वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

Election Commission Credibility: ज्ञानेश के खिलाफ बढ़ता आक्रोश, क्या बड़े बदलाव के संकेत?

Election Commission Credibility: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक दलों का आक्रोश जिस तेजी से बढ़ रहा है वह देश के किसी बड़े ऐतिहासिक परिवर्तन की ओर बढ़ने के संकेत दे रहा है। इस विरोध से एक बात तो काफी हद तक स्पष्ट है कि ये केवल ज्ञानेश कुमार का व्यक्तिगत विरोध नहीं हैं। लेकिन काफी समय से चल रही व्यवस्थागत खामियों के आक्रोश का हिस्सा जरूर हैं। मौजूदा घटनाक्रम में अधिक नहीं तो कमोवेश इसके पीछे चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची का एसआईआर, ईवीएम बनाम बैलेट से मतदान, चुनाव आयोग की स्वायत्तता और विपक्षी दलों की साझा राजनीतिक रणनीति जैसे कई मुद्दे एक साथ जुड़ गए हैं। अक्टूबर की शुरुआत काफी आक्रामक रही जब दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, लखनऊ और हिमाचल समेत तमाम जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए।

उद्धव-राज ठाकरे का साझा मार्च क्या कहता है?

शिवसेना (यूबीटी) चीफ उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) चीफ राज ठाकरे ने रविवार को मुंबई में चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक जॉइंट प्रोटेस्ट मार्च निकाला। दोनों पार्टियों ने इलेक्शन प्रोसेस में गड़बड़ी का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। ठाकरे बंधुओं की एकजुटता महाराष्ट्र में नये राजनीतिक समीकरण गढ़ने के संकेत दे रही है। साथ ही साझा ताकत भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

मुंबई में विराट गर्जना मोर्चा, SIR पर सवाल

विराट गर्जना मोर्चा (ग्रैंड रोअर मार्च) नाम का यह मोर्चा साउथ मुंबई के मेट्रो सिनेमा से शुरू हुआ और बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन हेडक्वार्टर तक थोड़ी दूरी तय करने वाला था। कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी NCP (SP) के राज्य नेताओं ने भी प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया। प्रोटेस्टर्स ने इलेक्टोरल रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कथित गड़बड़ियों को लेकर CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने या उनके इस्तीफे की मांग की।

खास बात ये है कि मुंबई मार्च कॉकरोच जनता पार्टी के मुंबई के शिवाजी पार्क में चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘जेल भरो आंदोलन’ करने के दो दिन बाद भी हो रहा है। यानी मुद्दा व्यापक रूप ले रहा है।

टीएन शेषन के दौर से चुनाव आयोग की मौजूदा स्थिति तक

अगर गौर करें तो टीएन शेषन ने चुनाव आयोग की गरिमा को जिस तरह से स्थापित किया था और उसे केंद्र सरकार का टूल बनने से बचाया था आज चुनाव आयोग की स्थिति दंत विहीन निकाय की हो गई है जो अपने आप में लाचार और असहाय है। इसी वजह से जो मुद्दा प्रदर्शन की शुरुआती मांग ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से शुरू हुआ अब चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता तक पहुंच गया है।

विपक्ष SIR को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखना और अपात्र नाम हटाना है। जबकि सच्चाई इसके बहुत विपरीत है। चुनाव आयोग के फार्मों के मकड़जाल में उलझकर और बीएलओ की संवेदनहीनता से तमाम लोग अपने नाम सूची से बाहर करवा कर बैठ गए और खुद को असहाय महसूस करने लगे।

SIR और वोटर लिस्ट के मकड़जाल में आम जनता

किसी के लिए भी उसके बाबा-दादी कहां किस जगह वोट डालते थे, ये जानना या उनका वोटर कार्ड कहां है पता करना बहुत मुश्किल है। यहां तक कि भारत जैसे देश में जहां 95 फीसदी जनता प्राइवेट संस्थानों में नौकरी करती है और कभी संस्थान बदलता है, कभी शहर, कभी ट्रांसफर होता है। एक जगह का वोटर बना रहना मुमकिन नहीं है, न ही उनके बच्चों के लिए याद रखना संभव है कि उनके माता-पिता कहां वोटर थे।

राज ठाकरे ने उठाया SIR और बैलेट पेपर का मुद्दा

यही वजह है कि विरोध के दौरान चीफ इलेक्शन कमिश्नर पर मज़ाक उड़ाते हुए राज ठाकरे ने कहा, ज्ञानेश काका, वोट मत लूटो। उन्होंने महाराष्ट्र में SIR एक्सरसाइज़ को कैंसिल करने की भी मांग की और वोटिंग मशीन के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की।

हमारी मांग है कि महाराष्ट्र में किया गया पूरा SIR कैंसिल किया जाए। कानून कहता है कि इमरजेंसी की स्थिति आने पर SIR किया जाता है। असेंबली चुनाव के दौरान चालीस से साठ लाख वोटर जोड़े गए और इसके ज़रिए सत्ता पर कब्ज़ा किया गया। और अब, SIR के ज़रिए दो करोड़ लोगों को हटाया जा रहा है। ये दो करोड़ वोटर कौन हैं?

राज ठाकरे ने कहा मैं सभी पॉलिटिकल पार्टियों से अपील करता हूं कि वे दिल्ली जाएं और SIR कैंसिल करने की मांग करें। वोटिंग मशीन बंद कर देनी चाहिए और बैलेट पेपर से चुनाव कराने चाहिए।

उद्धव ने साधा सरकार और चुनाव प्रक्रिया पर निशाना

उद्धव ठाकरे ने भी कहा, हम आज यहां तानाशाह को उखाड़ फेंकने के लिए खड़े हैं। पूरे देश में 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। बंगाल और तमिलनाडु में भी वोटर्स को बाहर कर दिया गया है।

पश्चिम बंगाल में चल रहे उपचुनाव का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, पश्चिम बंगाल में अभी उपचुनाव चल रहा है, और लोगों ने वोट देने का अपना अधिकार मांगने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यह सिर्फ़ एक उपचुनाव है, तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है? अभी यह तय नहीं है कि कल सुनवाई होगी या नहीं।

मुद्दा सरकार बनाम विपक्ष नहीं, जनता के वोट का है

मुद्दा यह नहीं है कि विपक्ष सरकार को तानाशाह बता रहा है या हिटलर से तुलना कर रहा है। मुद्दा जनता के हितों का है। क्या अपने नाम कटवा कर जनता को संतुष्ट कहा जा सकता है।

ECI Credibility

उद्धव ठाकरे ने एडॉल्फ हिटलर का भी ज़िक्र किया और मनमाने शासन पर हमला बोला। उन्होंने कहा, हिटलर भी ऐसा ही तानाशाह था, लेकिन आखिर में उसे खुद को गोली मारनी पड़ी। इस देश में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हो सकती है। जो लोग मनमाने ढंग से काम कर रहे हैं, उन्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।

उन्होंने आगे कहा, हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक उसे सड़कों पर नहीं लाया जाता और कानून के दायरे में सज़ा नहीं दी जाती।

तिरंगे के साथ मार्च, क्या बन रहा है व्यापक विपक्षी मंच?

पार्टी के निशान से अलग हटकर आयोजित इस मार्च में शायद सबकी भागीदारी इसीलिए ज्यादा थी कि पार्टी के झंडे लाने की इजाज़त नहीं थी। हिस्सा लेने वालों और सपोर्टर्स से सिर्फ़ तिरंगा लेकर चलने को कहा गया।

अगर जनता का समर्थन विपक्ष को हासिल है तो फैसला लेना होगा वरना जनता अपना फैसला सुनाएगी वो शायद ज्यादा तीखा होगा।

आदित्य ठाकरे और संजय राउत ने भी उठाए सवाल

X पर एक पोस्ट में, आदित्य ठाकरे ने कहा, ज्ञानेश को जाना होगा! उन्होंने आगे कहा, हम, भारत के नागरिक, तब तक चुप नहीं रहेंगे जब तक हम अपना वोट, अपनी डेमोक्रेसी वापस नहीं ले लेते और अपने संविधान को सरकार से नहीं बचा लेते।

आदित्य ठाकरे ने कहा, हम दुनिया की सबसे बड़ी पहले की डेमोक्रेसी हैं। भारत उस कमज़ोर इलेक्शन कमीशन पर भरोसा नहीं करता जो वोट चोरी और इलेक्शन चोरी में शामिल रहा है!

शिवसेना (UBT) लीडर संजय राउत ने कहा कि यह मार्च डेमोक्रेटिक संस्थाओं, चुनावी प्रोसेस और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कमज़ोर करने की कोशिशों का एक साथ जवाब था।

क्या विरोध बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत ?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुरू हुआ राजनीतिक विरोध अब केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। SIR, मतदाता सूची, EVM बनाम बैलेट पेपर और चुनाव आयोग की स्वायत्तता जैसे मुद्दे इसके केंद्र में आ गए हैं।

ठाकरे बंधुओं का एक साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत जरूर दे रहा है। लेकिन यह विरोध देश में किसी बड़े ऐतिहासिक परिवर्तन की शुरुआत है, इसे अभी स्थापित तथ्य के तौर पर कहना जल्दबाजी होगी। इसके लिए यह देखना होगा कि आंदोलन को राजनीतिक दलों के बाहर आम मतदाताओं और नागरिक समाज का कितना व्यापक समर्थन मिलता है।

अगर यह आक्रोश चुनावी प्रक्रिया में विश्वास और मताधिकार के सवाल पर व्यापक जनआंदोलन में बदलता है, तभी इसे किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन की दिशा में बढ़ता कदम माना जा सकेगा।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें