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कांशीराम का आंदोलन, मायावती का परिवार और असमंजस में बसपा कार्यकर्ता

कांशीराम में वह साहस था कि उन्होंने जिस आंदोलन को खड़ा किया, उसे परिवार के मोह से दूर रखा। उन्होंने अपने रिश्तेदारों को राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बनाया। उनके लिए संगठन और मिशन किसी परिवार से बड़े थे। यही वजह है कि बसपा का जन्म किसी परिवार की राजनीतिक संपत्ति के रूप में नहीं हुआ था। यह एक आंदोलन था, एक विचार था और सत्ता के जरिए बहुजन समाज को राजनीतिक हिस्सेदारी दिलाने का अभियान था। लेकिन आज सवाल यह है कि कांशीराम के उसी आंदोलन की राजनीतिक उत्तराधिकारी मायावती ने उसे कहां पहुंचा दिया?

परिवार के इर्द गिर्द सिमटता आंदोलन

एक कार्यकर्ता के रूप में जिस मायावती ने कांशीराम के साथ चलकर बसपा को खड़ा किया, उन्हीं के दौर में पार्टी का नेतृत्व धीरे-धीरे परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता दिखाई देने लगा। पहले भाई आनंद कुमार की भूमिका सामने आई। फिर आकाश आनंद को आगे किया गया। उनके बाद परिवार के दूसरे सदस्यों को लेकर संभावनाएं बनीं। अब ईशान आनंद को आगे करने का फैसला सामने है।

यह सिलसिला अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। कांशीराम ने परिवार को आंदोलन से दूर रखा था, लेकिन मायावती आज आंदोलन के भविष्य के लिए परिवार के भीतर ही विकल्प क्यों तलाश रही हैं? यहीं पर बसपा की मौजूदा राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

माया का विरोधाभास

मायावती अपने ताजा बयान में खुद कह रही हैं कि पार्टी और बहुजन मिशन परिवार से बड़े हैं। वह आंबेडकर और कांशीराम के उदाहरण दे रही हैं। वह यह भी कह रही हैं कि यदि ईशान आनंद भी पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल पाए गए तो परिवार के किसी अन्य सदस्य को जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी और किसी मिशनरी कार्यकर्ता को आगे किया जाएगा। लेकिन सवाल फिर वही है—उस मिशनरी कार्यकर्ता का इंतजार क्यों?

अगर बसपा सचमुच कार्यकर्ताओं की पार्टी है तो किसी कार्यकर्ता को नेतृत्व की जिम्मेदारी देने के लिए परिवार के एक और प्रयोग की जरूरत क्यों पड़ रही है? यही वह जगह है जहां आलोचना केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं रह जाती। सवाल संगठन के चरित्र का हो जाता है।

आंदोलन परिवार की जागीर

कांशीराम के पास परिवार को राजनीतिक विरासत से दूर रखने का साहस था। मायावती के पास भी वही राजनीतिक विरासत है, वही संगठन है और वही बहुजन आंदोलन है। फर्क सिर्फ इतना है कि कांशीराम ने आंदोलन को अपने परिवार से बड़ा रखा, जबकि मायावती के दौर में सवाल उठ रहा है कि कहीं आंदोलन का राजनीतिक ढांचा धीरे-धीरे एक व्यक्ति और उसके परिवार के इर्द-गिर्द तो नहीं सिमट गया?

बसपा का सबसे बड़ा संकट शायद यही है—जिस आंदोलन ने बहुजन समाज के लाखों लोगों को यह विश्वास दिया था कि सत्ता किसी परिवार की जागीर नहीं, उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी है, उसी आंदोलन में नेतृत्व के लिए परिवार का विकल्प बार-बार क्यों दिखाई दे रहा है?

एक और विडंबना

मायावती कहती हैं कि उनका असली परिवार पूरा बहुजन समाज है। यह उनका घोषित राजनीतिक संकल्प है। लेकिन अगर पूरा बहुजन समाज ही परिवार है तो फिर पार्टी के भीतर अगली पीढ़ी के नेतृत्व के लिए उसी व्यापक परिवार से कोई कार्यकर्ता क्यों नहीं?क्यों न कोई ऐसा कार्यकर्ता आगे आए जिसने दशकों तक बूथ, सेक्टर, विधानसभा और जिला स्तर पर संगठन को खड़ा किया हो?क्यों न उस कैडर को मौका मिले जिसने बिना किसी पारिवारिक पहचान के पार्टी के लिए अपना जीवन लगाया है? अगर कांशीराम के समय में यह संभव था तो मायावती के समय में यह असंभव क्यों हो गया?  यही सवाल 23 सितंबर की बैठक को महत्वपूर्ण बनाता है।

क्या नेतृत्व का रास्ता परिवार से होकर है

यह सिर्फ ईशान आनंद को जिम्मेदारी देने का सवाल नहीं है। यह इस बात का सवाल है कि आने वाले समय में बसपा की पहचान एक आंदोलन, एक कैडर आधारित राजनीतिक संगठन और बहुजन विचारधारा की पार्टी के रूप में होगी या उसका केंद्र एक परिवार और एक नेतृत्व के इर्द-गिर्द ही बना रहेगा। कांशीराम ने बसपा को परिवार से बचाकर आंदोलन बनाया था। अब मायावती के सामने चुनौती यह है कि वह उस आंदोलन को परिवार के घेरे से बाहर निकालकर फिर से कार्यकर्ताओं के हाथों में कितना देती हैं। क्योंकि आंदोलन तब कमजोर नहीं होता जब नेता बदलता है। आंदोलन तब कमजोर होता है जब कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे कि नेतृत्व तक पहुंचने का रास्ता संगठन से नहीं, परिवार से होकर जाता है।

Ram Krishna
Author: Ram Krishna

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