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स्कूलों में सैनिटेशन की बड़ी चुनौती, 5 करोड़ बच्चे प्रभावित

स्कूलों में पानी, सैनिटेशन और हाइजीन यानी WASH की सुविधाओं को लेकर देश के सामने एक बड़ी चुनौती अब भी बनी हुई है। WHO-UNICEF के जॉइंट मॉनिटरिंग प्रोग्राम (JMP) की सितंबर 2026 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत में करीब 5 करोड़ स्कूली बच्चे ऐसे थे, जिनके स्कूलों में कोई सैनिटेशन सर्विस उपलब्ध नहीं थी। यह संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। ये हालात तब हैं जबकि केंद्र सरकार का दावा है कि वह बच्चों के सैनिटाइजेशन पर विशेष ध्यान दे रही है।

WHO-UNICEF की रिपोर्ट ‘Progress on Drinking Water, Sanitation and Hygiene in Schools 2015-2025’ में दुनिया के स्कूलों में WASH सुविधाओं की स्थिति का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में 24.4 करोड़ स्कूली बच्चों के स्कूलों में कोई सैनिटेशन सर्विस नहीं थी। इनमें करीब 5 करोड़ बच्चे अकेले भारत के थे। यानी वैश्विक स्तर पर सैनिटेशन सर्विस से पूरी तरह वंचित बच्चों में लगभग हर पांचवां बच्चा भारत से जुड़ा था।

भारत के बाद नाइजीरिया में करीब 3.4 करोड़, इथियोपिया में 2.6 करोड़, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में 1.1 करोड़ और इंडोनेशिया में करीब 80 लाख बच्चे ऐसे थे, जिनके स्कूलों में कोई सैनिटेशन सर्विस नहीं थी।

आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं, लेकिन संदर्भ समझना भी जरूरी

इन आंकड़ों को सीधे इस अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत के 5 करोड़ बच्चों के स्कूलों में एक भी टॉयलेट नहीं था। WHO-UNICEF की परिभाषा इससे अलग है।

SDG मॉनिटरिंग में बेसिक सैनिटेशन सर्विस के लिए ऐसी बेहतर सैनिटेशन सुविधा जरूरी है, जो सिंगल-सेक्स हो और सर्वे के समय इस्तेमाल करने लायक भी हो। जिन स्कूलों में सुविधा मौजूद है, लेकिन वह सिंगल-सेक्स नहीं है या उपयोग के समय इस्तेमाल करने योग्य नहीं है, उन्हें सीमित सैनिटेशन सर्विस वाले स्कूलों में रखा जाता है।

इसलिए रिपोर्ट का आंकड़ा स्कूलों में टॉयलेट की पूरी अनुपलब्धता को नहीं, बल्कि तय अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक सैनिटेशन सर्विस की उपलब्धता को दिखाता है। यही अंतर महत्वपूर्ण है। क्योंकि जहां लड़के लड़कियां दोनों पढ़ रहे हैं वहां लड़कियों के लिए अलग वाशरूम नहीं है।

भारत ने प्रगति की, लेकिन आबादी का आकार चुनौती बढ़ाता है

भारत की स्थिति का दूसरा पहलू यह है कि पिछले एक दशक में सैनिटेशन कवरेज में सुधार हुआ है। WHO-UNICEF के आंकड़ों के मुताबिक 2015 से 2025 के बीच भारत में बिना सैनिटेशन सर्विस वाले स्कूलों की संख्या में करीब 14 प्रतिशत की कमी आई।

यानी दिशा सुधार की है। समस्या यह है कि भारत में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बहुत बड़ी है। ऐसे में प्रतिशत में दिखाई देने वाला अंतर जब बच्चों की संख्या में बदला जाता है तो वह करोड़ों तक पहुंच जाता है।

यही वजह है कि भारत के लिए चुनौती केवल नए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि जो सुविधाएं मौजूद हैं, वे तय मानकों के मुताबिक हों, अलग-अलग लड़के और लड़कियों के लिए उपलब्ध हों और वास्तव में इस्तेमाल करने लायक स्थिति में रहें।

दुनिया की तस्वीर भी संतोषजनक नहीं

वैश्विक स्तर पर भी स्कूलों में सैनिटेशन की स्थिति बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। 2025 में दुनिया के करीब 77 प्रतिशत स्कूलों में बेसिक सैनिटेशन सर्विस थी। 11 प्रतिशत स्कूल सीमित सर्विस की श्रेणी में थे, जबकि 12 प्रतिशत स्कूलों में कोई सैनिटेशन सर्विस नहीं थी।

कुल मिलाकर करीब 46 करोड़ स्कूली बच्चों के पास बेसिक सैनिटेशन सर्विस नहीं थी। इनमें 21.6 करोड़ बच्चे ऐसे थे जिनके स्कूलों में कुछ सैनिटेशन सुविधाएं तो थीं, लेकिन वे उपयोग के समय उपलब्ध नहीं थीं या सिंगल-सेक्स मानक पूरा नहीं करती थीं। वहीं 24.4 करोड़ बच्चों के स्कूलों में कोई सैनिटेशन सर्विस नहीं थी।

सेंट्रल और सदर्न एशिया में करीब 13.8 करोड़ स्कूली बच्चे बेसिक सैनिटेशन सर्विस से वंचित थे। वहीं सब-सहारा अफ्रीका में यह संख्या 26.4 करोड़ थी।

पानी के मामले में भारत की तस्वीर बेहतर

स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा को देखें तो भारत की स्थिति सैनिटेशन के मुकाबले काफी बेहतर नजर आती है।

रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में करीब 1.2 करोड़ भारतीय बच्चों के पास स्कूल में बेसिक पीने के पानी की सुविधा नहीं थी। भारत उन 62 देशों में शामिल है जिन्हें 2030 तक स्कूलों में यूनिवर्सल बेसिक ड्रिंकिंग वाटर कवरेज हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता हुआ माना गया है।

रिपोर्ट के आकलन वाले दौर में भारत में बेसिक पीने के पानी की कवरेज में हर साल 4 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई। भारत सरकार की ओर से भी स्कूलों में नल के पानी की पहुंच बढ़ने की जानकारी दी गई है। दिसंबर 2023 में जल शक्ति मंत्रालय ने बताया था कि 9.23 लाख से अधिक स्कूलों में पीने के नल का पानी उपलब्ध था, जो उसके उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 90.55 प्रतिशत स्कूलों के बराबर था।

इससे साफ है कि पानी की उपलब्धता के मामले में भारत ने सैनिटेशन की तुलना में तेज प्रगति की है।

हाइजीन की स्थिति भी चिंता का कारण

WASH में सैनिटेशन और पानी के अलावा हाइजीन भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। WHO-UNICEF के आकलन के मुताबिक करीब 2 करोड़ भारतीय बच्चों के पास स्कूल में हाइजीन सर्विस नहीं थी।

हालांकि यहां भी आंकड़ों की एक सीमा है। JMP के मुताबिक हालिया डेटा पर्याप्त नहीं होने के कारण 2024 के बाद भारत और सेंट्रल एवं सदर्न एशिया के लिए हाइजीन कवरेज का अनुमान उपलब्ध नहीं कराया जा सका।

वैश्विक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण है। 2025 में करीब 54.5 करोड़ स्कूली बच्चों के पास बेसिक हाइजीन सर्विस नहीं थी। बेसिक हाइजीन सर्विस का मतलब स्कूल में ऐसी हाथ धोने की सुविधा से है, जहां सर्वे के समय पानी और साबुन दोनों उपलब्ध हों।

2030 का लक्ष्य सबसे बड़ी चुनौती

WHO-UNICEF की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मौजूदा रफ्तार से दुनिया 2030 तक स्कूलों में सभी बच्चों को बेसिक WASH सुविधाएं उपलब्ध कराने के लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएगी।

वैश्विक बेसिक सैनिटेशन कवरेज 2015 में 67 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 77 प्रतिशत हो गई है। लेकिन इस रफ्तार को पर्याप्त नहीं माना गया है। JMP के मुताबिक 2030 तक सार्वभौमिक कवरेज हासिल करने के लिए सैनिटेशन में मौजूदा प्रगति की रफ्तार को करीब पांच गुना बढ़ाना होगा।

अगर मौजूदा रुझान जारी रहता है तो 2030 तक दुनिया में बेसिक ड्रिंकिंग वाटर कवरेज करीब 84 प्रतिशत, बेसिक सैनिटेशन 81 प्रतिशत और बेसिक हाइजीन कवरेज करीब 79 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका मतलब यह होगा कि 2030 में भी करीब 36.4 करोड़ स्कूली बच्चे बेसिक सैनिटेशन सर्विस से वंचित रह सकते हैं।

भारत के लिए यह उपलब्धि भी है और चेतावनी भी

WHO-UNICEF की रिपोर्ट को भारत के संदर्भ में केवल नकारात्मक आंकड़े के तौर पर देखना सही नहीं होगा। देश ने पिछले वर्षों में स्कूलों में पानी और सैनिटेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति की है। लेकिन करीब 5 करोड़ बच्चों का आंकड़ा यह बताता है कि अभी काफी दूरी तय करनी बाकी है।

भारत के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां छोटी प्रतिशत कमी भी बड़ी आबादी के कारण करोड़ों बच्चों को प्रभावित करती है। इसके अलावा केवल टॉयलेट या पानी की सुविधा बना देना पर्याप्त नहीं है। सुविधा का इस्तेमाल करने लायक होना, लड़कियों और लड़कों के लिए उपयुक्त और अलग व्यवस्था होना तथा पानी और साबुन के साथ हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है।

सवाल बच्चों की सेहत का

आखिरकार स्कूलों में WASH सुविधाएं केवल इंफ्रास्ट्रक्चर का सवाल नहीं हैं। इनका सीधा संबंध बच्चों की सेहत, स्कूल में उनकी उपस्थिति और पढ़ाई के माहौल से है। खासकर लड़कियों के लिए सुरक्षित, निजी और उपयोग करने योग्य सैनिटेशन सुविधाएं उनकी शिक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा हैं।

इस लिहाज से WHO-UNICEF की रिपोर्ट भारत के लिए एक साथ दो संदेश देती है। पहला, स्कूल WASH इंफ्रास्ट्रक्चर में हुई प्रगति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरा, करीब 5 करोड़ बच्चों का आंकड़ा यह याद दिलाता है कि केवल सुविधाएं बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक लगातार उपयोगी और कार्यशील बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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