वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

जंतर-मंतर के छात्रों का आक्रोश, सत्ता और विपक्ष दोनों सवालों में

मंगलवार का दिन जंतर-मंतर पर आ रहे बच्चों के लिए बहुत भारी रहा। कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध स्थल पर हजारों लोग न कह कर इन्हे बच्चे कहना ज्यादा सही होगा। ये अपने सपनों की हिलती बुनियाद को मजबूती देने में जमा हुए थे।

ये इंटरमीडिएट पास करने वाले बच्चे बिना बुलाए पहुंच कर जमा होते रहे, लेकिन अंधी बहरी सरकार को ये नहीं दिखा। जबकि एक दिन पहले पुलिस ने भारी कार्रवाई की थी। वह बिना किसी तैयारी के थे। अधिकांश छात्र 18 से 23 साल की उम्र के बीच के थे। जिनका मन कोरा कागज होता है। जिनमें कुटिलता नहीं होती है जो सत्ता के दांव पेंच नहीं जानते हैं।

मंगलवार को स्थल पर आए कई छात्रों ने कहा कि वे पहली बार आए थे और कानून प्रवर्तकों द्वारा छात्रों पर किए गए “क्रूर” हमले से आक्रोशित थे। केवल हिन्दुत्व का राग अलापने से आप बच्चों के भविष्य से खेलने का अधिकारी नहीं पा जाते हैं।

सरकार की ऐसी चूक जिसकी भरपाई मुश्किल

सरकार कहीं कुछ गलत कर रही है। ये एक ऐसा आंदोलन है जिससे विपक्षी पार्टियों ने भी किनारा कस लिया क्योंकि ये आंदोलन शुरू करने में वह चूक गए थे। उनका इगो उन्हें आगे बढ़ने से रोक रहा था। हालांकि आंदोलन की आंच में रोटी सेकना सब चाहते थे लेकिन पर्दे के पीछे रहकर।

एनटीए से जिस तरह 6-6 परीक्षाओं के पर्चे आउट हुए हैं वह किशोर वय के इन छात्रों के सपनों पर कुठाराघात से कम नहीं इनके साथ बर्बरता किसी कीमत पर नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन हुई जो केंद्र सरकार को भारी पड़ सकती है। ये बच्चे दिल्ली से सरकार की क्या छवि लेकर लौटेंगे। क्या गोदी मीडिया इस आंच को दबा पाएगा।

सवालों से नहीं दब सकते बच्चों के सवाल

तथाकथित सरकार समर्थित मीडिया इन बच्चों के आंदोलन पर चाहे जितने सवाल उठाए, लेकिन बच्चों के सवाल जायज हैं धर्मेंद्र प्रधान को हटाने में हमारे तेज तर्रार प्रधानमंत्री के हाथ क्यों कांप रहे हैं। ऐसी क्या मजबूरी है। यह छात्रों का दिशाहीन प्रदर्शन था जिसे नेतृत्व नहीं मिल सका। इसीलिए आंदोलन में गलतियां हुईं।

वामपंथियों ने मौके का फायदा उठाने की कोशिश की जिससे आंदोलन पर सवाल उठाने वालों को मौका मिला और इसे हिन्दुत्व विरोधी मूवमेंट का तमगा दिया गया। जबकि हकीकत में ये मासूम बच्चों का विरोध जताने का तरीका था। लगातार परीक्षाओं की गिरती शुचिता इनके सुनहरे भविष्य के सपनों को डस रही है इस पर कोई जवाब क्यों नहीं दे रहा है।

कांग्रेस को अगर छात्रों की इतनी ही चिंता है तो राहुल गांधी ने आगे आकर कमान क्यों नहीं सम्हाली, अखिलेश यादव ने इन बच्चों के जख्मों पर मलहम क्यों नहीं लगाया। बहन मायावती आगे आकर धरने पर क्यों नहीं बैठीं।

बिना संघर्ष के मलाई के तलबगार दल

दरअसल मलाई सबको खानी है लेकिन आगे नहीं आना है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि इस देश का विपक्ष सिर्फ सत्तारुढ़ पार्टी को जनता से तिरस्कृत किये जाने का इंतजार कर रहा है ताकि अपनी बारी में इनसे बुरे शासक साबित हो सकें।

विपक्ष के नेता सोच विहीन हो चुके हैं। जो समाज को लेकर चलने आगे आकर नेतृत्व देने से डरते हैं। अगर मुलायम सिंह यादव आज होते तो शायद वह छात्रों को नेतृत्व देने में सबसे आगे खड़े होते। यहां तक कि इंदिरा गांधी होतीं तो वह भी छात्रों के साथ मंच साझा करने में देर न लगातीं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी आते आते बहुत देर कर दी जबकि उन्हें पहले दिन से ही इस आंदोलन को नेतृत्व दे देना चाहिए था। जिससे छात्रों के सवालों को दिशा मिल जाती है।

लेकिन अफसोस आज देश में कोई जमीनी नेता नहीं बचा है जो युवाओं के मन में फूटते ज्वालामुखी के गुबार को सही दिशा दे सके।

छात्रों के साथ खड़े होने में लगता है डर

सबके अपने अपने भय हैं। युवाओं का आक्रोश जायज है लेकिन सत्ता पक्ष घमंड में चूर हो चुका है। उसे पता है कि विकल्प हीनता की स्थिति में जनता उन्हें वापस लाने को मजबूर है। लेकिन वह गलत हैं बड़ी बड़ी सत्ताएं धूलधूसरित होती हैं। ये भी जाएंगे। तब इनकी जीतने की कोई ट्रिक काम नहीं आएगी।

वास्तव में देश आज नेता नहीं ब्यूरोक्रेसी चला रही है। जनता का पैसा नेताओं की जेब में नहीं ब्यूरोक्रेसी की जेब में जा रहा है। इसी लिए ब्यूरोक्रेसी नहीं चाहती सत्ता परिवर्तन हो। क्योंकि जिस दिन सत्ता परिवर्तन हुआ ब्यूरोक्रेसी पर आफत आ जाएगी सारे घोटालों की फाइलें खुलनी शुरू हो जाएंगी न जाने कितने ब्यूरोक्रेट्स का बुढ़ापा खराब होगा।

इसीलिए ये सत्ता टिकी हुई है। लेकिन वह दिन दूर नहीं जब जनता का आक्रोश मुखर होगा। तब सत्ता की किलेबंदी ध्वस्त होगी। अगर सुधार नहीं हुआ तो देश के कोने कोने में युवा सड़कों पर उतरेंगे और अपना हक मांगेंगे।

(यह लेखक के विचार और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी मत हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकार की भूमिका को लेकर की गई टिप्पणियां संपादकीय विश्लेषण का हिस्सा हैं, इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।)

Ram Krishna
Author: Ram Krishna

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें