दिव्या मित्तल के IAS से इस्तीफे की कहानी आज भी सुर्खियों में है। लेकिन इसी के साथ कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार के जेल जाने की खबर भी सामने है। दोनों घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो मामला अब किसी एक अधिकारी की कहानी से ऊपर उठता दिखाई देता है। सवाल भारतीय प्रशासनिक सेवा की उस व्यवस्था पर खड़ा होता है, जहां एक तरफ सत्ता और प्रशासन के बीच टकराव है, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों में अफसर जेल पहुंच रहे हैं और तीसरी तरफ कुछ अधिकारी व्यवस्था से समझौता करने के बजाय उससे बाहर निकलने का रास्ता चुन रहे हैं।
आखिर IAS की कुर्सी का सच क्या है?
क्या इस कुर्सी पर बैठकर ईमानदारी से काम करना उतना ही आसान है जितना UPSC की परीक्षा पास करना? या असली परीक्षा IAS बनने के बाद शुरू होती है? दिव्या मित्तल ने 13 साल की सेवा के बाद इस्तीफा दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे को राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं बताया है, इसलिए उनके फैसले को सीधे राजनीतिक प्रतिशोध का नतीजा कहना उचित नहीं होगा। लेकिन उनके करियर की घटनाओं को देखें तो सवाल जरूर उठता है।
मिर्जापुर की जिलाधिकारी रहते हुए जनता के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाली दिव्या मित्तल का तबादला हुआ। नई पोस्टिंग का आदेश रद्द हुआ और इसके बाद करीब दस महीने तक वह वेटिंग फॉर पोस्टिंग में रहीं। फिर देवरिया की जिलाधिकारी बनीं और वहां भी उनकी कार्यशैली तथा जनप्रतिनिधियों के साथ उनके मतभेद सार्वजनिक हुए। जुलाई 2025 की DISHA बैठक में ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर उन्होंने जनप्रतिनिधियों के दबाव पर सवाल उठाया। इसके बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
फिर 6 मई 2026 से उन्हें राजस्व विभाग में विशेष सचिव की जिम्मेदारी मिल गई। विशेष सचिव का पद छोटा नहीं है। लेकिन सवाल पद का नहीं, प्रतिभा के इस्तेमाल का है। जिस अधिकारी की पहचान जनता के बीच जाकर काम करने, जनसंवाद और फील्ड प्रशासन से बनी हो, उसे फील्ड से हटाकर सचिवालय की कुर्सी पर बैठा देना क्या उसकी क्षमताओं का सबसे बेहतर इस्तेमाल था?और अब उसी अधिकारी ने IAS की कुर्सी ही छोड़ दी। यहां से कहानी गंभीर हो जाती है।
IAS की कुर्सी पर दबाव नया नहीं है
प्रशासनिक सेवा में अधिकारियों के सामने सत्ता और व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने के अनेक अवसर होते हैं। सवाल यह है कि उस तालमेल की सीमा कहां तक है। कई अधिकारी व्यवस्था के साथ चलते हैं। कुछ परिस्थितियों से समझौता करते हैं। कुछ विरोध करते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी लड़ाई की कीमत चुकाते हैं।
1994 में बिहार कैडर के IAS अधिकारी जी. कृष्णैया की भीड़ ने हत्या कर दी थी। वह उस समय गोपालगंज के जिलाधिकारी थे। यह भारतीय प्रशासनिक इतिहास की उन भयावह घटनाओं में है जो बताती हैं कि फील्ड में कानून और प्रशासन की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी के सामने खतरे कितने गंभीर हो सकते हैं।
हालांकि लखीमपुर खीरी की वह चर्चित घटना 2005 में वहां एस. मंजूनाथ की हत्या हुई थी। 27 वर्षीय मंजूनाथ IIM लखनऊ से पढ़े थे और Indian Oil Corporation में सेल्स मैनेजर थे। पेट्रोल में मिलावट के खिलाफ कार्रवाई के बाद उनकी हत्या कर दी गई। यह घटना भी बताती है कि भ्रष्ट नेटवर्क से टकराने की कीमत कभी-कभी जान तक हो सकती है।
अनुराग तिवारी की मौत आज भी सवाल छोड़ती है
17 मई 2017 को कर्नाटक कैडर के 2007 बैच के IAS अधिकारी अनुराग तिवारी लखनऊ के हजरतगंज इलाके में मीरा बाई मार्ग स्थित सरकारी गेस्ट हाउस के बाहर मृत मिले थे। वह उस दिन अपना 36वां जन्मदिन मना रहे थे और उस समय कर्नाटक में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति आयुक्त थे। उनकी मौत ने देशभर में सवाल खड़े किए।
परिवार ने हत्या की आशंका जताई। उत्तर प्रदेश सरकार ने मामला CBI को सौंपा और CBI ने हत्या का मुकदमा भी दर्ज किया। लेकिन बाद में CBI ने AIIMS के मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए उनकी मौत को दुर्घटनावश गिरने से हुई मौत माना। इसलिए अनुराग तिवारी की मौत को हत्या कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन एक IAS अधिकारी की लखनऊ में सरकारी गेस्ट हाउस के बाहर हुई रहस्यमय मौत ने नौकरशाही में अधिकारियों की सुरक्षा और उन पर पड़ने वाले दबाव को लेकर जो सवाल खड़े किए थे, वे अपनी जगह आज भी महत्वपूर्ण हैं।
रिंकू सिंह राही: सिस्टम से लड़ने की दूसरी तस्वीर
दूसरी तरफ रिंकू सिंह राही का उदाहरण है। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई। 2009 में उन पर जानलेवा हमला हुआ और वह बच गए। बाद में उन्होंने IAS की सेवा में प्रवेश किया। 2026 में उन्होंने भी व्यवस्था में अपनी क्षमता के अनुरूप सार्थक काम न कर पाने की शिकायत करते हुए इस्तीफे की घोषणा की थी, हालांकि बाद में उन्हें फिर पोस्टिंग मिली।
राही की कहानी यह बताती है कि व्यवस्था के भीतर रहकर लड़ने वाला अधिकारी केवल भ्रष्टाचार से नहीं लड़ता, उसे अपनी पोस्टिंग, व्यवस्था और अपने ही तंत्र से भी लड़ना पड़ सकता है। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि अधिकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ कितना लड़ सकता है। सवाल यह भी है कि व्यवस्था उसे लड़ने के लिए कितनी जगह देती है।
और अब ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार
30 अगस्त 2026 को कर्नाटक कैडर के 2016 बैच के IAS अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार को कर्नाटक CID ने KPSC पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं के मामले में गिरफ्तार किया। अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा है।
गंगवार 2024 से मार्च 2026 तक KPSC में परीक्षा नियंत्रक थे। जांच एजेंसी का आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में OMR शीट में कथित हेरफेर और अनियमितताएं हुईं। CID ने 329 OMR शीट फॉरेंसिक जांच के लिए भेजी हैं। इस मामले में जांच अभी जारी है। ज्ञानेंद्र गंगवार पर लगे आरोप अदालत में साबित होने बाकी हैं। लेकिन यह घटना एक बड़ी विडंबना जरूर सामने रखती है।
जिस IAS सेवा से देश प्रशासन में ईमानदारी, दक्षता और निष्पक्षता की उम्मीद करता है, उसी सेवा के कुछ अधिकारी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में जेल पहुंचते हैं।
प्रदीप शुक्ला से लेकर KPSC तक
उत्तर प्रदेश के 1981 बैच के IAS अधिकारी प्रदीप शुक्ला NRHM घोटाले के मामले में CBI की कार्रवाई के बाद 2012 में गिरफ्तार हुए थे और करीब 90 दिन जेल में रहे। बाद में उन्हें जमानत मिली। 2017 में कोयला आवंटन मामले में पूर्व कोयला सचिव और IAS अधिकारी एच.सी. गुप्ता समेत अधिकारियों को दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई। यानी IAS अधिकारियों के जेल पहुंचने की घटनाएं कोई एक दिन की कहानी नहीं हैं।
NRHM से लेकर कोयला आवंटन और अब KPSC भर्ती अनियमितताओं तक भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पद के दुरुपयोग के आरोपों में IAS अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई के उदाहरण मिलते हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा सिरा ज्यादा परेशान करने वाला है।
एक तरफ जेल, दूसरी तरफ इस्तीफा
देशभर में IAS अधिकारियों के इस्तीफे और VRS के आंकड़े भी सवाल पैदा करते हैं। DoPT के आंकड़ों का हवाला देते हुए प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार 2010-14 के बीच देशभर में 11 IAS अधिकारियों ने इस्तीफा दिया था, जबकि 2015 से मई 2025 के बीच यह संख्या बढ़कर 20 हो गई।
उत्तर प्रदेश में तस्वीर और ज्यादा दिलचस्प है। दिसंबर 2025 की रिपोर्टों में पिछले कुछ वर्षों में करीब एक दर्जन UP-cadre IAS अधिकारियों के इस्तीफा या VRS लेकर सेवा से बाहर होने का उल्लेख किया गया था। अधिकारियों के बीच राजनीतिक दबाव, बदलता कार्य वातावरण, करियर की संभावनाएं और निजी क्षेत्र के बेहतर अवसरों को संभावित कारणों के रूप में बताया गया।
2022 में एक महीने के भीतर पांच UP IAS अधिकारियों द्वारा VRS के लिए आवेदन किए जाने की खबर भी सामने आई थी। यानी सवाल केवल यह नहीं कि IAS अधिकारी भ्रष्टाचार में फंसकर जेल क्यों जाते हैं। सवाल यह भी है कि कुछ अधिकारी सेवा छोड़ने का रास्ता क्यों चुन रहे हैं?
2010 का एक आंकड़ा आज भी चौंकाता है
2010 के Civil Services Survey का एक आंकड़ा आज के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। IAS अधिकारियों से पूछा गया था कि उन्होंने कभी इस्तीफे या VRS पर विचार किया है तो उसके पीछे क्या कारण रहे। 36.8 प्रतिशत अधिकारियों ने “serious political interference and harassment” को सेवा छोड़ने पर विचार करने का “very important” कारण बताया, जबकि 32.8 प्रतिशत ने इसे “important” कारण माना।
इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि 36.4 प्रतिशत अधिकारियों ने meaningful contribution न कर पाने को “very important” कारण बताया और 39.8 प्रतिशत ने अपनी क्षमता की पहचान न होने को “very important” कारण माना।
यानी समस्या केवल राजनीतिक दबाव की नहीं है। समस्या यह भी है कि अधिकारी को यह महसूस होने लगे कि वह अपनी क्षमता का इस्तेमाल ही नहीं कर पा रहा। और यही बिंदु दिव्या मित्तल के मामले को इस पूरे विमर्श से जोड़ देता है।
IAS के सामने आखिर कितने रास्ते हैं?
अगर इन सभी घटनाओं को एक साथ रखें तो IAS की कुर्सी का एक कड़वा सच सामने आता है। एक रास्ता है—समझौता करो और सिस्टम का हिस्सा बन जाओ। दूसरा रास्ता है—लड़ो तो व्यवस्था और सत्ता के दबाव का सामना करो। तीसरा रास्ता है—दिव्या मित्तल की तरह एक दिन कुर्सी ही छोड़ दो। और चौथा रास्ता है—अगर भ्रष्टाचार के आरोपों में फंस गए तो जेल पहुंचो।
लेकिन क्या यही भारतीय प्रशासनिक सेवा का भविष्य होना चाहिए? जिस सेवा में देश के सबसे प्रतिभाशाली युवाओं को आने के लिए प्रेरित किया जाता है, वहां सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने अधिकारी परीक्षा पास करके IAS बने। सवाल यह होना चाहिए कि IAS बनने के बाद उन्हें काम करने की कितनी स्वतंत्रता मिली? कितनों को अपनी क्षमता के मुताबिक काम करने दिया गया? कितनों को राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा? कितनों ने VRS या इस्तीफे के बारे में सोचा? और कितने ऐसे हैं जो सिस्टम में रहकर धीरे-धीरे उसी सिस्टम का हिस्सा बन गए?
असली संकट कुर्सी का नहीं, व्यवस्था का है
दिव्या मित्तल का इस्तीफा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक व्यक्तिगत निर्णय से कहीं बड़ा सवाल पैदा करता है। एक तरफ ज्ञानेंद्र गंगवार जैसे अधिकारी हैं, जिन पर भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं और जो जांच के बीच जेल पहुंच गए हैं।
दूसरी तरफ दिव्या मित्तल जैसी अधिकारी हैं, जिन्होंने अपनी प्रशासनिक यात्रा में जनता के बीच काम किया, राजनीतिक टकरावों का सामना किया और अंततः IAS की नौकरी छोड़ दी। बीच में रिंकू सिंह राही जैसे अधिकारी हैं, जो व्यवस्था के भीतर रहकर लड़ते रहे। और इतिहास में जी. कृष्णैया जैसे अधिकारी भी हैं, जिन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते हुए जान गंवाई। इन सबको एक ही तराजू में तौलना गलत होगा। इनकी परिस्थितियां अलग हैं, मामले अलग हैं और कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।
एक साझा सवाल
लेकिन इन अलग-अलग कहानियों के पीछे एक साझा सवाल जरूर है, क्या भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था अपने सबसे अच्छे अधिकारियों को बचा पा रही है? क्योंकि भ्रष्टाचार में फंसे अधिकारी के लिए कानून अपना रास्ता बनाता है। यह जरूरी भी है। लेकिन जो अधिकारी ईमानदारी से काम करना चाहता है, राजनीतिक दबाव का विरोध करता है और जनता के बीच अपनी पहचान बनाता है, उसके लिए भी व्यवस्था में पर्याप्त सुरक्षा और स्वतंत्रता होनी चाहिए।
वरना सबसे बड़ा नुकसान किसी एक दिव्या मित्तल का नहीं होगा। नुकसान उस व्यवस्था का होगा, जिसे बेहतर बनाने के लिए देश के प्रतिभाशाली युवा IAS बनने का सपना देखते हैं। IAS की कुर्सी का सच शायद यही है—कोई समझौता करता है, कोई लड़ता है, कोई दिव्या मित्तल बनकर कुर्सी छोड़ देता है और कोई भ्रष्टाचार के आरोप में जेल पहुंच जाता है।
लेकिन लोकतंत्र को ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां ईमानदार अधिकारी को बचने के लिए इस्तीफा न देना पड़े और भ्रष्ट अधिकारी को बचने के लिए सत्ता की छतरी न मिले। सवाल दिव्या मित्तल से नहीं है। सवाल उस सिस्टम से है, जो तय करता है कि किस अधिकारी की प्रतिभा जनता के काम आएगी और किसकी प्रतिभा फाइलों में दबकर रह जाएगी।








