लखनऊ। सरकारी स्कूल की बदहाली और कथित अव्यवस्थाओं को सामने लाने वाले एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिस तरह की सख्त टिप्पणी की है, उसने ग्राउंड रिपोर्टिंग, प्रेस की स्वतंत्रता और सरकारी जवाबदेही के सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। हाईकोर्ट ने पत्रकार अमित यादव के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक लगाते हुए कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि स्कूल की कमियां उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई बदले की कार्रवाई है। अदालत ने इसे बेहद तीखी भाषा में “मैसेंजर को मारने” जैसा बताया।
8 सितंबर को दिए गए आदेश में न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि यदि किसी सरकारी स्कूल की कमियों की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है तो सरकार को उन कमियों की जांच कर उन्हें दूर करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए, न कि इसे ‘ईगो का मामला’ बनाकर पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
स्कूल की बदहाली दिखाई तो पत्रकार पर दर्ज हो गई FIR
मामला लखनऊ के गोसाईगंज स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय से जुड़ा है। याचिका के मुताबिक पत्रकार अमित यादव ने 20 अगस्त को स्कूल का दौरा किया था। उन्होंने स्कूल की कथित बदहाल स्थिति, खराब टॉयलेट, पीने के पानी की समस्या और दूसरी व्यवस्थागत कमियों की रिपोर्टिंग की। इस दौरान उन्होंने कुछ शिक्षकों से बातचीत भी की। इसके बाद 24 अगस्त को गोसाईगंज थाने में उनके खिलाफ BNS की विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज की गई।
FIR में आरोप लगाया गया कि पत्रकार ने बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश किया, बच्चों की पढ़ाई में बाधा डाली और दो महिला शिक्षकों को स्कूल की स्थिति के बारे में बोलने के लिए मजबूर किया। रिपोर्टिंग को राजनीतिक भेदभाव से प्रेरित होने का आरोप भी लगाया गया। यानी जिस रिपोर्टिंग में एक सरकारी स्कूल की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए थे, उसी रिपोर्टिंग के बाद रिपोर्ट करने वाले पत्रकार को ही कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
हाईकोर्ट ने तस्वीरों में देखी स्कूल की ‘बहुत खराब हालत’
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड में पेश की गई तस्वीरों का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि तस्वीरें पहली नजर में स्कूल परिसर की “बहुत खराब हालत” दिखाती हैं। यहीं से अदालत का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया।
अगर सरकारी स्कूल की स्थिति वास्तव में खराब है तो प्रशासन का पहला दायित्व यह होना चाहिए कि वह उस स्थिति की जांच करे। यदि पत्रकार की रिपोर्ट सही है तो कमियां दूर की जाएं और यदि रिपोर्ट गलत है तो तथ्यों के आधार पर उसका खंडन किया जाए।लेकिन कमियां दिखाने वाले पत्रकार के खिलाफ ही FIR दर्ज होना अदालत को पहली नजर में उचित नहीं लगा।
‘मैसेंजर को मारने’ वाली टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
हाईकोर्ट की सबसे तीखी टिप्पणी इसी संदर्भ में आई। अदालत ने कहा कि मामले को पत्रकार द्वारा स्कूल की कमियों की रिपोर्टिंग के नजरिये से देखने पर पहली नजर में ऐसा प्रतीत होता है कि FIR उन्हीं कमियों को उजागर करने के जवाब में दर्ज की गई है अदालत ने इसे “killing the messenger” यानी “संदेश देने वाले को ही सजा देना” जैसा बताया।
यही टिप्पणी इस मामले को सामान्य FIR पर रोक लगाने के आदेश से आगे ले जाती है। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकार की भूमिका केवल सरकारी घोषणाओं को प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। सरकारी संस्थानों की जमीन पर वास्तविक स्थिति क्या है, जनता को मिलने वाली सुविधाएं कितनी प्रभावी हैं और सरकारी दावों तथा जमीनी हकीकत में कितना अंतर है—इन सवालों को सामने लाना भी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण दायित्व है।
RTE Act के तहत सरकार की जिम्मेदारी भी याद दिलाई
हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि Right to Education Act, 2009 के तहत राज्य की जिम्मेदारी है कि स्कूल निर्धारित मानकों को पूरा करें। ऐसे में यदि कोई पत्रकार किसी सरकारी स्कूल में इन मानकों से जुड़ी कमियों को सामने लाता है तो सरकार के लिए वह रिपोर्ट एक शिकायत या सूचना का स्रोत बन सकती है।
अदालत के रुख का सार यही है कि कमियां बताने वाले व्यक्ति को निशाना बनाने के बजाय कमियों को दूर करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
प्रेस की आजादी सिर्फ बड़े मुद्दों तक सीमित नहीं
इस मामले का एक बड़ा पहलू यह भी है कि प्रेस की स्वतंत्रता की चर्चा अक्सर राष्ट्रीय राजनीति, बड़े घोटालों और सत्ता के खिलाफ रिपोर्टिंग के संदर्भ में होती है। लेकिन असल पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय और जमीनी रिपोर्टिंग में होता है।
किसी सरकारी स्कूल में शौचालय काम नहीं कर रहा है, बच्चों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है, अस्पताल में दवाएं नहीं हैं या किसी सरकारी योजना का लाभ जमीन तक नहीं पहुंच रहा—ये ऐसे मुद्दे हैं जिनकी जानकारी अक्सर ग्राउंड रिपोर्टिंग से ही सामने आती है।
व्यवस्था नहीं अव्यवस्था के खिलाफ
अगर ऐसी रिपोर्टिंग के बाद रिपोर्ट करने वाले पत्रकार को ही मुकदमे और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़े, तो इससे पत्रकारों के बीच एक स्वाभाविक भय पैदा हो सकता है। क्योंकि वह व्यवस्था पर नहीं अव्यवस्था पर सवाल उठाता है।
इसीलिए हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल अमित यादव के मामले तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यह व्यापक सवाल उठाती है कि क्या सरकारी संस्थानों की कमियों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को प्रताड़ित करने के बजाय उनकी रिपोर्ट को सुधार का अवसर माना जाना चाहिए?
अदालत ने FIR पर लगाई रोक
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया मामले में हस्तक्षेप की जरूरत मानते हुए पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक लगा दी और निर्देश दिया कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत का यह आदेश मामले का अंतिम फैसला नहीं है। FIR पर रोक का अर्थ यह नहीं है कि पूरे मामले के सभी आरोप अंतिम रूप से गलत साबित हो गए हैं। लेकिन अदालत की प्रथम दृष्टया टिप्पणी ने सरकारी संस्थानों की कमियां उजागर करने वाली पत्रकारिता और उसके बाद पत्रकार के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
सवाल सरकार से ज्यादा व्यवस्था का है
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पत्रकार ने स्कूल की रिपोर्टिंग सही की या गलत। उसका जवाब जांच और तथ्यों से सामने आ सकता है।
बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकारी स्कूल की बदहाली की शिकायत सामने आती है तो सरकार की पहली प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए—जांच और सुधार या शिकायत करने वाले पर कार्रवाई?
हाईकोर्ट आदेश से सवाल की दिशा स्पष्ट
सरकार के लिए पत्रकार की रिपोर्ट को चुनौती देना संभव है, तथ्यों का खंडन करना संभव है और यदि कोई वास्तविक अपराध हुआ है तो कानून अपना रास्ता भी अपना सकता है। लेकिन केवल इसलिए कि किसी रिपोर्ट से सरकारी व्यवस्था की कमियां सामने आती हैं, रिपोर्टर को ही निशाना बनाया जाए तो इससे प्रेस की स्वतंत्रता और सरकारी जवाबदेही दोनों प्रभावित होती हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट की ‘मैसेंजर को मारने’ वाली टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता और व्यवस्था से असहज सवाल पूछने वाला पत्रकार समस्या नहीं, बल्कि कई बार उस समस्या को सामने लाने वाला माध्यम होता है।
स्कूल की हालत सुधारना सरकार की जिम्मेदारी है और उस हालत को जनता के सामने रखना पत्रकार का काम। अगर रिपोर्ट गलत है तो तथ्यों से जवाब दिया जाना चाहिए, FIR से नहीं—यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश बनकर सामने आता है।








