निवारक दवा ओपियेट्स के लिए पॉजिटिव नतीजा दे सकती है।
अनुशासनात्मक कार्रवाई भी होगी
अगर MRO यह पुष्टि करता है कि रिजल्ट ड्रग्स के इस्तेमाल का पॉजिटिव केस है, तो इसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होती है।
अगर यह पहली बार है जब किसी कर्मचारी का ड्रग टेस्ट पॉजिटिव आया है, तो संगठन उसे किसी विशेषज्ञ डॉक्टर, काउंसलर या नशा मुक्ति केंद्र में रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम के लिए रेफर करता है।
दोबारा टेस्ट में रिपोर्ट निगेटिव होना जरूरी
सूत्रों के मुताबिक ड्यूटी पर लौटने के लिए कर्मचारी को दोबारा टेस्ट कराना होगा। उसे नेगेटिव रिपोर्ट देनी होगी और संगठन के मेडिकल इंचार्ज से फिटनेस सर्टिफिकेट लेना होगा।
अगर कर्मचारी का टेस्ट दोबारा पॉजिटिव आता है, तो उसे फिर से निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा। तीसरी बार टेस्ट पॉजिटिव पाए जाने पर उसका लाइसेंस सस्पेंड कर दिया जाता है।








