नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच लगातार नौ दिनों से जारी सैन्य टकराव अब केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सबसे बड़ा असर तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी हमलों और ईरानी जवाबी कार्रवाई के कारण मध्य-पूर्व में तनाव खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। इससे न सिर्फ होर्मुज जलडमरूमध्य स्ट्रेट ऑफ हार्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, बल्कि तेल उत्पादन और सप्लाई से जुड़े अहम ढांचों पर भी हमले शुरू हो गए हैं। मोटे तौर पर ईरान-अमेरिका युद्ध अब केवल सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। तेल की कीमतों में तेजी, आपूर्ति श्रृंखला पर खतरा और मध्य-पूर्व के ऊर्जा ढांचे पर हमले इस बात के संकेत हैं कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो दुनिया को एक नए तेल संकट का सामना करना पड़ सकता है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति आर्थिक मोर्चे पर गंभीर चुनौती बन सकती है। रिपोर्ट से स्पष्ट है कि आने वाले कुछ सप्ताह वैश्विक तेल बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं।
होर्मुज बना दुनिया की सबसे बड़ी चिंता
दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि युद्ध बढ़ने के बाद इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है। अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी भी फिर से शुरू कर दी है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में खाड़ी क्षेत्र के कई ठिकानों को निशाना बनाया है।
अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है तो दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतें 90 डॉलर के पार
तनाव का असर बाजार में तुरंत दिखाई दिया। रिपोर्ट के मुताबिक ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी करीब 84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध और फैलता है या होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह प्रभावित होता है तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी जा सकती हैं।
ऊर्जा ढांचे पर हमले से संकट और गहरा
सिर्फ समुद्री मार्ग ही नहीं, बल्कि तेल और बिजली से जुड़े बुनियादी ढांचे भी हमलों की चपेट में हैं। रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने कुवैत में तेल संयंत्र, बिजली प्रतिष्ठानों और जल संयंत्रों को नुकसान पहुंचाया है। वहीं अमेरिका ने भी ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों के साथ पुलों और अन्य महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाया है। इससे क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन और वितरण दोनों प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
वैश्विक बाजार पहले से दबाव में
यहां बता दें कि फरवरी से शुरू हुए युद्ध के चलते तेल बाजार पहले से ही कई कारणों से दबाव झेल रहा है। यूक्रेन द्वारा रूस की रिफाइनरियों पर हमलों से डीजल और अन्य ईंधनों की वैश्विक आपूर्ति पहले से प्रभावित है। ऐसे समय में मध्य-पूर्व में नया युद्ध तेल बाजार के लिए दोहरा झटका साबित हो सकता है। रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक तेल भंडार भी पहले की तुलना में कम स्तर पर हैं।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है।
यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं। एलपीजी और विमान ईंधन की लागत बढ़ सकती है। परिवहन खर्च बढ़ने से महंगाई में तेजी आ सकती है। सरकार का आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा भी बढ़ सकता है। रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी।
ईरान के पास अभी भी आर्थिक ताकत
रिपोर्ट के अनुसार जून में हुए अस्थायी युद्धविराम के दौरान अमेरिका ने कुछ समय के लिए ईरानी तेल निर्यात पर लगी रोक में ढील दी थी। इस दौरान ईरान ने लगभग 4.5 से 5 करोड़ बैरल तेल एशियाई बाजारों की ओर भेज दिया, जिससे उसे अरबों डॉलर की आय हुई। यही पूंजी अब लंबे संघर्ष में ईरान की आर्थिक ताकत बन सकती है, हालांकि अमेरिका ने बाद में फिर से प्रतिबंध और नाकेबंदी लागू कर दी।
क्या आगे और बढ़ सकता है संकट?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में तीन बातें तय करेंगी कि तेल बाजार किस दिशा में जाएगा, पहली होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही सामान्य रहती है या नहीं। दूसरी खाड़ी देशों के तेल उत्पादन और निर्यात पर कितना असर पड़ता है और तीसरी और अंतिम अमेरिका और ईरान कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ते हैं या युद्ध और व्यापक होता है।
टेक्नोक्रेट विराट कृष्ण का विश्लेषण








