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Supreme Court on Artical 22: 76 साल बाद भी पुलिस को संविधान पढ़ा रहा सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court on Artical 22: कितने अफसोस की बात है कि संविधान निर्मित हुए 76 साल बीत जाने के बाद भी देश की सर्वोच्च अदालत को भारतीय पुलिस को संविधान के अनुच्छेद 22 का महत्व समझाना पड़ रहा है। अदालत को व्यक्ति की आजादी का मतलब समझाना पड़ रहा है। 21 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गिरफ्तारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को लेकर पुलिस की शक्तियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया है, तो जांच एजेंसी अपनी मर्जी से उसे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। दोबारा गिरफ्तारी के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट की अनुमति और उसके सामने उचित कारण रखना जरूरी होगा।

क्या कहता है अनुच्छेद 22

संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दी जानी चाहिए और उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने तथा उसके द्वारा बचाव किए जाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

वहीं अनुच्छेद 22(2) यह अनिवार्य करता है कि गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए। यात्रा में लगने वाला आवश्यक समय इसमें शामिल नहीं होता। मजिस्ट्रेट के अधिकार के बिना 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में रखना संविधान के इस प्रावधान के खिलाफ है।

यानी संविधान ने पुलिस को गिरफ्तारी की शक्ति जरूर दी है, लेकिन उस शक्ति पर स्पष्ट संवैधानिक सीमाएं भी लगा दी हैं। सवाल यही है कि आखिर इन सीमाओं को बार-बार अदालत को याद क्यों दिलाना पड़ रहा है?

गिरफ्तारी पुलिस की ताकत, आजादी नागरिक अधिकार

किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना पुलिस के लिए एक कानूनी शक्ति हो सकती है, लेकिन नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसका संवैधानिक अधिकार है। यही वह बुनियादी अंतर है जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में कभी भुलाया नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में यह बात और स्पष्ट हुई है कि अगर पुलिस ने संविधान में दी गई सुरक्षा का उल्लंघन किया है, तो बाद में उसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार करना उस उल्लंघन को अप्रासंगिक नहीं बना सकता।

दोबारा गिरफ्तारी की शर्त

अदालत ने कहा कि अगर अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन हुआ और व्यक्ति को रिहा किया गया, लेकिन जांच एजेंसी को आगे उसकी हिरासत में पूछताछ जरूरी लगती है, तो उसे पहले मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देना होगा। उसमें दो बातें स्पष्ट करनी होंगी—दोबारा गिरफ्तारी की जरूरत क्यों है और पहली बार गिरफ्तारी के समय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया। मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के बाद ही दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दी जा सकती है।

यह व्यवस्था केवल किसी आरोपी को राहत देने की व्यवस्था नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिस संस्था ने संवैधानिक सीमा का उल्लंघन किया है, वही संस्था अपनी गलती का फैसला खुद न करे।

24 घंटे का नियम महज औपचारिकता नहीं

अक्सर गिरफ्तारी के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के नियम को महज एक प्रक्रिया की तरह देखा जाता है।लेकिन ऐसा नहीं है। यह नागरिक की आजादी की सुरक्षा के लिए संविधान द्वारा बनाया गया सुरक्षा कवच है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाना व्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है और ऐसी हिरासत अवैध हो सकती है।

वर्तमान आपराधिक प्रक्रिया कानून में भी गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने और 24 घंटे से अधिक हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति की व्यवस्था मौजूद है। इसलिए यह सवाल केवल कानून की किताब में लिखी किसी धारा का नहीं है। यह उस बुनियादी सिद्धांत का सवाल है कि राज्य किसी नागरिक की स्वतंत्रता कब और किन परिस्थितियों में छीन सकता है।

अदालत को बार-बार दखल क्यों देना पड़ता है?

लोकतंत्र में पुलिस महत्वपूर्ण संस्था है। अपराध की जांच, कानून-व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा में उसकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन पुलिस की शक्ति असीमित नहीं हो सकती।

अगर गिरफ्तारी के बाद संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, व्यक्ति को अदालत ने रिहा किया और फिर उसी पुलिस को यह अधिकार दे दिया जाए कि वह बिना किसी न्यायिक अनुमति के उसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार कर ले, तो 24 घंटे की संवैधानिक सुरक्षा का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा गिरफ्तारी को न्यायिक निगरानी के दायरे में रखा है। अदालत ने यह भी कहा कि संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करने वाले उसी अधिकारी के विवेक पर दोबारा गिरफ्तारी की शक्ति नहीं छोड़ी जा सकती।

असली सवाल सत्ता बनाम संविधान का

इस पूरे मामले को केवल पुलिस की गलती के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। असल सवाल यह है कि संविधान ने राज्य की शक्ति और नागरिक की स्वतंत्रता के बीच जो संतुलन बनाया था, क्या वह जमीन पर उसी मजबूती से लागू हो रहा है? संविधान को लागू हुए 76 साल हो चुके हैं।

इन 76 वर्षों में देश ने लोकतंत्र की कई परीक्षाएं देखी हैं। संस्थाएं मजबूत हुई हैं। कानून बदले हैं। आपराधिक प्रक्रिया बदली है। लेकिन नागरिक की स्वतंत्रता का मूल संवैधानिक अधिकार आज भी वही है।

पुलिस आत्ममंथन करे

इसलिए जब सर्वोच्च अदालत को पुलिस को यह याद दिलाना पड़े कि संविधान गिरफ्तारी की शक्ति से ऊपर नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, तो यह केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं रह जाती। यह व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाती है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत इस बात में नहीं होती कि उसके पास नागरिक को गिरफ्तार करने की कितनी शक्ति है। असली ताकत इस बात में होती है कि वह उस शक्ति पर संविधान की कितनी मजबूत लगाम लगाता है।

Ram Krishna
Author: Ram Krishna

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