नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने शनिवार को कई अहम बदलावों की घोषणा की है, जो कहीं न कहीं उठाए गए सवालों को जायज ठहराते हैं। अब आयोग ने ऐसे मतदाताओं को राहत दी है जिन्हें ‘अनमैप्ड’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस मिला है। अब उन्हें हर मामले में ERO या AERO कार्यालय जाकर सुनवाई में शामिल होने की जरूरत नहीं होगी। BLO उनके घर जाकर दस्तावेज जुटा सकेंगे और जरूरत पड़ने पर सुनवाई ऑनलाइन की जा सकेगी। परिवार का कोई वयस्क सदस्य भी मतदाता की ओर से सुनवाई में शामिल हो सकेगा।
इसके अलावा आयोग ने SIR के दौरान छूटे मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं के नाम लगातार अपडेट की प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने की बात कही है। गोवा में 97 छूटे मतदाताओं में से 81 के फॉर्म-6 भरने की जानकारी भी आयोग ने दी है। लेकिन इन फैसलों के बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर व्यवस्था शुरू से ठीक तरीके से काम कर रही थी तो अब उसमें इतने बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या मतदाता को कार्यालय बुलाना जरूरी था?
SIR में जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठे, उन्हें नोटिस देकर सुनवाई के लिए बुलाने की प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठे। अब आयोग कह रहा है कि ऐसे मामलों में BLO खुद मतदाता के घर जाकर दस्तावेज ले सकते हैं और सामान्य परिस्थितियों में मतदाता को ERO कार्यालय आने की जरूरत नहीं होगी। यहीं से व्यवस्था को लेकर एक अहम सवाल पैदा होता है।
जब BLO पहले से घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं, तो आपत्ति या दस्तावेज की जरूरत पड़ने पर उसी स्तर पर समाधान की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई? अगर किसी बुजुर्ग, महिला, दिव्यांग या दूर-दराज के इलाके में रहने वाले मतदाता को अपने दस्तावेज लेकर सरकारी कार्यालय पहुंचना पड़े, तो प्रक्रिया की सहजता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब आयोग ने घर से दस्तावेज लेने की व्यवस्था की है तो इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह सुविधा पहले से क्यों नहीं थी।
Form-6 ने क्यों बढ़ाई उलझन?
SIR के दौरान नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल किए जा रहे Form-6 से जुड़ा विवाद भी इसी व्यवस्था की एक बड़ी परीक्षा बन गया। रिपोर्टों के मुताबिक नए ऑनलाइन फॉर्म में यह जानकारी मांगी गई थी कि आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था या नहीं। दो चुनाव आयुक्तों की ओर से इस बदलाव की वैधता और प्रक्रिया पर आपत्ति जताए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
मतदाताओं की फजीहत
यह मतदाताओं के लिए भी सबसे बड़ा सवाल बन गया था। दादा-दादी का नाम मतदाता सूची में था या नहीं ये जानना सामान्यतः हरेक के लिए जरूरी नहीं है। जो लोग किराये के घरों में रहते आ रहे हैं उनके दादा-दादी कहां मतदाता थे। या नहीं थे। फिर उनके माता पिता कहां मतदाता थे या नहीं थे। ये बहुत ही फसाने वाले सवाल थे जिनके जवाब प्रशासन से लिए जाने चाहिए। ये तो सिजरा बनाने जैसा हो गया। कौन कब कब कहां कहां रहा ये याद करके तलाशना और अंत में कहां थे इसे खंगालना क्या आम आदमी के लिए संभव है।
आयोग का स्पष्टीकरण
आयोग ने अब स्पष्ट किया है कि यह अतिरिक्त घोषणा केवल उन राज्यों में लागू होगी जहां SIR चल रहा है। गैर-SIR अवधि में सामान्य नियमों के तहत लागू Form-6 इस्तेमाल होगा। आयोग ने यह भी कहा है कि SIR से जुड़े Form-6 के साथ लगाई गई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है।
फिर सवाल वही है अगर यह बदलाव पहले से तय प्रक्रिया का हिस्सा था तो इसे लेकर आयोग के भीतर ही आपत्ति क्यों सामने आई? और अगर प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट थी तो मतदाताओं तथा अधिकारियों के स्तर पर भ्रम की स्थिति क्यों बनी?
97 मतदाताओं का मामला सिर्फ संख्या नहीं
गोवा में 97 मतदाताओं के नाम को लेकर सामने आया मामला भी चुनावी व्यवस्था की तकनीकी क्षमता पर सवाल खड़े करता है। बहुत बड़ी संख्या में मतदाता अभी भी छूटे हुए हैं। उनके नाम सामने कब आएंगे और कैसे आएंगे। आयोग ने कहा है कि संबंधित BLO को घर-घर जाकर छूटे मतदाताओं के फॉर्म लेने के निर्देश दिए गए हैं और 81 लोग Form-6 भर चुके हैं। लेकिन यहां असली सवाल यह है कि जिन लोगों की पात्रता स्पष्ट हो चुकी थी, उनके नाम समय पर सिस्टम में दर्ज क्यों नहीं हो पाए?
चुनाव आयोग ने इसी संदर्भ में ECINet की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अगुवाई में एक समिति बनाने और उसमें IIT/IIIT के स्वतंत्र विशेषज्ञ को शामिल करने की बात कही है। आयोग के मुताबिक IT मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़ी नई पहलों को आगे से मंजूरी से पहले अधिकारियों की समिति में भी चर्चा के लिए रखा जाएगा। इससे एक बड़ा संस्थागत प्रश्न सामने आता है—क्या मतदाता सूची जैसी संवेदनशील व्यवस्था में किसी नए डिजिटल सिस्टम को लागू करने से पहले पर्याप्त स्वतंत्र तकनीकी जांच और फील्ड टेस्टिंग हुई थी?
पारदर्शिता पर भी उठे सवाल
चुनाव आयोग ने शनिवार की बैठक में यह भी कहा कि आयोग की सभी बैठकों का एजेंडा पहले से सर्कुलेट किया जाएगा और बैठक के मिनट्स जारी किए जाएंगे। आयोग ने साथ ही उन खबरों को खारिज किया जिनमें दो चुनाव आयुक्तों के बीच SIR और IT व्यवस्था को लेकर मतभेद की बात कही गई थी। आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े सभी आदेश तीनों आयुक्तों की सहमति से जारी हुए हैं।
लेकिन यहां भी सवाल किसी व्यक्ति या दल का नहीं बल्कि संस्था की कार्यप्रणाली का है। अगर सभी महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं तो फैसलों की प्रक्रिया, आपत्तियों और उनके समाधान का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में परेशानी क्या है? चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के मामले में पारदर्शिता केवल अंतिम फैसले से नहीं, बल्कि फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया से भी जुड़ी होती है।
राहत के फैसले क्या व्यवस्था की कमियां स्वीकार करते हैं?
शनिवार के फैसलों को मतदाताओं के लिए राहत के तौर पर देखा जा सकता है। घर पर दस्तावेज लेने की सुविधा, ऑनलाइन सुनवाई, परिवार के सदस्य को प्रतिनिधि बनाने की अनुमति और छूटे मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन अभियान निश्चित तौर पर प्रक्रिया को आसान बनाते हैं। लेकिन इन फैसलों से एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है। क्या ये बदलाव पहले से बेहतर व्यवस्था की योजना का हिस्सा थे या पैदा हुई दिक्कतों के बाद किए गए सुधार हैं?
यदि यह सुधार पहले से प्रक्रिया में शामिल किए जा सकते थे तो इन्हें शुरुआत से लागू क्यों नहीं किया गया? और यदि ये समस्याओं के बाद किए गए बदलाव हैं, तो क्या आयोग को यह बताना चाहिए कि शुरुआती व्यवस्था में कहां कमी रह गई थी?
विरोध का मुद्दा व्यवस्था पर सवाल का है
SIR को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद और विरोध अपनी जगह हैं। विपक्षी दलों ने आयोग के कदमों को अपर्याप्त बताया है और CEC के खिलाफ अपनी राजनीतिक मुहिम जारी रखने की बात कही है। दूसरी ओर, आयोग ने शनिवार को तीनों आयुक्तों की संयुक्त बैठक के जरिए यह संदेश दिया कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। ऐसे माहौल में बहस को केवल ‘SIR के पक्ष’ या ‘SIR के विरोध’ तक सीमित करना शायद असली सवालों को पीछे छोड़ देगा।
असल सवाल यह है कि क्या मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने, सत्यापन और आपत्ति के लिए बनाई गई व्यवस्था इतनी सरल, पारदर्शी और तकनीकी रूप से भरोसेमंद है कि एक पात्र नागरिक को अपने मताधिकार को साबित करने के लिए अनावश्यक प्रशासनिक चक्कर न लगाने पड़ें?
मतदाता व मतदान से जुड़े सवाल की अहमियत
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठना अपने आप में किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का प्रमाण नहीं है। सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब मामला सीधे मतदाता सूची और नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा हो।
SIR की पूरी प्रक्रिया में यही कसौटी होनी चाहिए—पात्र मतदाता का नाम न छूटे, अपात्र नाम की पहचान हो, हर निर्णय का स्पष्ट रिकॉर्ड हो और किसी नागरिक को तकनीकी या प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण अपने मताधिकार से वंचित न होना पड़े।
शनिवार के फैसलों से आयोग ने कुछ व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने की कोशिश जरूर की है। अब अगली चुनौती यह है कि इन बदलावों का जमीन पर कितना प्रभाव पड़ता है और क्या वे उन सवालों का स्थायी समाधान दे पाते हैं जो SIR की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से लगातार उठ रहे हैं।








