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नहीं रहीं महिला बंदियों की भाग्यविधाता राजकुमारी बज्रकितियाभा, संयुक्त राष्ट्र ने भी माना था लोहा

तीसरी आंख विशेष: शाही चकाचौंध और महलों की दुनिया से दूर, जब कोई राजकुमारी अपना पूरा जीवन जेल की सलाखों के पीछे घुटती महिला कैदियों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दे, तो वह इतिहास बन जाती है। थाईलैंड के शाही घराने से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर आई है। वर्तमान राजा महा वजीरालोंगकोर्न की ज्येष्ठ पुत्री और दुनिया भर की महिला बंदियों की उम्मीद की किरण रहीं राजकुमारी बज्रकितियाभा माहिडोल (Princess Bajrakitiyabha Mahidol) का 47 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। दिसंबर 2022 से लगातार कोमा में रहने के बाद आखिरकार उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन वैश्विक स्तर पर वे एक ऐसा काम कर गईं जिसने पूरी दुनिया के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को हमेशा के लिए बदल दिया।

जेल सुधारों के लिए समर्पित किया था पूरा जीवन

राजकुमारी बज्रकितियाभा सिर्फ नाम की राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि वे कानून (Law) की एक असाधारण जानकार थीं। उन्होंने अमेरिका की प्रतिष्ठित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी (Cornell University) से कानून में डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि हासिल की थी। उन्होंने अपनी कानूनी समझ का उपयोग महलों के ऐश-ओ-आराम के लिए नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित हिस्से यानी ‘महिला कैदियों’ के लिए किया। उन्होंने थाईलैंड की जेलों में बंद महिला बंदियों के पुनर्वास और उनकी मानवीय गरिमा के लिए ‘कमलांगजई’ (Inspire) प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी।

‘बैंकॉक रूल्स’: जिसने वैश्विक स्तर पर दिलाई मान्यता

साल 2010 से पहले दुनिया भर की जेलों में बंद महिलाओं के लिए कोई अलग से अंतरराष्ट्रीय नियम नहीं थे। जेल के कानून पुरुषों को ध्यान में रखकर काम करते थे। राजकुमारी बज्रकितियाभा ने इस कड़वे सच को बदला। उनके अथक प्रयासों और कूटनीति के कारण ही दिसंबर 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) ने सर्वसम्मति से महिला कैदियों के अधिकारों को मंजूरी दी।

संयुक्त राष्ट्र ने राजकुमारी के इस ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देते हुए इन नियमों का आधिकारिक नाम “बैंकॉक रूल्स” (Bangkok Rules) रखा।

क्या हैं ‘बैंकॉक रूल्स’ के मुख्य बिंदु?

  • गर्भावस्था और नवजात की देखभाल: जेल में बंद गर्भवती महिलाओं और उनके मासूम बच्चों को उचित स्वास्थ्य सेवाएं और पोषण मिलना अनिवार्य किया गया।

  • स्वच्छता और मानसिक स्वास्थ्य: महिला कैदियों की विशिष्ट शारीरिक और मानसिक जरूरतों को कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता मिली।

  • गैर-दंडात्मक विकल्प: छोटे अपराधों के लिए महिलाओं को जेल भेजने के बजाय सुधारात्मक उपायों पर जोर दिया गया।

🇺🇳 संयुक्त राष्ट्र ने भी किया स्वीकार, बनीं गुडविल एंबेसडर

महिला अधिकारों और आपराधिक न्याय सुधार के क्षेत्र में उनके इसी क्रांतिकारी विजन का लोहा मानते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN Women और UNODC) ने उन्हें अपनी ‘वैश्विक गुडविल एंबेसडर’ (Goodwill Ambassador) नियुक्त किया था। वे ऑस्ट्रिया में थाईलैंड की राजदूत भी रहीं और कूटनीति के मंच पर हमेशा मानवाधिकारों की वकालत करती रहीं।

आजीवन रहीं अविवाहित, सेवा को ही माना व्रत

राजकुमारी ने अपने जीवन में कभी विवाह नहीं किया और न ही उनकी कोई संतान थी। उन्होंने एक सच्चे समाज सुधारक की तरह अपना पूरा जीवन केवल लोक कल्याण के ‘व्रत’ के लिए दान कर दिया था। दिसंबर 2022 में दिल की गंभीर बीमारी के कारण वे अचानक बेहोश हो गईं और तब से वे लगातार लाइफ सपोर्ट पर थीं। उनके असमय चले जाने से आज न केवल थाईलैंड शोकाकुल है, बल्कि दुनिया भर की जेलों की वो सलाखें भी उदास हैं, जिन्हें उन्होंने मानवीय स्पर्श दिया था।

ये खबर दुनिया भर की जेलों में बंद महिलाओं के लिए विशेष अहमियत रखती है। तीसरी आँख न्यूज डायरी से इतर इसे आप तक पहुंचाने का मकसद भी राजकुमारी के सम्मान और गरिमा को बनाए रखना है। उम्मीद है यह पोस्ट आपको पसंद आएगी।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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