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यूपी चुनाव से पहले UCC का धमाका? क्या भाजपा झोली से निकालेगी ‘दिव्यास्त्र’

बदलते राजनीतिक मौसम और खासकर जेन जी के बीच दिखाई दे रहे असंतोष और बगावती तेवरों को देखते हुए अब एक बड़ा सवाल राजनीतिक गलियारों में उठना स्वाभाविक है—क्या भाजपा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समान नागरिक संहिता यानी UCC को पूरी तरह लागू करने का अपना ‘दिव्यास्त्र’ झोली से निकालकर सबको चौंका सकती है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि समान नागरिक संहिता अब केवल राजनीतिक घोषणा या चुनावी वादे तक सीमित नहीं रह गई है। उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बन चुका है। मध्य प्रदेश में भी इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं और पश्चिम बंगाल में भी इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है।

ऐसे में निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिकना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा UCC को लेकर कोई बड़ा फैसला लेकर चुनावी माहौल को एक नया मोड़ दे सकती है?

संभावित रणनीति पर विमर्श

भाजपा की राजनीति में हिंदुत्व और वैचारिक मुद्दों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समान नागरिक संहिता भी लंबे समय से भाजपा के प्रमुख वैचारिक एजेंडे का हिस्सा रही है।

ऐसे में अगर चुनावी माहौल में पार्टी को यह महसूस होता है कि उसके पारंपरिक समर्थक वर्ग में किसी तरह का असंतोष, असमंजस या दूरी पैदा हो रही है, तो UCC को फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना एक संभावित रणनीति हो सकती है।

भाजपा के लिए UCC केवल एक कानून नहीं, बल्कि लंबे समय से उसके वैचारिक एजेंडे से जुड़ा मुद्दा रहा है। इसलिए यदि चुनाव से ठीक पहले इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाया जाता है, तो इसका राजनीतिक संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना इसका नीतिगत प्रभाव।

लेकिन यहां एक सवाल और है

क्या आज का युवा मतदाता केवल धार्मिक या भावनात्मक मुद्दों से प्रभावित होगा?

जेन जी की राजनीति और सोच पहले की पीढ़ियों से काफी अलग दिखाई देती है। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, डिजिटल स्वतंत्रता, भ्रष्टाचार, अवसर और बेहतर भविष्य जैसे मुद्दे भी उसके लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में केवल UCC या किसी अन्य वैचारिक मुद्दे के सहारे पूरे चुनावी समीकरण को बदलना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।

राजनीति में समय और मुद्दे का मायने

फिर भी चुनावी राजनीति में समय और मुद्दे का चुनाव बहुत मायने रखता है।

अगर भाजपा चुनाव के ठीक पहले UCC को लेकर कोई बड़ा फैसला करती है या इसके क्रियान्वयन की दिशा में कोई निर्णायक कदम उठाती है, तो निश्चित तौर पर इसका राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पार्टी इसे अपने समर्थक वर्ग के बीच एक स्पष्ट संदेश के रूप में पेश कर सकती है कि वह अपने वैचारिक एजेंडे से पीछे नहीं हटी है।

यही वजह है कि उत्तराखंड में UCC लागू होने और मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में इसे लेकर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है। यहां होने वाले किसी भी बड़े राजनीतिक या नीतिगत फैसले का असर केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देती है।

लेकिन इसके साथ एक दूसरा पहलू भी है।

यदि भाजपा UCC को चुनावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती है, तो विपक्ष भी इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण के मुद्दे के रूप में पेश कर सकता है। ऐसे में चुनावी बहस विकास, रोजगार, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों से हटकर पहचान और विचारधारा की राजनीति के इर्द-गिर्द घूम सकती है।

भाजपा के सामने बड़ी चुनौती

बांकीपुर और दतिया जैसे उपचुनावों के नतीजों ने भले ही सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश की राजनीति का भविष्य तय न किया हो, लेकिन उन्होंने एक संकेत जरूर दिया है कि लंबे समय से मजबूत माने जाने वाले राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दी जा सकती है।

ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखने की नहीं, बल्कि नए और युवा मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की भी होगी।

यही वह जगह है जहां UCC का मुद्दा भाजपा की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सवाल यह होगा कि क्या पार्टी UCC को एक बड़े नीतिगत सुधार के रूप में सामने रखेगी या इसे चुनावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल करेगी?

क्योंकि दोनों परिस्थितियों के राजनीतिक परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं।

यूपी चुनाव से ठीक पहले हो सकता है UCC का धमाका

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा UCC को लेकर कोई बड़ा ‘धमाका’ कर सकती है?

अगर भाजपा चुनाव से ठीक पहले UCC को लागू करने की दिशा में कोई निर्णायक कदम उठाती है, तो निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल प्रभावित हो सकता है। इससे पार्टी अपने समर्थक वर्ग को एक मजबूत संदेश देने के साथ-साथ अपने वैचारिक एजेंडे को भी चुनावी विमर्श के केंद्र में ला सकती है।

लेकिन क्या UCC भाजपा के लिए ‘दिव्यास्त्र’ साबित होगा या विपक्ष के हाथ में एक नया राजनीतिक हथियार दे देगा—इसका फैसला आखिरकार जनता और चुनावी नतीजे ही करेंगे।

संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले UCC लागू करने जा रही है या इसे अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाने वाली है। लेकिन उत्तराखंड में UCC लागू होने, मध्य प्रदेश में इसे लेकर बढ़ती सक्रियता और देश के दूसरे हिस्सों में इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच उत्तर प्रदेश को लेकर इस संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।

क्योंकि अगर भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में चुनाव से पहले UCC को लेकर कोई बड़ा फैसला करती है, तो यह केवल एक राज्य का चुनावी मुद्दा नहीं रहेगा। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि UCC भाजपा के एजेंडे में है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अपनी झोली से UCC का वह ‘दिव्यास्त्र’ निकालेगी, जिसकी गूंज पूरे देश की राजनीति में सुनाई दे सकती है?

Ram Krishna
Author: Ram Krishna

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