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Tesari Aankh Special: जन विश्वास खोते नेता और राजनीतिक दल, क्यों उदासीन हो रही जनता?

Tesari Aankh Special: उभरते राजनीतिक संगठनों का मूल्यांकन अक्सर उनकी भविष्य की संभावनाओं के बजाय उनकी वर्तमान कमियों के आधार पर किया जाता है। पहली नज़र में यह जनता की अधीरता लग सकती है, लेकिन ‘तीसरी आंख’ से देखने पर यह उस ‘संशयवाद’ (Scepticism) और अविश्वास का परिणाम है जो हमारी सामाजिक और राजनीतिक चेतना के जर्रे-जर्रे में समा चुका है।

1. संशयवाद का विरोधाभास: सच पर संदेह, सुविधा पर विश्वास

संशयवाद का सीधा अर्थ है—शक करना या आसानी से विश्वास न कर पाना। मानव स्वभाव का यह सबसे बड़ा अंतर्विरोध है कि हम प्रामाणिक तथ्यों पर तुरंत विश्वास नहीं करते। यदि कोई डॉक्टर किसी को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी बताए, तो नागरिक पहले डॉक्टर पर, फिर उसकी रिपोर्ट पर शक करता है। तीन-चार जगह से पुष्टि (Confirmation) कराने के बाद ही मनमसोस कर सच स्वीकार किया जाता है।

लेकिन इसके उलट, जैसे ही कोई हमारे मनमुताबिक बात कहता है—जैसे “फलां जगह एक खुराक में कैंसर ठीक होता है या वहां कैंसर झाड़ा जाता है”—तो लोग बिना सच जाने सिर्फ प्रचार पर यकीन कर लेते हैं। कैंसर सिर्फ शरीर में हो यह जरूरी नहीं, यह हमारी व्यवस्था और सामाजिक जीवन में भी हो सकता है जो हमें खोखला बना रहा है, लेकिन अपनी सुविधा और धारणा के लिए हम इस खतरे को नजरअंदाज करते जा रहे हैं।

2. ‘धारणा की गांठ’ और सूक्ष्म से व्यापक होता संकट

कई बार ईर्ष्या और विद्वेष के चलते हम खुद उस सामाजिक कैंसर को बढ़ाने में मदद करते हैं। अपनी गलत बात को भी सही सिद्ध करने के लिए लोग मन में ‘धारणा की गांठ’ बांध लेते हैं। उदाहरण के लिए—”हमारा बच्चा गलत हो ही नहीं सकता।” इसके बाद वह बच्चा चाहे आंखों में कितनी भी धूल झोंके, समाज के इंस्पेक्टर्स चाहे कितना भी आगाह करें, लोग अपनी कमियों को स्वीकारने के बजाय उनसे लड़ने को तैयार हो जाते हैं।

यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे घर से निकलकर कुटुम्ब, फिर गांव, टोले, मोहल्ले से होती हुई व्यापक होकर शहर, प्रदेश और देश तक फैल जाती है। वैश्विक स्तर तक इस स्वार्थपरता की झलक दिखायी देती है, जो अंततः आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को बुरी तरह जकड़ लेती है।

3. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: ‘सेफ्टी वाल्व’ से ‘अनिवार्य तत्व’ तक का सफर

यदि इतिहास को देखें, तो 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भले ही पूरे देश के जर्रे-जर्रे में नहीं बल्कि भौगोलिक टुकड़ों में था, लेकिन उसका विषय समकालीन राजनीति से जुड़ता था और सबके अनुकूल था। इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने जनता को पूरी तरह निशस्त्र कर दिया, जिससे 1857 से 1885 तक का कालखंड एक गहरे सन्नाटे में बदल गया।

जब 1860 के आसपास पैदा हुई नई पीढ़ी जवान हुई, तो उसने व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू किए। इस आक्रोश को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेजों ने ए.ओ. ह्यूम और एनी बेसेंट को आगे करके ‘कांग्रेस’ नामक संगठन बनाया, जो युवाओं के गुस्से को निकालने का एक ‘सेफ्टी वाल्व’ था—यानी बात बिगड़ने से पहले संभाल लो। लेकिन जनता ने उम्मीद की किरण में इस पर भरोसा किया और यह चाल विदेशी हुकूमत पर ही उल्टी पड़ गई। बाद में महात्मा गांधी ने आंदोलन की बागडोर संभाली और अपने अटूट ‘जनविश्वास’ के चलते वे देश की राजनीति के लिए एक अनिवार्य तत्व बन गए।

4. जनविश्वास का अवसान और समकालीन संकट

असली मोड़ 1947 में आया। आजादी के समय महात्मा गांधी की इच्छा थी कि कांग्रेस का उद्देश्य (स्वतंत्रता) पूर्ण हो चुका है, इसलिए इसे भंग कर दिया जाना चाहिए ताकि लोग अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप संगठन बनाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चुनाव लड़ें। लेकिन जनविश्वास को भुनाने के लोभ के चलते गांधी की बात को नकार दिया गया।

यहीं से देश की क्रांति से जुड़ी कांग्रेस से लोगों का मोहभंग होना शुरू हुआ, जो आजादी के नायकों और उस आंदोलन से जुड़ी पीढ़ी के अवसान के बाद पूरी तरह खत्म हो गया। बाद में अन्य दलों ने भी कांग्रेस का यही पैटर्न अपनाने की कोशिश की, लेकिन कांग्रेस के कड़वे अनुभव के बाद जनता के मन में गहरा संशय था, इसलिए वे नकार दिए गए।

‘पानी का बुलबुला’ और अवसरवाद का डर

वर्तमान राजनीतिक दौर इसी ऐतिहासिक अविश्वास की अगली कड़ी है। चाहे जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आंदोलन से उपजी ‘जनता पार्टी’ को नकारा जाना हो, या अन्ना हजारे के आंदोलन की उपज अरविंद केजरीवाल का धूल-धूसरित होना—जनविश्वास का यह कच्चा धागा लगातार कमजोर होता गया है।

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आज की संशयवादी जनता किसी भी नए दल या संगठन को ‘अवसरवाद’ और ‘पानी के बुलबुले’ की तरह देखती है। समाज अब ‘उम्मीद’ के चश्मे से नहीं, बल्कि ‘संदेह’ के लेंस से देखता है। वह किसी भी नए विकल्प को तुरंत पुरानी व्यवस्था की कमियों से तौलकर और उसकी वर्तमान कमियों को आधार बनाकर नकार देती है। व्यवस्था का यह सामाजिक कैंसर आज के नए संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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