वेब स्टोरी

ई-पेपर

लॉग इन करें

अखिलेश यादव और 2027: क्या जमीनी राजनीति से दूरी सपा की सबसे बड़ी चुनौती है?

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की राजनीति को पिछले कुछ समय से गौर से देखें तो एक बात बिल्कुल साफ दिखाई देती है—2027 की सत्ता उनकी राजनीति के केंद्र में आ चुकी है। आरक्षण, PDA, दलितों पर कथित अत्याचार, गुर्जर समाज, किसान, युवा, सरकारी स्कूल और शिक्षा… अखिलेश यादव लगातार ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं, जिनके जरिए भाजपा सरकार के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक असंतोष तैयार किया जा सके।

ट्वीट पर ट्वीट, बयान पर बयान और हर वर्ग के लिए अलग राजनीतिक संदेश। जाहिर है, यह सब बिना किसी बड़ी चुनावी रणनीति के नहीं हो रहा। अखिलेश यादव 2027 के लिए राजनीतिक माहौल बना रहे हैं और सत्ता में वापसी की उनकी बेचैनी भी समझी जा सकती है।

लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—सत्ता की ललक तो साफ दिख रही है, लेकिन सत्ता हासिल करने और उत्तर प्रदेश चलाने का रोडमैप कहां है?

क्या समाजवादी पार्टी सिर्फ भाजपा विरोध की राजनीति कर रही है या उसके पास 2027 के बाद के उत्तर प्रदेश के लिए कोई साफ, भरोसेमंद और विस्तृत खाका भी है?

इसे भी पढ़ें- https://tesariaankh.com/mayawati-bsp-2027-election-up-analysis-vote-bank-return/

मुद्दे बहुत हैं, लेकिन समाधान का ब्लूप्रिंट कहां है?

अखिलेश यादव आरक्षण बचाने की बात करते हैं। उनका आरोप है कि आरक्षण सुधार की आड़ में इसे कमजोर करने की साजिश हो रही है। वह PDA समाज को एकजुट होने का संदेश देते हैं। दलितों, पिछड़ों और गुर्जर समाज के मुद्दे उठाते हैं। किसानों के कथित उत्पीड़न पर सरकार को घेरते हैं। सरकारी स्कूलों की बदहाली और नई पीढ़ी की शिक्षा पर सवाल खड़े करते हैं।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुद्दों की पूरी फेहरिस्त है।

लेकिन सवाल वहीं आकर खड़ा हो जाता है—अगर समाजवादी पार्टी सत्ता में आती है तो इन समस्याओं का समाधान क्या होगा?

आरक्षण पर उसकी विस्तृत नीति क्या है? सरकारी स्कूलों को सुधारने का ठोस कार्यक्रम क्या होगा? शिक्षक भर्ती का मॉडल क्या होगा? किसानों के लिए नई कृषि नीति क्या होगी? PDA के नाम पर जिन सामाजिक वर्गों को एकजुट करने की कोशिश की जा रही है, सत्ता में आने के बाद उनकी हिस्सेदारी का मॉडल क्या होगा?

अभी अखिलेश यादव के राजनीतिक संदेशों में इन सवालों के जवाब उतनी स्पष्टता से दिखाई नहीं देते, जितनी स्पष्टता से भाजपा पर आरोप दिखाई देते हैं।

यहीं विरोध की राजनीति और सरकार बनने की तैयारी के बीच का अंतर सामने आता है।

PDA: राजनीतिक नारा या सत्ता चलाने का सामाजिक मॉडल?

अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीति का सबसे बड़ा आधार PDA है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज को एक व्यापक राजनीतिक मंच पर लाने की कोशिश उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों को बदलने की बड़ी रणनीति है।

लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ नारे का नहीं है।

PDA की अंतिम राजनीतिक परिभाषा क्या है? क्या यह केवल भाजपा विरोधी सामाजिक समूहों का चुनावी गठजोड़ है या सत्ता में आने के बाद प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का भी कोई स्पष्ट मॉडल है?

और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या जिन सामाजिक वर्गों को सपा अपने साथ जोड़ना चाहती है, वे खुद को पार्टी के भीतर सुरक्षित और सम्मानित महसूस भी करते हैं?

जनेश्वर मिश्र के बाद समाजवादी पार्टी में कोई वैसा कद्दावर ब्राह्मण चेहरा दिखाई नहीं देता, जो उस समाज को व्यापक राजनीतिक भरोसा दे सके। दूसरी तरफ आजम खान के बाद पार्टी में कोई उतना प्रभावशाली मुस्लिम चेहरा भी नजर नहीं आता। आजम खान के साथ जो कुछ हुआ और जिस तरह वह लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी संकटों में घिरे रहे, उसका असर मुस्लिम समाज की राजनीतिक सोच पर पड़ा है—इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

ब्राह्मण मतदाताओं के एक हिस्से के मन में समाजवादी पार्टी के पिछले शासनकाल को लेकर कानून-व्यवस्था और कथित गुंडागर्दी की आशंकाएं आज भी मौजूद हैं। ऐसे में केवल सामाजिक समीकरणों की गणित बैठा लेने से राजनीतिक भरोसा अपने आप पैदा नहीं होगा।

Akhilesh Yadav (Image from Social Media)

मुलायम, शिवपाल और आजम जमीन पर लड़े, क्या अखिलेश तैयार हैं?

यहीं अखिलेश यादव की राजनीति का शायद सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।

मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और आजम खान जैसे नेता जमीन से निकले हुए नेता थे। उन्होंने राजनीति केवल मंचों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों और सोशल मीडिया से नहीं की। आंदोलनों में उतरे, संघर्ष किया, लाठियां खाईं और जेल भी गए। उन्होंने कार्यकर्ताओं के बीच रहकर अपना राजनीतिक आधार बनाया।

2012 में समाजवादी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक ताकत और शिवपाल यादव के संगठनात्मक नेटवर्क की बड़ी भूमिका थी। लेकिन सत्ता का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ अखिलेश यादव को मिला।

अब सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव ने खुद को उस तरह के जमीनी संघर्ष के लिए कभी तैयार किया?

पिछले लगभग दस वर्षों में समाजवादी पार्टी ने छिटपुट विरोध प्रदर्शनों से आगे बढ़कर किस बड़े जनमुद्दे पर ऐसा व्यापक, लगातार और जबरदस्त आंदोलन खड़ा किया, जिसने सरकार को सड़क पर गंभीर राजनीतिक चुनौती दी हो?

यह सवाल विरोधियों से ज्यादा अखिलेश यादव को खुद से पूछना चाहिए।

सिर्फ ट्वीट करना, तंज कसना और हर मुद्दे पर सरकार को घेरना विपक्ष की राजनीति का एक हिस्सा जरूर है, लेकिन जनता के बीच राजनीतिक विश्वास पैदा करने के लिए कई बार सड़क पर उतरना भी पड़ता है। लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि नेता सिर्फ उनकी परेशानी पर बयान नहीं दे रहा, बल्कि उनके संघर्ष का हिस्सा भी बन रहा है।

मुद्दे उठाना और मुद्दे के लिए लड़ना—दोनों अलग बातें हैं।

भाजपा से नाराजगी का मतलब सपा से प्यार नहीं

समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा शायद यही सोच हो सकती है कि भाजपा से निराश मतदाता आखिरकार मजबूरी में सपा के पास आ जाएगा।

राजनीति इतनी सीधी नहीं होती।

भाजपा से नाराज मतदाता सपा के पक्ष में ही जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। वह बसपा, कांग्रेस या किसी अन्य विकल्प की तरफ भी जा सकता है। वह चुनाव से दूर भी रह सकता है। वह स्थानीय उम्मीदवार के आधार पर फैसला भी कर सकता है।

इसलिए भाजपा विरोध अपने आप सपा समर्थन में बदल जाएगा, यह राजनीतिक गणित बेहद जोखिम भरा साबित हो सकता है।

2027 में मतदाता सिर्फ यह नहीं पूछेगा कि भाजपा ने क्या गलत किया। वह यह भी पूछ सकता है—अगर भाजपा नहीं, तो फिर कौन? और क्यों?

समाजवादी पार्टी को इस सवाल का जवाब अपने पुराने शासनकाल की याद दिलाकर या केवल भाजपा के खिलाफ आरोपों की लंबी सूची देकर नहीं, बल्कि भविष्य के स्पष्ट कार्यक्रम से देना होगा।

किसान, युवा और स्कूल: हमला तो है, लेकिन योजना कहां है?

किसानों के मुद्दे पर अखिलेश यादव के तेवर आक्रामक हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति केवल भाजपा विरोध से तय नहीं होगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल—हर क्षेत्र के किसानों की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग हैं।

तो सपा की कृषि नीति क्या होगी?

MSP पर उसका स्पष्ट रुख क्या है? सरकारी खरीद व्यवस्था कैसे सुधरेगी? सिंचाई, बिजली, खाद, फसल बीमा, किसान कर्ज और बाजार तक पहुंच पर उसका कार्यक्रम क्या होगा?

इसी तरह सरकारी स्कूलों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। अखिलेश यादव स्कूलों की हालत को लेकर भाजपा सरकार पर हमला कर रहे हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद स्कूल कितने समय में सुधरेंगे? शिक्षक भर्ती का मॉडल क्या होगा? बंद या कमजोर होते स्कूलों के लिए क्या योजना होगी? शिक्षा बजट और बुनियादी ढांचे में प्राथमिकताएं क्या होंगी?

सवाल उठाना आसान है, लेकिन जवाब लेकर जनता के सामने जाना ही सरकार बनने की असली तैयारी है।

2012 का हैंगओवर अभी उतरा या नहीं?

अखिलेश यादव की राजनीति पर एक सवाल यह भी है कि क्या वह अभी तक 2012 से 2017 के दौर के राजनीतिक आत्मविश्वास से पूरी तरह बाहर निकल पाए हैं?

उस समय परिस्थितियां अलग थीं। मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत, मजबूत संगठन, शिवपाल यादव की जमीनी पकड़ और पार्टी का व्यापक नेटवर्क मौजूद था। आज उत्तर प्रदेश की राजनीति बदल चुकी है। भाजपा का संगठन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है और विपक्ष के सामने केवल सत्ता विरोधी माहौल बनाने से चुनाव नहीं जीता जा सकता।

अखिलेश यादव को मुद्दे उठाना आता है, सरकार पर तीखा तंज कसना आता है और सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक नैरेटिव बनाना भी आता है। लेकिन 2027 की लड़ाई अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वह मतदाताओं के दिल में वैसा भरोसा पैदा कर पाते हैं, जो केवल विरोध से नहीं, बल्कि संघर्ष, संगठन और भविष्य के स्पष्ट विजन से पैदा होता है।

संगठन और उम्मीदवार भी होंगे असली परीक्षा

अखिलेश यादव के लगातार संदेशों से यह जरूर साफ है कि वह 2027 के लिए किसी एक मुद्दे पर निर्भर नहीं रहना चाहते। दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, किसान, युवा, छात्र और शिक्षा से जुड़े परिवार—सबको एक साथ राजनीतिक संदेश देने की कोशिश हो रही है।

यह महत्वाकांक्षी रणनीति है।

लेकिन इतने बड़े सामाजिक गठबंधन को चुनावी जीत में बदलना आसान नहीं होगा। हर वर्ग को यह भरोसा दिलाना पड़ेगा कि सत्ता में उसकी वास्तविक हिस्सेदारी होगी। इसके लिए केवल ट्वीट और बयान नहीं, बल्कि उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व और मजबूत संगठन की जरूरत होगी।

और शायद सबसे ज्यादा जरूरत होगी जमीन पर लड़ने वाले आंदोलनकारी नेतृत्व की।

सत्ता की चाह साफ है, तैयारी का जवाब अभी अधूरा

यह कहना गलत होगा कि समाजवादी पार्टी 2027 की तैयारी नहीं कर रही। पार्टी मुद्दे तलाश रही है, भाजपा सरकार के खिलाफ असंतोष को आवाज दे रही है और PDA के जरिए व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही है।

लेकिन सत्ता हासिल करने की इच्छा और सत्ता चलाने की तैयारी—दोनों अलग बातें हैं।

अभी अखिलेश यादव की राजनीति में पहली चीज बिल्कुल साफ दिखाई देती है—सत्ता में वापसी की तीव्र इच्छा।

लेकिन दूसरी चीज, यानी उत्तर प्रदेश को चलाने का विस्तृत, स्पष्ट और भरोसेमंद नीतिगत खाका, अभी पूरी तरह जनता के सामने नहीं आया है।

इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या समाजवादी पार्टी 2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा के खिलाफ लड़ रही है, या उत्तर प्रदेश के लिए एक नई सरकार चलाने की तैयारी भी कर चुकी है?

अखिलेश यादव का संघर्ष कहीं नहीं दिखता

सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव की लगातार आ रही तस्वीरों को गौर से देखें तो एक अलग राजनीतिक तस्वीर उभरती है। इन तस्वीरों में वह कहीं पीड़ितों से मिलते दिखते हैं, कहीं किसी प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठकर बात करते हैं, कहीं खिलाड़ियों या युवाओं को सम्मानित करते हैं। कुल मिलाकर वह खुद को एक तरह के ‘शैडो चीफ मिनिस्टर’ के रूप में प्रस्तुत करते नजर आते हैं—जैसे सत्ता भले उनके पास नहीं है, लेकिन वह सरकार के समानांतर जनता की समस्याओं पर नजर रखे हुए हैं।

लेकिन इन तस्वीरों में एक चीज लगातार गायब है—संघर्ष। ऐसी कोई जुझारू तस्वीर मुश्किल से दिखाई देती है, जिसमें अखिलेश यादव वास्तव में किसी जनआंदोलन का नेतृत्व करते हुए, सड़क पर उतरकर जनता के साथ संघर्ष करते नजर आएं। सवाल यह नहीं है कि पीड़ितों से मिलना या उनकी बात सुनना गलत है। सवाल यह है कि क्या केवल मुलाकातों और तस्वीरों से विपक्ष की राजनीति की जा सकती है?

नेता विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करने या पीड़ितों के साथ बैठकर संवेदना जताने तक सीमित नहीं हो सकती। जब जनता किसी गंभीर संकट में होती है तो उसे एक ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की तलाश होती है, जो उसके साथ खड़ा होने के साथ उसके लिए लड़ता हुआ भी दिखाई दे। अगर विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा ही जमीन से दूर दिखाई देगा तो परेशान जनता आखिर अपनी फरियाद लेकर किसके पास जाएगी?

Akhilesh Yadav (Image from Social Media) (1)

छवि का सबसे बड़ा विरोधाभास

यही शायद अखिलेश यादव की राजनीतिक छवि का सबसे बड़ा विरोधाभास है। वह सत्ता से बाहर रहते हुए भी खुद को एक वैकल्पिक मुख्यमंत्री की तरह पेश करना चाहते हैं, लेकिन विकल्प बनने के लिए केवल मुख्यमंत्री जैसी छवि काफी नहीं होती। विपक्ष के नेता को कई बार आंदोलनकारी भी दिखना पड़ता है। जनता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी लड़ाई केवल सोशल मीडिया पोस्ट या प्रेस बयान तक नहीं जाएगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसका नेता सड़क पर उतरकर उस लड़ाई को राजनीतिक आंदोलन में बदल देगा।

शायद यहीं अखिलेश यादव को अपने पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल यादव और आजम खान जैसे नेताओं से अलग करने वाली सबसे बड़ी रेखा दिखाई देती है। वे केवल सत्ता के दावेदार नहीं थे, बल्कि संघर्ष से निकले नेता थे। अखिलेश के सामने चुनौती अब यह है कि क्या वह ‘शैडो चीफ मिनिस्टर’ की अपनी छवि से आगे बढ़कर 2027 से पहले खुद को एक जुझारू जमीनी नेता के रूप में स्थापित कर पाएंगे?

जनता को भरोसा कैसे दिलाएंगे

भाजपा विरोध, PDA और सरकार पर लगातार हमलों से राजनीतिक माहौल बनाया जा सकता है। लेकिन सत्ता की दहलीज तक पहुंचने के लिए मतदाता को अंततः यह भरोसा भी दिलाना होगा कि विरोध के बाद विकल्प क्या है।

और शायद 2027 में अखिलेश यादव के सामने असली परीक्षा भाजपा को घेरने की नहीं होगी। असली परीक्षा यह साबित करने की होगी कि समाजवादी पार्टी सिर्फ सत्ता चाहती नहीं, बल्कि सत्ता पाने के लिए संघर्ष करने और सत्ता चलाने के लिए उसके पास एक स्पष्ट नीति, मजबूत संगठन और भरोसेमंद राजनीतिक रोडमैप भी है।

सत्ता की ललक दिखाई दे रही है। मुद्दों की कमी भी नहीं है। लेकिन सवाल अभी भी वहीं खड़ा है—रोडमैप कहां है, जमीन पर आंदोलन कहां है और क्या समाजवादी पार्टी वास्तव में 2027 के लिए तैयार है?

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

Leave a Comment

और पढ़ें
और पढ़ें