कानून-व्यवस्था के नाम पर सख्त कार्रवाई जरूरी है, लेकिन क्या कार्रवाई से पहले यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि आरोपी वास्तव में दोषी है और कहीं निर्दोष व्यक्ति प्रशासनिक कार्रवाई का शिकार तो नहीं बन रहा?” ये एक बड़ा सवाल है जो कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उठा है हालांकि राज्य सरकार फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है।
मामला क्या था
दरअसल, 2 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने उन्हें 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। कोर्ट के आदेश के मुताबिक यह रकम जिलाधिकारी की सैलरी और उन सभी जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल की जानी थी, जिन्होंने आकृति को NSA के तहत हिरासत में लेने की रिपोर्ट तैयार करने में भूमिका निभाई थी।
अब स्टेट और रूपम बड़ी अदालत में
अब आकृति चौधरी मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल की जाएगी। इतना ही नहीं, गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम भी हाईकोर्ट के आदेश को अलग से चुनौती देंगी जो इस मामले को और अधिक चर्चित बना रहा है।
इसलिए है मामला खास
ऐसा इसलिए है क्योंकि आकृति चौधरी मामले में हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी और अब उसी फैसले के खिलाफ सरकार तथा डीएम की अलग-अलग अपील इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाती है। वहीं सत्यम वर्मा का परिवार भी NSA हिरासत को चुनौती देने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है।
पत्रकार भी आकृति की राह पर
उधर पत्रकार सत्यम वर्मा की पत्नी शाकंभरी ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका वापस लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की अनुमति मांगी है। यह कदम आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द होने के बाद उठाया गया है। यहां अब बड़ा सवाल यही है कि शासन और प्रशासन के स्तर पर सख्त कार्रवाई के लिए क्या पहले एक कसौटी जरूरी है या वह जब जो चाहे कर सकता है। ऐसा सवाल तभी खड़ा होता है जब किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप अदालत की कसौटी पर टिक नहीं पाते। पहले आकृति चौधरी का मामला और अब पत्रकार सत्यम वर्मा का एनएसए का मामला इसी बड़े सवाल की ओर इशारा कर रहा है।
सवाल प्रशासन के एक्शन का आधार क्या हो
यहां सवाल किसी आरोपी को बचाने का नहीं है। पुलिस और प्रशासन को हिंसा, आगजनी या कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी ही चाहिए। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि कार्रवाई ठोस सबूत और कानून के मुताबिक हो तथा किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल संदेह, राजनीतिक पहचान या किसी दूसरे व्यक्ति से कथित संबंध के आधार पर लंबे समय तक जेल में न रखा जाए। इस मामले पर ज्यादा कुछ इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि मामला बड़ी अदालत में है और वह अपने विवेक से सही गलत का फैसला करेगी








